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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

अथ भगन्दरनिदानम् ।

भाषाटीकासमेत । (२४३) अथ भगन्दरनिदानम् । ❖❖❖❖❖❖❖ गुदस्य द्व्यंगुले क्षेत्रे पार्श्वतः पिटिकाऽऽर्तिकृत् । भिन्नो भगन्दरो ज्ञेयः स च पंचविधो मतः ॥ १ ॥ गुदाके समीप दो अंगुल ऊंची पिछाडी एक पिडिका ( फुन्सी ) हो उसमें बहुत पीडा होय, पिडिका फूटजाय उसको भगन्दररोग कहते हैं, सुश्रुतने इसकी निरुक्ति इस प्रकार करी है यथा-“ गुदभगवस्तिप्रदेशदारणात् भगन्दरः ” इति । भगशब्द इस जगह गुदावाचक है । सो भोजने कहा भी है-“ भगः परिसमन्ताच्च गुदं बस्ति- स्तथैव च । भगवदारयेद्यस्मात्तस्माज्ज्ञेयो भगन्दरः ॥ ” इति । यह भगन्दररोग पांच प्रकारका है, यह संख्या कहना केवल रक्तज द्वन्द्वज भगन्दर सम्भावना निवा- रणार्थ जानना ॥ इसके पूर्वरूप ग्रन्थांतरोंसे लिखते हैं- कटीकपालनिस्तोददाहकण्डूरुजादयः । भवन्ति पूर्वरूपाणि भविष्यति भगन्दरे ॥ २ ॥ कमरमें, कपालास्थिमें सुईसी चुभे, दाह होय, खुजली चले, पीडा होय ये लक्षण जब भगन्दर होनहार होय है तब होते हैं, इस जगह भी कपालास्थि पूर्वोक्त जाननी अर्थात् जो नाडीव्रणमें कह आये हैं ॥ शतपोनकके लक्षण । कषायरूक्षैरतिकोपितोऽनिलस्त्वपानदेशे पिडिकां करोति याम् । उपेक्षणात्पाकमुपैति दारुणं रुजा च भिन्नारुणफेनवाहिनी ॥ तत्रागमो मूत्रपुरीषरेतसां व्रणैरनेकैः शतपोनकं वदेत् ॥ ३ ॥ कसैले और रूखे पदार्थ खानेसे वायु अत्यन्त कुपित होकर गुदास्थानमें जो पिडिका ( फुन्सी ) प्रगट करे, उनकी उपेक्षा करनेसे वे फुन्सियां पकें और फूट जायँ तब पीडा होय तथा लाल झाग मिलि राध वहे तथा उसमें अनेक छिद्र हो जायँ उन छिद्रोंमें होकर मूत्र मल और रेत (शुक्र) बहे, चालनीकेसे अनेक छिद्र होयँ इसी कारण इस रोगको शतपोनक कहते हैं । शतपोनक नाम संस्कृतमें चालनीका है ॥ उष्ट्रशिरोधरके लक्षण । प्रकोपणैः पित्तमतिप्रकोपितं करोति रक्तां पिडिकां गुदाश्रिताम् । तदाशुपाकाहिमपूयवाहिनीं भगंदरं तूष्ट्रशिरोधरं वदेत् ॥ ४ ॥ पित्तकारक पदार्थ खानेसे कुपितभया जो पित्त सो गुदामें लाल रंगकी पिडिका उत्पन्न करे, वह शीघ्र पककर उनमेंसे गरम राध बहे । ये पिडिका ( फुन्सी ) ऊँटकी नाकके समान होयँ इसीसे इसको उष्ट्रशिरोधर नाम कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( २४४ ) माधवनिदान ।

( २४४ ) माधवनिदान । परिस्रावीभगन्दरके लक्षण । कण्डूयनो घनस्त्रावी कठिनो मंदवेदनः । श्वेतावभासः कफजः परिस्रावी भगंदरः ॥ ५ ॥ कफसे प्रगट भये भगन्दरमें खुजली चले तथा गाढी राध बहे, पिडिका कठिन होयँ, पीडा थोडी होय, वर्ण सफेद होय, उसको परिस्रावी भगन्दर कहते हैं ॥ शम्बूकावर्तके लक्षण । बहुवर्णरुजास्त्रावाः पिडिका गोस्तनोपमाः । शंबूकावर्तवन्नाडी शंबूकावर्तको मतः ॥ ६ ॥ जिसमें गौके थनके समान अनेक पिडिका होयँ, उनका रंग पीला और स्राव अनेक प्रकारका होय, व्रण शंखके आँटेके समान होय, इसको शम्बूकावर्त कहते हैं॥ उन्मार्गीभगन्दरके लक्षण । क्षताद्गतिः पायुगता विवर्धते ह्युपेक्षणात्स्युः कृमयो विदार्यते । प्रकुर्वते मार्गमनेकधामुकैर्व्रणैस्तदुन्मार्गीभगंदरं वदेत् ॥ ७ ॥ गुदामें कांटे आदिके लगनेसे क्षत ( घाव ) हो जाय, उस घावकी उपेक्षा कर- नेसे कृमि पडजायँ, वे कृमि उस क्षतको विदारण करें ऐसे वह घाव गुदापर्यंत बढ- कर पहुंचे तथा कृमि उसमें अनेक मुखवाले ( व्रण ) घाव करलेवें इसको उन्मार्गी- भगन्दर कहते हैं ॥ साध्यासाध्य लक्षण । घोराः साधयितुं दुःखाः सर्व एव भगंदराः । तेष्वसाध्यस्त्रिदोषोत्थः क्षतजश्च विशेषतः ॥ ८ ॥ सब भगन्दर दुःसाध्य हैं तिनमें भी त्रिदोषका भगन्दर असाध्य है और क्षतज विशेषकर असाध्य है ॥ असाध्यके लक्षण । वातमूत्रपुरीषाणि क्रिमयः शुक्रमेव च । भगंदरात्प्रस्रवन्ति नाशयन्ति तमातुरम् ॥ ९ ॥ जिस भगन्दरमेंसे अधोवायु, मूत्र, विष्ठा, कृमि और वीर्य बहे उस रोगीका नाश होय ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां भगन्दरनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

अथोपवंशनिदानम्।

भाषाटीकासमेत। (२४५) अथोपवंशनिदानम्। उपदंशके कारण। हस्ताभिघातान्नखदन्तघातादधावनादत्यतिसेवनाद्वा। योनिप्रदोषाच्च भवंति शिश्ने पंचोपदंशा विविधापचारैः॥ १ ॥ हाथकी चोट लगनेसे, नख, दांतके लगनेसे, अच्छी रीतिसे न धोनेसे, अत्यन्त स्त्रीसंगके करनेसे अथवा योनिके दोषसे अर्थात् दीर्घ कडे बाल जिसके ऊपर होयँ अथवा खारी गरम जलके धोनेसे, ब्रह्मचर्यवाली स्त्रीसे गमन करनेसे इत्यादिक कारणोंसे लिंगमें उपदंश (गर्मीका रोग) होय है। वह पांच प्रकारका है॥ वातोपदंशके लक्षण। सतोदभेदस्फुरणैः सकृष्णैः स्फोटैर्व्यवस्येत्पवनोपदंशम्। लिंगेन्द्रियके ऊपर काले फोडे उठे, उनमें चोटनेकीसी पीडा होय, तोडनेकीसी पीडा होय और स्फुरण ये लक्षण वातोपदंशके जानने॥ पित्तोपदंश व रक्तोपदंशके लक्षण। पीतैर्बहुक्लेदयुतैः सदाहैः पित्तेन रक्तात्पिशितावभासैः॥ २ ॥ पित्तके उपदंशकरके पीले रंगके फोडे होते हैं। उनमेंसे पानी बहुत बहै, दाह होय, रुधिरके उपदंशसे मांसके समान लाल रंगके फोडे होयँ॥ कफोपदंशके लक्षण। सकण्डुरैः शोथयुतैर्महद्भिः शुक्लैर्घनस्रावयुतैः कफेन। कफके उपदंश करके सफेद मोटे फोडे होयँ, उनमें खुजली चले, सूजन होय और गाढी राध बहै॥ सन्निपातोपदंशके लक्षण। नानाविधस्रावरुजोपपन्नमसाध्यमाहुस्त्रिमलोपदंशम्॥ ३ ॥ जिस उपदंशमें अनेक प्रकारका स्राव होय, पीडा होय यह त्रिदोषज उपदंश असाध्य है॥ असाध्य लक्षण। विशीर्णमांसं कृमिभिः प्रजग्धं मुष्कावशेषं परिवर्जयेत्तु। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

( २४६ ) माधवनिदान ।

( २४६ ) माधवनिदान । जिस उपदंश करके लिंगका मांस गल गया हो और कृमि लिंगको खाय जावें केवल अण्डकोश मात्र रहजाय, उसको वैद्य त्याग दे ॥ असाध्य लक्षण । संजातमात्रे न करोति मूढः क्रियां नरो यो विषये प्रसक्तः । कालेन शोथक्रिमिदाहपाकैर्विशीर्णशिश्नो म्रियते स तेन ॥ ४ ॥ उपदंशके होतेही जो मूर्ख मनुष्य विषयमें आसक्त होकर समयपर इसका उप- चार नहीं करै उसका लिंग थोडे दिनमें सूजनयुक्त हो और कीडे पडें और उसमें दाह और पाकभी होय, पीछे वह गलजाय ऐसा रोगी मरजाय ॥ लिंगवर्त्तिके लक्षण । अंकुरैरिव सङ्घातैरुपर्युपरि संस्थितैः । क्रमेण जायते वर्त्तिस्ताम्रचूडशिखोपमा ॥ ५ ॥ कोशस्याभ्यन्तरे संधौ सर्वसंधिगतापि वा । लिङ्गवर्त्तिरिति ख्याता लिङ्गार्श इति चापरे ॥ ६ ॥ कुलित्थाकृतयः केचित्केचित्पद्मदलोपमाः । मेढ्रसन्धौ नृणां केचित्केचित्सर्वाश्रयाः स्मृताः ॥ ७ ॥ रुजादाहार्तिबहुलास्तृष्णातोदसमन्विताः । स्त्रीणां पुंसां च जायन्ते उपदंशाः सुदारुणाः ॥ ८ ॥ सुरगेकी चोटीके समान लिंगके ऊपर मांसके अंकुर एकके ऊपर एक प्रगट होयँ, कोषकी भीतरकी मणिमें अथवा सर्व सन्धियोंमें तो इस रोगको लिंगवर्त्ति कहते हैं और कोई लिंगार्श कहते हैं, यह त्रिदोषजन्य है । इसमें मांसके अंकुर कुलथीके समान और कोई पद्मदलके समान, किसीके अण्डकोशकी संधिमें किसीके सर्व आशयमें होते हैं और पीडा, दाह बहुत होय, प्यास, नोचनेकीसी पीडा होय, स्त्री पुरुषोंके यह उपदंश घोर पीडाकारक होते हैं। इसमें “कुलित्थाकृतयः” यहांसे लेकर “स्त्रीणां पुंसां च जायन्ते” यहां तक पाठ क्षेपक है, माधवका नहीं और स्त्रियोंके भी गरमीका रोग होय है यह मत सुश्रुतका है परन्तु यह आर्ष पाठ नहीं है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायाम् उपदंशनिदानं समाप्तम् ॥

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अथ फिरंगरोगनिदानम् ।

भाषाटीकासमेत । ( २४७ ) अथ फिरंगरोगनिदानम् । उपदंशरोगका ही भेद फिरंगरोग है उसको ग्रन्थान्तरसे लिखते हैं- फिरंगशब्दकी निरुक्ति। फिरङ्गसंज्ञके देशे बाहुल्येनैव यद्भवेत् । तस्मात्फिरंग इत्युक्तो व्याधिर्व्याधिविशारदैः ॥ १ ॥ फिरंगियोंके देशमें यह रोग बहुधा होता है, इसीसे वैद्य फिरंगरोग कहते हैं ॥ विप्रकृष्ट निदान । गन्धरोगः फिरंगोऽयं जायते देहिनां ध्रुवम् । फिरंगिनोऽङ्गसंसर्गात्फिरंगिण्याः प्रसंगतः ॥ भवेत्तं लक्षयेत्तेषां लक्षणैर्भिषजां वरः ॥ २ ॥ गन्धरोग यह फिरंग रोग है सो मनुष्योंके अंग्रेजोंके संसर्गसे अथवा फिरंगिणी ( मेम ) के प्रसंग करनेसे होता है, इसको इसके आगे जो लक्षण कहेंगे उनसे जानना ॥ इसका रूप । फिरंगस्त्रिविधो ज्ञेयो बाह्य आभ्यन्तरस्तथा । बहिरन्तर्भवश्चापि तेषां लिङ्गानि च ब्रुवे ॥ ३ ॥ फिरंगरोग तीन प्रकारका है-१ बाहर होय, २ भीतर होय है और तीसरा बाहर भीतर दोनों स्थानमें होय है, उनके लक्षण कहता हूं ॥ तत्र बाह्यः फिरंगः स्याद्विस्फोटसदृशाल्परुक् । स्फुटितो व्रणवद्वैद्यैः सुखसाध्योऽपि स स्मृतः ॥ ४ ॥ तहां बाहरका फिरंगरोग फोडेके समान थोडी पीडाकर्त्ता होय है और फोडेके समान ही फूटे हैं, यह सुखसाध्य है ॥ संधिष्वाभ्यन्तरः स स्यादुभयोर्लक्षणैर्युतः । कष्टदोऽतिचिरस्थायी कष्टसाध्यतमश्च सः ॥ ५ ॥ और जो फिरंग सन्धियोंके भीतर होय अथवा दोनों बाहर और भीतरकी फिरंगके लक्षण मिलते होंय, वह अतिकष्ट देनेवाला बहुत कालतक रहनेवाला कष्टसाध्य है ॥ फिरंगरोगके उपद्रव । कार्श्यं बलक्षयो नासाभंगो वह्नेश्च मंदता । अस्थिशोषोऽस्थिवक्रत्वं फिरंगोपद्रवा अमी ॥ ६ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( २४८ ) माधवनिदान ।

( २४८ ) माधवनिदान । देह कृश होजाय, बल नाश होजाय, नाक बैठ जाय, अग्नि मन्द हो जाय, हड्डी सूखे तथा हड्डी टेढी हो जाय, ये फिरंगके उपद्रव हैं ॥ साध्यासाध्य कष्टसाध्य । बहिर्भवो भवेत्साध्यो नूतनो निरुपद्रवः । आभ्यन्तरस्तु कष्टेन साध्यः स्यादयमामयः ॥ ७ ॥ बहिरंतर्भवो जीर्णः क्षीणस्योपद्रवैर्युतः । बोध्यो व्याधिरसाध्योऽमित्यूचुर्मुनयः पुरा ॥ ८ ॥ जो फिरंग बाहर होय, नया और उपद्रवरहित होय वह साध्य है और भीतर होय वह कष्टसाध्य है और जो बाहर भीतर दोनों ठिकानेपर होय तथा पुराना पडजाय और उपद्रवयुक्त होय, वह फिरंगरोग असाध्य है ॥ इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां फिरंगरोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ शूकरोगनिदानम् । —❖❖❖❖— अक्रमाच्छेफसो वृद्धिं योऽभिवाञ्छति मूढधीः । व्याधयस्तस्य जायन्ते दश चाष्टौ च शूकजाः ॥ १ ॥ जो मन्दबुद्धिवाला पुरुष शास्त्रोक्त क्रमके बिना लिंगको मोटा करा चाहै वह विषकृमिका लिंगके ऊपर लेपादिक करे अथवा जलयोग वात्स्यायनऋषिके कहे उनका साधन करे उसके १८ प्रकारके शूकरोग होते हैं ॥ सर्षपिकाके लक्षण । गौरसर्षपसंस्थाना शूकदुर्भगहेतुका । पिडिका श्लेष्मवाताभ्यां ज्ञेया सर्षपिका च सा ॥ २ ॥ दुष्टजलजन्तुका दुष्टरीतिसे लेप करनेसे कफ, वात कुपित होकर सफेद सरसोंके समान जो पिडिका ( फुन्सी ) होय उसको सर्षपिका कहते हैं ॥ अष्ठीलाके लक्षण । कठिना विषमर्भुग्नैर्वायुनाऽष्ठीलिका भवेत् । अप्रसक्त शूकोंके लेपसे वायु कुपित होकर करडी निहाईके समान पिडिका होय और विषम कहिये कोई छोटी और कोई बडी और भुग्न कहिये टेढे ऐसे शूक कहिये मांसांकुरोंसे व्याप्त होय उसको अष्ठीला कहते हैं ॥

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भाषाटीकासमेत । ( २४९ ) ग्रथितके लक्षण । शूकैर्यत्पूरितं शश्वद्ग्रथितं नाम तत्कफात् ॥ ३ ॥ निरन्तर शूकलेप करनेसे लिंगेन्द्रियके ऊपर गांठ पैदा होय, उसे ग्रन्थित कहते हैं ॥ कुंभिकाके लक्षण । कुंभिका रक्तपित्तोत्था जांबवास्थिनिभाऽशुभा । रक्तपित्तसे जामुनकी गुठलीके समान, काले रंगकी पिडिका होय, उसको कुंभिका ऐसे कहते हैं ॥ अलजीके लक्षण । तुल्यजां त्वलजीं विद्याद्यथाप्रोक्तं विचक्षणैः ॥ ४ ॥ यह पिडिका प्रमेहपिडिकामें जो अलजी नाम पिडिका कह आये हैं उनके समान लाल काले फोडोंसे व्याप्त होय तथा उसके लक्षण पूर्वोक्त पिडिकाकेसे होय हैं ॥ मृदितके लक्षण । मृदितं पीडितं यत्तु संरब्धं वातकोपतः । शूकपीडा होनेके अनन्तर लिंगको हाथोंसे मीडनेसे अथवा दाबनेसे वायुके कोपसे लिंग सूज जाय ॥ संमूढपिडिकाके लक्षण । पाणिभ्यां भृशसंमूढे संमूढपिडिका भवेत् ॥ ५ ॥ लेप करनेके अनन्तर जब लिंगमें खुजली चलै तब उसको दोनों हाथोंसे खूब खुजावे तब एक मूढ ( विना मुखकी ) पिडिका होय उसको संमूढपिडिका कहते हैं ॥ अवमंथके लक्षण । दीर्घा बह्व्यश्च पिडिका दीर्यन्ते मध्यतस्तु याः । सोऽवमंथः कफासृग्भ्यां वेदनारोमहर्षकृत् ॥ ६ ॥ कफरक्तसे लम्बी और अनेक तथा बीच बीचमें फूटी हुई ऐसी जो पिडिका लिंगमें होयँ, उसके होनेसे रोमाञ्च और पीडा होय, इस रोगको अवमंथ ऐसे कहते हैं ॥ पुष्करिकाके लक्षण । पित्तशोणितसंभूता पिडिका पिडिकाचिता । पद्मकर्णिकसंस्थाना ज्ञेया पुष्करिका च सा ॥ ७ ॥ पित्तरक्तसे उत्पन्न हुई पिडिका उसके चारों तरफ अनेक छोटी २ फुन्सियां होय और वह कमलके भीतरकी केसरके समान सब फुन्सी होयँ उसको पुष्क- रिका ऐसे कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( २५० ) माधवनिदान ।

( २५० ) माधवनिदान । स्पर्शहानिके लक्षण । स्पर्शहानिं तु जनयेच्छोणितं शूकदूषितम् । शूकका लेप करनेसे रुधिर दूषित होकर त्वचाके स्पर्शज्ञानको नष्ट करे है ॥ उत्तमाके लक्षण । मुद्गमाषोपमा रक्ता रक्तपित्तोद्भवाश्च याः । व्याधिरेषोत्तमा नाम शूकोऽजीर्णनिमित्तजः ॥ ८ ॥ शूकका वारम्वार लेप करनेसे रक्तपित्त कुपित होकर मूंग उडदके समान लाल फुन्सी लिंगेन्द्रियमें होयं उसको उत्तमा कहते हैं ये अजीर्णके कारण होती है ॥ शतपोनकके लक्षण । छिद्रैरणुमुखैर्लिंगं चितं यस्य समंततः । वातशोणितजो व्याधिर्विज्ञेयः शतपोनकः ॥ ९ ॥ जिस पुरुषके लिंगमें अनेक बारीक छिद्र हो जायँ, यह व्याधि वातशोणितसे प्रगट होती है इसको शतपोनक कहते हैं ॥ त्वक्पाकके लक्षण । वातपित्तकृतो यस्तु त्वक्पाको ज्वरदाहवान् ॥ १० ॥ वातपित्तसे लिंगकी त्वचा पक जाय और उसमें ज्वर दाह होय है ॥ शोणितार्बुदके लक्षण । कृष्णैः स्फोटैः सरक्ताभिः पिडिकाभिर्निपीडितम् । यस्य वास्तुरुजा चोग्रा ज्ञेयं तच्छोणितार्बुदम् ॥ ११ ॥ जिस पुरुषकी लिंगेन्द्रियके ऊपर काले लाल फफोले और पिडिका (फुंसियां) हों वे पीडित हों तथा व्रणके स्थानमें पीडा होय उसको शोणितार्बुद कहते हैं ॥ मांसार्बुदके लक्षण । मांसदोषेण जानीयादर्बुदं मांससम्भवम् । मांस दुष्ट होनेसे मांसार्बुद प्रगट होता है ॥ मांसपाकके लक्षण । शीर्यन्ते यस्य मांसानि यस्य सर्वाश्च वेदनाः । विद्यात्तं मांसपाकं तु सर्वदोषकृतं भिषक् ॥ १२ ॥ जिसकी इन्द्रियका मांस गलजाय और अनेक प्रकारकी पीडा होय यह व्याधि त्रिदोषज है, इस व्याधिको मांसपाक कहते हैं ॥

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भाषाटीकासमेत। (२५१) विद्रधिके लक्षण। विद्रधिं सन्निपातेन यथोक्तमभिनिर्द्दिशेत् ॥ १३ ॥ विद्रधिनिदानमें जो सन्निपातविद्रधिके लक्षण कहे हैं वे ही यहां विद्रधिशूकके लक्षण जानने ॥ तिलकालकके लक्षण। कृष्णानि चित्राण्यथ वा शूकानि सविषाणि तु । पातितानि पचंन्त्याशु मेढ्रं निरवशेषतः ॥ १४ ॥ कालानि भूत्वा मांसानि शीर्यंते यस्य देहिनः । सन्निपातसमुत्थांस्तु तान्विद्यात्तिलकालकान् ॥ १५ ॥ काले अथवा चित्रविचित्र रंगकेसे विषशूकोंके लेप करनेसे तत्काल सर्व लिङ्ग पक जाय तथा सब मांस तिलके सदृश काला होकर गलजाय, इस त्रिदोषोत्पन्न व्याधिको तिलकालक कहते हैं ॥ असाध्य शूकदोषके लक्षण। तत्र मांसार्बुदं यच्च मांसपाकश्च यः स्मृतः । विद्रधिश्च न सिद्ध्यंति ये च स्युस्तिलकालकाः ॥ १६ ॥ तिस शूकदोषमें मांसार्बुद, मांसपाक, विद्रधि और तिलकालक ये चार असाध्य हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाधुरीभाषाटीकायां शूकदोषनिदानं समाप्तम् ॥ अथ कुष्ठनिदानम् । विरोधीन्यन्नपानानि द्रवस्निग्धगुरूणि च । भजतामागतां छर्दिं वेगांश्चान्यान्प्रतिघ्नताम् ॥ १ ॥ व्यायाममतिसन्तापमतिभुक्त्वा निषेविणाम् । शीतोष्णलंघनाहारान्क्रमं मुक्त्वा निषेविणाम् ॥ २ ॥ घर्मश्रमभयार्त्तानां द्रुतं शीतांबुसेविनाम् । अजीर्णाध्यशनानां च पंचकर्म्मापचारिणाम् ॥ ३ ॥

( २५२ ) माधवनिदान ।

( २५२ ) माधवनिदान । नवान्नदधिमत्स्यातिलवणाम्लनिषेविणाम् । माषमूलकपिष्टान्नतिलक्षीरगुडाशिनाम् ॥ ४ ॥ व्यवायं चाप्यजीर्णेऽन्ने निद्रां च भजतां दिवा । विप्रान्गुरून्धर्षयतां पापं कर्म च कुर्वताम् ॥ ५ ॥ वातादयस्त्रयो दुष्टास्त्वग्रक्तं मांसमंबु च । दूषयंति स कुष्ठानां सप्तको द्रव्यसंग्रहः ॥ अतः कुष्ठानि जायंते सप्त चैकादशैव च ॥ ६ ॥ विरोधी कहिये क्षीरमत्स्यादि, पतले, स्नेहयुक्त, भारी ऐसे अन्नपानके सेवन करनेसे रर्द्दके वेगको रोकनेसे और अन्य वेग कहिये मलमूत्रादिवेगोंके रोकनेसे, भोजन करके अत्यन्त व्यायाम ( दण्डकसरत ) अथवा अतिसंताप ( सूर्यका ताप ) सह- नेसे, शीत, गरमी, लंघन और आहार इनके सेवन उक्त क्रम छोडकर करनेसे धूप, श्रम और भय इनसे पीडित होय और उसी समय शीतल जल पीवे, कच्चा अन्न भक्षण करनेसे तथा भोजनके ऊपर भोजन करनेसे, वमन, विरेचन, निरूहण, अनुवासन, नस्यकर्म इन पंचकर्मके करते समय अपथ्य करनेसे, नया अन्न, दही, मछली, अत्यन्त खारी खट्टा पदार्थके सेवन करनेसे, उडद, मूली, पिष्टीकी बनी वस्तु, तिल, दूध, गुड इनके खानेसे, अन्नके पचे विना स्त्रीसंग करनेसे तथा दिनमें सोनेसे, ब्राह्मण गुरु इनका तिरस्कार करनेसे, पापकर्मके आचरण करनेसे ऐसे पुरु- षोंके वातादिक तीनों दोष त्वचा, रुधिर, मांस और जल इनको दुष्ट कर कुष्ठरोग ( कोढ ) उत्पन्न करे, कुष्ठ होनेके वातादि तीनों दोष और त्वचादि दूष्य ये सात पदार्थ अवश्य कारणभूत हैं इनसे ही अठारह प्रकारके कुष्ठ होते हैं, तिनमें सात महाकुष्ठ और ग्यारह क्षुद्र कुष्ठ हैं ॥ कुष्ठोंको त्रिदोषजत्व भी होनेसे दोषाधिक्यसे वे सात प्रकारके हैं सो कहते हैं- कुष्ठानि सप्तधा दोषैः पृथग्द्वंद्वैः समागतैः । सर्वेष्वपि त्रिदोषेषु व्यपदेशोऽधिको मतः ॥ ७ ॥ पृथक् पृथक् दोषों करके ३, द्वन्द्वज ३ और सन्निपातसे १ सब मिलकर सात कुष्ठ भये । सब कुष्ठ त्रिदोष होनेपर भी जो दोष अधिक होय उसीसे व्यवहार करना चाहिये अर्थात् जिस दोषके लक्षण मिलें उसी दोषका कुष्ठ जानना जैसे “वातेन कुष्ठं कापालं” अर्थात् वाताधिक्य होनेसे कापाल कुष्ठ होता है ॥ कुष्ठके पूर्वरूप । अतिश्लक्ष्णखरस्पर्शस्वेदास्वेदविवर्णता ॥ ८ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( २५३ ) दाहः कंडूस्त्वचि स्वापस्तोदः कोष्ठोन्नतिः क्लमः । व्रणानामधिकं शूलं शीघ्रोत्पत्तिश्चिरस्थितिः ॥ ९ ॥ रूढानामपि रूक्षत्वं निमित्तेऽल्पेऽपि कोपनम् । रोमहर्षोऽसृजः काष्र्ण्यं कुष्ठलक्षणमग्रजम् ॥ १० ॥ जिस ठिकाने कुष्ठ होनहार होय उस जगह हाथोंसे अत्यन्त चिकना मालूम होय अथवा खरदरा मालूम होय, उस ठिकाने पसीने आवे अथवा नहीं आवे तथा उस ठिकानेका वर्ण पलट जाय, दाह होय, खुजली चले, त्वचाको स्पर्श मालूम न होय, नोचनेकीसी पीडा होय, विषैली माखीके काटनेके सदृश चकत्ते उठे, परि- श्रम करे विना देहमें श्रम होय, व्रणमें पीडा अधिक होय, उन फोडोंकी उत्पत्ति शीघ्र होकर बहुत दिवसपर्यंत रहे, जब फोडा भरनेको होय तब रूखे रहें उनका थोडे निमित्त होनेसे कोप होय, रोमांच होय और रुधिर काला पडजाय, ये कुष्ठ होनेके पूर्वरूप होते हैं ॥ सप्त महाकुष्ठोंके लक्षण । कृष्णारुणकपालाभं यद्रूक्षं परुषं तनु । कापालं तोदबहुलं तत्कुष्ठं विषमं स्मृतम् ॥ ११ ॥ कापालकुष्ठ जो काले तथा लाल खोपडीके सदृश, रूखे, खरखरे, पतले ऐसे त्वचावाले तथा नोंचनेकीसी अधिक पीडायुक्त होयँ, वे दुश्चिकित्स्य हैं अर्थात् चिकित्सा करनेमें कठिन हैं। इसको कापालकुष्ठ कहते हैं ॥ औदुम्बरकुष्ठके लक्षण । रुग्दाहरागकंडूभिः परीतं लोमपिंजरम् । उदुंबरफलाभासं कुष्ठमौदुंबरं वदेत् ॥ १२ ॥ औदुम्बरकुष्ठ शूल, दाह लाल और खुजली इनसे व्याप्त होय, इसमें बाल कपिलवर्णके होयँ तथा ये गूलरफलके समान होते हैं ॥ मण्डलकुष्ठके लक्षण । श्वेतं रक्तं स्थिरं स्त्यानं स्निग्धमुत्सन्नमंडलम् । कृच्छ्रमन्योन्यसंयुक्तं कुष्ठं मंडलमुच्यते ॥ १३ ॥ मण्डलकुष्ठ सफेद, लाल, कठिन, गीला अथवा जलयुक्त, चिकना, जिसका आकार मण्डलके सदृश ऊपरको उठा होय तथा एक दूसरेसे मिला होय, ऐसा यह मण्डलकुष्ठ कष्टसाध्य है ॥

( २५४ ) माधवनिदान ।

( २५४ ) माधवनिदान । ऋक्षजिह्वकुष्ठके लक्षण । कर्कशं रक्तपर्यन्तमन्तः श्यावं सवेदनम् । यहक्षजिह्वासंस्थानमृक्षजिह्वं तदुच्यते ॥ १४ ॥ ऋक्षजिह्वकुष्ठ कठोर, अन्तविषे लाल होय, बीचमें काला होय, पीडा करे तथा रीछके जीभके समान होय ॥ पुण्डरीककुष्ठके लक्षण । सश्वेतं रक्तपर्यन्तं पुण्डरीकदलोपमम् । सोत्सेधं च सरागं च पुंडरीकं प्रचक्षते ॥ १५ ॥ पुण्डरीककुष्ठ पुण्डरीक ( श्वेतकमल ) पत्रके समान सफेद होय और उसके अन्त- भाग लाल होयँ, यत्किञ्चित् ऊंचा निकल आवे और मध्यमें थोडा लाल होय है ॥ सिध्मकुष्ठके लक्षण । श्वेतं ताम्रं च तनु यद्रजो घृष्टं विमुंचति । प्रायेणोरसि तत्सिध्ममलाबुकुसुमोपमम् ॥ १६ ॥ सिध्मकुष्ठ सफेद, लाल, पतली, खुजानेसे भूसीसी उडे । यह विशेषकरके छातीमें होता है ( छातीमें कफ प्रधान होनेसे ) । प्रायः इसके कहनेसे छातीके अतिरिक्त और स्थानमें भी होय हैं और घीयाके फूलके आकार होय है ॥ काकणकुष्ठके लक्षण । यत्काकणंतिकावर्णं सपाकं तीव्रवेदनम् । त्रिदोषलिङ्गं तत्कुष्ठं काकणं नैव सिध्यति ॥ १७ ॥ काकणकुष्ठ चिरमिटीके समान लाल अर्थात् बीचमें काला होय और आसपास लाल होय अथवा बीचमें लाल होय और आसपास काला होय, किञ्चित् पका तीव्र, पीडायुक्त, जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलते हों यह कुष्ठ अच्छा नहीं होय ॥ ग्यारह क्षुद्रकुष्ठोंके लक्षण । अस्वेदनं महावास्तु यन्मत्स्यशकलोपमम् । तदेककुष्ठं चर्माख्यं बहलं हस्तिचर्मवत् ॥ १८ ॥ चर्मकुष्ठ पसीनारहित, बहुत जगह व्यापनेवाला, मछलीकी त्वचासमान और जिसका चर्म हाथीके चर्म समान मोटा और कठोर होय उसको चर्मकुष्ठ कहते हैं ॥ किटिभकुष्ठके लक्षण । श्यावं किणखरस्पर्शं परुषं किटिभं स्मृतम् ।

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भाषाटीकासमेत । (२५५) किटिभकुष्ठ नीलवर्ण, व्रणकी चटके समान कठोर स्पर्श मालूम होय और परुष कहिये रूक्ष होय ॥ वैपादिककुष्ठके लक्षण । वैपादिकं पाणिपादस्फोटनं तीव्रवेदनम् ॥ १९ ॥ वैपादिक जिसमें हाथ और पैर फटजायँ और पीडा बहुत होय, इस विपा- दिकाको बिवाई नहीं जानना, क्योंकि बिवाई केवल पैरमें ही होती है और बिवा- ईको शास्त्रमें पाददारी कहते हैं और विपादिकामें हाथ पैरोंमें फुन्सी श्यामरंगकी होती हैं और वे फुन्सी चुचाती हैं तथा खुजाती हैं, इसीसे पाददारी भिन्न और विपादिका भिन्न है ॥ अलसकुष्ठके लक्षण । कण्डूमद्भिः सरागैश्च गण्डैरलसकं चितम् । खुजलीयुक्त और लाल फफोलोंसे व्याप्त जो कुष्ठ हो उसको अलसककुष्ठ कहते हैं ॥ दद्रुमण्डलकुष्ठके लक्षण । सकण्डूरागपिटिकं दद्रुमण्डलमुद्गतम् ॥ २० ॥ दद्रुमण्डलकुष्ठ इसमें खुजली होय, लाल होय और फोडा होय और ये ऊंचे उठ आवें मंडलके आकार गोल उत्पन्न होय, इसीसे इसको दद्रुमंडल कहते हैं ॥ चर्मदलकुष्ठके लक्षण । रक्तं सशूलं कंडूमत्स्फोटं यद्दलत्यपि । तच्चर्मदलमाख्यातमस्पर्शसहमुच्यते ॥ २१ ॥ चर्मदलकुष्ठ यह लाल हो, शूलयुक्त, खुजलीयुक्त, फफोलोंसे व्याप्त होकर फूटजाय, इसमें हाथ लगानेसे सहा न जाय, इसमें त्वचा फटजाय ॥ पामाकुष्ठके लक्षण । सूक्ष्मा बह्वयः पीडिकाः स्राववत्यः पामेत्युक्ताः कण्डुमत्यः सदाहाः । पामाकुष्ठ पिडिका छोटी और बहुत होयँ उनमेंसे स्राव होय तथा खुजली चले और दाह होय इस कुष्ठको पामा (खाज) कहते हैं ॥ कच्छुकुष्ठके लक्षण । सैव स्फोटैस्तीव्रदाहैरुपैता ज्ञेया पाण्योः कच्छुरुग्रा स्फिचोश्च ॥ २२ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

(२५६) माधवनिदान ।

(२५६) माधवनिदान । कच्छुकुष्ठ वही पामा मोटे फोडोंकरके तथा तीव्रदाहयुक्त होय और हाथोंमें हो, उसको कच्छु कहते हैं । उग्रा यह चूतडमें होती है ॥ विस्फोटकुष्ठके लक्षण । स्फोटाः श्यावारुणाभासा विस्फोटाः स्युस्तनुत्वचः । विस्फोटिक फोडे काले व लाल रंगके होयँ और जिनकी त्वचा पतली होय उसको विस्फोट कहते हैं ॥ शतारुकुष्ठके लक्षण । रक्तं श्यावं सदाहार्ति शतारु स्याद्बहुव्रणम् ॥ २३ ॥ शतारु लाल, होय, श्याम होय, जलन होय, शूल होय तथा जिनमें अनेक फोडे होयँ उसको शतारुकुष्ठ कहते हैं ॥ विचर्चिकाके लक्षण । सकण्डूः पिडिका श्यावा बहुस्रावा विचर्चिका । विचर्चिका खुजलीयुक्त, काले रंगकी जो फुन्सी (माताके समान) होय तथा उसमेंसे स्राव बहुत होय, उसको विचर्चिका कहते हैं। चर्मकुष्ठसे लेकर विचर्चिका- कुष्ठ पर्यंत १२ कुष्ठ होते हैं और पीछे क्षुद्र कुष्ठ ११ कहैं हैं, ऐसी कोई शंका करे उसके निमित्त कहते हैं । विचर्चिका पैरोंमें होकर फूटकर अर्थात् विपादिका होय हैं ऐसे कहनेसे संख्या नहीं बढे इस विषयमें भोजका यह मत है ॥ वातजादि कुष्ठोंके लक्षण । खरं श्यावारुणं रूक्षं वातात्कुष्ठं सवेदनम् ॥ २४ ॥ पित्तात्प्रकुपितं दाहरागस्रावान्वितं स्मृतम् । कफात्क्लेदि घनं स्निग्धं सकण्डूशैत्यगौरवम् । द्विलिंगं द्वंद्वजं कुष्ठं त्रिलिंगं सान्निपातिकम् ॥ २५ ॥ वायुके योगसे कुष्ठ खरदरा, काले रंगका अथवा लालवर्ण रूखा और पीडा- युक्त ऐसा होय है । पित्तके योगसे कुपित कुष्ठमें दाह, लाली और स्रावयुक्त होय है । कफके योगसे क्लेदयुक्त, सघन, चिकना, खुजली, शीतलता युक्त और भारी ऐसा होय है। द्वंदूज कुष्ठमें दो दोषोंके लक्षण होते हैं। सान्निपातिक कुष्ठमें तीन दोषोंके लक्षण होते हैं ॥ १ दोषाः प्रदूष्य त्वङ्मांसं पाणिपादसमाश्रिताः । पिडिकां जनयंत्याशु दाहकण्डूसम- न्विताम् ॥ दाल्यते त्वक् खरा रूक्षा पाण्योर्ज्ञेया विचर्चिका ॥ पादे विपादिका ज्ञेया स्थाना- न्यत्वाद्विचर्चिका ॥

भाषाटीकासमेत । (२५७) रसादिसप्तधातुगत कुष्ठोंके क्रमसे लक्षण । त्वक्स्थे वैवर्ण्यमंगेषु कुष्ठे रौक्ष्यं च जायते । त्वक्स्वापो रोमहर्षश्च स्वेदस्यातिप्रवर्तनम् ॥ २६ ॥ रसधातुगत कुष्ठ होनेसे अंगका वर्ण पलट जाय है, अंग रूखा होय, त्वचा शून्य होय, रोमाञ्च हो और पसीना बहुत आवे ॥ रक्तगत कुष्ठके लक्षण । कण्डूर्विपूयकश्चैव कुष्ठे शोणितसंश्रये ॥ २७ ॥ रक्तगत कुष्ठमें खुजली और राध बहुत होय ॥ मांसगत कुष्ठके लक्षण । बाहुल्यं वक्त्रशोषश्च कार्कश्यं पिडिकोद्गमः । तोदः स्फोटः स्थिरत्वं च कुष्ठे मांससमाश्रिते ॥ २८ ॥ मांसगत कुष्ठ होनेसे मुख बहुत सूखे, अंगमें कर्कशपना होय, देहमें फुन्सी पैदा होय, सुई नोचनेकीसी पीडा होय, फोडे होयँ वे बहुत दिन रहें ॥ मेदोगत कुष्ठके लक्षण । कौण्यं गतिकक्षयोऽङ्गानां संभेदः क्षतसर्पणम् । मेदःस्थानगते लिङ्गं प्रागुक्तानि तथैव च ॥ २९ ॥ मेंदमें कुष्ठ होनेसे कौण्य कहिये हाथ गिरपडे, चलनेकी शक्ति मारी जाय हडफूटन होय, घाव फैल जाय और पूर्वोक्त लक्षण (रसरक्तमांसगतकुष्ठके लक्षण) होयँ ॥ अस्थिमज्जागत कुष्ठके लक्षण । नासाभंगोऽक्षिरागश्च क्षतेषु कृमिसंभवः । स्वरोपघातश्च भवेदस्थिमज्जासमाश्रिते ॥ ३० ॥ अस्थि (हड्डी) और मज्जागत कुष्ठ होनेसे नाक गिरपडे, नेत्र लाल होयँ, घावमें कीडे पड जाँय, स्वर बैठ जाय ये लक्षण होयँ ॥ शुक्रार्त्तवगत कुष्ठके लक्षण । दंपत्योः कुष्ठबाहुल्याद्दुष्टशोणितशुक्रयोः । यदपत्यं तयोर्जातं ज्ञेयं तदपि कुष्ठितम् ॥ ३१ ॥ जिन स्त्रीपुरुषोंके रुधिर शुक्र कुष्ठाधिक्यसे दुष्ट होयँ, उस दुष्ट हुए वीर्य और रजसे प्रगट भई जो सन्तान सो भी कोढ़ी होती है, इस जगह दुष्टहुए शुक्र और १ त्वक्शब्देनात्र रसोऽभिधीयते धातुप्रस्तावात् त्वक्शब्देन रसस्याभिधानं तात्स्थ्यात् १०

( २५८ ) माधवनिदान ।

( २५८ ) माधवनिदान । आर्तव सर्वथा बीजत्व नष्ट न होनेसे संतानके करनेवाले होते हैं और जीवसंक्रमण कालमें कदाचित् बीज दुष्ट होय तो विषके कीडेके न्याय करके सन्तान प्रगट होती है अर्थात् जैसे विष प्राणियोंके प्राणका नाशक है परन्तु उसमें भी विषका कीडा प्रगट होता है और वह उससे नहीं मरता है यह वाग्भटका मत है ॥ साध्यादिभेद । साध्यं त्वग्रक्तमांसस्थं वातश्लेष्माधिकं च यत् । मेदसि द्वन्द्वजं याप्यं वर्ज्यं मज्जास्थिसंसृतम् ॥ ३२ ॥ कृमिहृल्लासमन्दाग्निसंयुक्तं यत्त्रिदोषजम् । प्रभिन्नं प्रस्रुताङ्गं च रक्तनेत्रं हतस्वरम् ॥ पंचकर्मगुणातीतं कुष्ठं हंतीह कुष्ठिनम् ॥ ३३ ॥ रस रुधिर मांस इन धातुओंके पर्यंत गये जो कुष्ठ वे साध्य होते हैं तथा जिस कुष्ठमें वायु और कफ प्रधान होय वह भी साध्य है और मेदोधातुगत कुष्ठ तथा द्वंद्वजकुष्ठ याप्य जानना । मज्जा अस्थि इन दोनों धातुमें कुष्ठ पहुँच गया हो तथा जो शुक्रगत हो वह कुष्ठ असाध्य है तथा जिस कुष्ठमें कृमि, वमन, मन्दाग्नि इन करके युक्त होय तथा त्रिदोषज होय वह असाध्य है। जो कुष्ठ फूटकर बहने लगे तथा जिस कुष्ठसे रोगीके नेत्र लाल होयँ अथवा स्वर बैठ गया होय और वमन विरेचनादि पंचकर्मके गुण जिस पुरुषके नहीं होयँ ऐसा रोगी मर जाय ॥ कुष्ठमें प्रधानदोषके लक्षण । वातेन कुष्ठं कापालं पित्तेनौदुंबरं कफात् ॥ ३४ ॥ मंडलाख्यं विचर्ची च ऋक्षारव्यं वातपित्तजम् । चर्मैककुष्ठं किटिभं सिध्मालसविपादिकाः ॥ ३५ ॥ वातश्लेष्मोद्भवाः श्लेष्मपित्ताद्दद्रुशतारुषी । पुण्डरीकं सविस्फोटं पामा चर्मदलं तथा ॥ ३६ ॥ सर्वैः स्यात्काकणं पूर्वं त्रिकं दद्रूः सकाकणा । पुंडरीकर्षजिह्वे च महाकुष्ठानि सप्त तु ॥ ३७ ॥ बादीसे कापालकुष्ठ, पित्तसे औदुंबर, कफसे मण्डल और विचर्चिका, वातपित्तसे ऋक्षजिह्व, वातकफसे चर्मकुष्ठ, किटिभ, सिध्म, अलस और विपादिका, कफपित्तसे दद्रु, शतारु, पुंडरीक, विस्फोटक, पामा, चर्मदल, त्रिदोषसे काकणकुष्ठ होय है, पहिले तीन (कापाल, उदुंबर और मण्डल), दद्रु, काकण, पुंडरीक और ऋक्षजिह्व ये सात महाकुष्ठ जानने ॥

किलासनिदान ।

भाषाटीकासमेत । (२५९) किलासनिदान । कुष्ठैकसम्भवं श्वित्रं किलासं चारुणं भवेत् । निर्दिष्टमपरिस्त्रावि त्रिधातूद्भवसंश्रयम् ॥ ३८ ॥ कुष्ठ होनेके जो कारण (विरुद्धभोजन पापकमीदि) कहे हैं उन्हीं कारणोंसे श्वित्र (सफेद कोढ) और किलास (लाल कोढ) ये होते हैं इनमें स्त्राव नहीं होय तथा ये तीन धातुओंका आश्रय करके रहते हैं अर्थात् तीन दोष और रुधिर मांस तथा मेद इनका आश्रय करके रहते हैं ॥ वातादिभेदसे उनके लक्षण । वाताद्रूक्षारुणं पित्तात्ताम्रं कमलपत्रवत् । सदाहं रोमविध्वंसि कफाच्छ्वेतं घनं गुरु ॥ ३९ ॥ सकण्डूरं क्रमाद्रक्तमांसमेदस्सु चादिशेत् । वर्णेनैवेहगुभयं कृच्छ्रं तच्चोत्तरोत्तरम् ॥ ४० ॥ बादीसे रूक्ष और लाल होय, पित्तसे ताम्बेके वर्ण समान तथा कमलपत्रके समान लाल आकृति होय और उसमें दाह होय, उसके ऊपरके बाल गिरपडे, कफके योगसे वह कोढ सफेद, गाढा और भारी होय और उसमें खुजली चले, रुधिर, मांस और मेदमें क्रमसे लाल ताम्र श्वेतवर्णसे किलास जानना अर्थात् दोष रक्ताश्रित होनेसे लाल, मांसाश्रित होनेसे तामेके रंग और मेदाश्रित होनेसे सफेद किलास होय है और वर्णसेही दोषसे उत्पन्न तथा व्रणसे उत्पन्न हुआ किलास, श्वित्र उत्तरो- त्तर (रसगतसे मांसगत और मांसगतसे मेदोगत) कृच्छ्रसाध्य हैं ॥ श्वित्रके साध्यासाध्य लक्षण । अशुक्लरोम बहलमसंश्लिष्टमथो नवम् । अनग्निदग्धजं साध्यं श्वित्रं वर्ज्यमतोऽन्यथा ॥ ४१ ॥ जिस श्वित्र कोढके ऊपरके बाल काले हों तथा जो पतले होकर आपसमें मिले नहीं, तथा नवीन श्वित्र हो, अग्निदग्ध न हो, वह श्वित्रकोढ साध्य जानना, इससे विपरीत असाध्य है ॥ १ कुष्ठेन सह एकं समानं विरुद्धाशनपापकर्मादिसम्भवो निदानं यस्य तत् कुष्ठैकसम्भ- वम् । २ त्रिधातूद्भवसंश्रयमिति-त्रिधातवस्त्रयो दोषास्तथा रक्तमांसमेदांसि उद्भवोय संश्रयोऽधिष्ठानं यस्य तत्तथा ॥

( २६० ) माधवनिदान ।

( २६० ) माधवनिदान । किलासके असाध्य लक्षण । गुह्यपाणितलौष्ठेषु जातमप्यचिरन्तनम् । वर्जनीयं विशेषेण किलासं सिद्धिमिच्छता ॥ ४२ ॥ गुदास्थानमें, हाथोंमें, पैरोंके तलुओंमें, होठोंमें प्रगट भया किलास कुष्ठ थोडे दिनका होय तौ भी यश मिलनेकी इच्छावाला वैद्य छोड दे ॥ सांसर्गिक रोग । प्रसङ्गाद्गात्रसंस्पर्शान्निःश्वासात्सहभोजनात् । सहशय्यासनाच्चापि वस्त्रमाल्यानुलेपनात् ॥ ४३ ॥ कुष्ठं ज्वरश्च शोषश्च नेत्राभिष्यन्द एव च । औपसर्गिकरोगाश्च संक्रामन्ति नरान्नरम् ॥ ४४ ॥ मैथुनादि प्रसंगसे अथवा शरीरके स्पर्शसे, श्वासके लगनेसे, साथ बैठकर एक- पात्रमें भोजन करनेसे, एक साथ एक शय्या ( पलंग ) पर सोनेसे तथा एकसाथ मिलकर बैठनेसे, पास रहनेसे, धारण कियेहुए वस्त्रको धारण करनेसे, सूंघे हुए पुष्पको सूंघनेसे अथवा पहरीहुई मालाको धारण करनेसे, लगायेहुए चन्दनमेंसे चन्दन लगानेसे कोढ ज्वर धातुशोष ( क्षयी रोग ), नेत्ररोग ( आंख दुखना ) औपसर्गिक रोग कहिये शीतलादिक और भूतोपसर्गादिक ये सांक्रामिकरोग एक पुरुषसे उडकर दूसरे मनुष्यके हो जाते हैं, इसीसे पूर्वोक्त रोगियोंका प्रसंगा- दिक न करे ॥ ४४ ॥ म्रियते यदि कुष्ठेन पुनर्जातस्य तद्भवेत् । नातो निन्द्यतरो रोगो यथा कुष्ठं प्रकीर्तितम् ॥ ४५ ॥ कुष्ठरोगी मरै तौ फिर उसके दूसरे जन्ममें यह कुष्ठरोग होय है, इस कुष्ठ- रोगके समान और दूसरा निंद्यरोग नहीं है। कुष्ठरोगकी निरुक्ति-“ कुत्सितं तिष्ठ- तीति ” । “ कुष्ठं भेषजरोगयोः ” इति हैमः ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां कुष्ठरोगनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ शीतपित्तोदर्दकोठनिदानम् ।

भाषाटीकासमेत । ( २६१ ) अथ शीतपित्तोदर्दकोठनिदानम् । ⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘ शीतपित्तके निदान और संप्राप्ति । शीतमारुतसंस्पर्शात्प्रदुष्टौ कफमारुतौ । पित्तेन सह संभूय बहिरन्तर्विसर्पतः ॥ १ ॥ शीतलपवनके लगनेसे कफ वायु दुष्ट होकर पित्तसे मिल भीतर रक्तादिकोंमें और बाहर त्वचा में विचरते हैं ॥ पूर्वरूप । पिपासारुचिहृल्लासमोहसादाङ्गगौरवम् । रक्तलोचनता तेषां पूर्वरूपस्य लक्षणम् ॥ २ ॥ प्यास, अरुचि, मुखमेंसे पानी गिरना, अंग टूटना और भारी होना, नेत्रमें लाली ये पूर्वरूप शीतपित्तके जानने ॥ उददर्दके लक्षण । वरटीदष्टसंस्थानः शोथः सजायते बहिः । सकण्डूस्तोदबहुलश्छर्दिज्वरविदाहवान् ॥ ३ ॥ उदर्दंमिति तं विद्याच्छीतपित्तमथापरे । वरटी (ततैया) के काटनेके समान त्वचाके ऊपर चकत्ता होजाय उसमें खुजली चले और सूई चुभानेकीसी पीडा होय, इसके संयोगसे वमन, ज्वर, सन्ताप और दाह होय, इस रोगको उदर्द कहते हैं, कोई इसको शीतपित्त कहते हैं, इसको लौकिकमें पित्ती कहते हैं, इसमें खुजली होय है, सो कफसे जानना, चोटनी बादीसे होय है और ओकारी सन्ताप और दाह ये पित्तसे होते हैं ऐसे जानना ॥ वाताधिकं शीतपित्तमुदर्दस्तु कफाधिकः ॥ ४ ॥ शीतपित्तमें वात प्रधान तथा उदर्द कफप्रधान जानना ॥ उदर्दका दूसरा धर्म । सोत्सङ्गैश्च सरागैश्च कण्डूमद्भिश्च मण्डलैः । शैशिरः कफजो व्याधिरुदर्दः परिकीर्तितः ॥ ५ ॥ सरदीसे कफका कोप होकर अंगके ऊपर लाल लाल चकत्ता उठें, उनमें खुजली बहुत चले और वे मण्डलके आकार गोल हों, बीचमें कुछ नीचे और आसपास ऊंचे होयँ, इस रोगको उदर्द कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( २६२ ) माधवनिदान ।

( २६२ ) माधवनिदान । कोठके लक्षण । असम्यग्वमनोदीर्णपित्तश्लेष्मान्ननिग्रहैः । मण्डलानि सकण्डूनि रागवन्ति बहूनि च । उत्कोठः सानुबन्धश्च कोठ इत्यभिधीयते ॥ ६ ॥ वमनकारक औषध सेवन करनेसे, अच्छी रीतिसे वमन न होनेसे, पित्त और कफ कुपित होनेसे अथवा स्वतः वमनके वेग आये भयेको रोकनेसे, देहके ऊपर लाल और बहुत चकत्ता उठें, उनमें खुजली चले, इस रोगको उत्कोठ कहते हैं और जो क्षणभरमें उत्पन्न होकर नाश हो जाय उसको कोठ कहते हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्धबोधिनीमाधुरीभाषाटीकायां शीतपित्तोदर्दकोठनिदानं समाप्तम् ॥ अथाम्लपित्तनिदानम् । निदानपूर्वक अम्लपित्तका स्वरूप । विरुद्धदुष्टाम्लविदाहिपित्तप्रकोपिपानान्नभुजो विदग्धम् । पित्तं स्वहेतूपचितं पुरा यत्तदम्लपित्तं प्रवदन्ति सन्तः ॥ १ ॥ विरुद्ध ( क्षीरमत्स्यादि ) और दुष्टान्न, खट्टा, दाहकारक, पित्त बढानेवाला ऐसा अन्न पानके सेवन करनेसे वर्षादिक ऋतुमें जलौषधिगत विदाहादि स्वकारणसे सञ्चित भया पित्त दुष्ट होय उसको अम्लपित्त कहते हैं ॥ अम्लपित्तके लक्षण । अविपाकक्लमोट्क्लेदतिक्ताम्लोद्गारगौरवैः । हृत्कण्ठदाहारुचिभिश्चाम्लपित्तं वदेद्भिषक् ॥ २ ॥ अन्नका न पचना, विना परिश्रम करे परिश्रमसा मालूम हो, वमन, कडुवी तथा खट्टी डकार आवे, देह भारी रहे, हृदय और कण्ठमें दाह होय, अरुचि होय ये लक्षण होनेसे अम्लपित्त वैद्य जाने ॥ अम्लपित्त दो प्रकारका-एक ऊर्ध्वगत तथा दूसरा अधोगत, उसमें प्रथम अधोगतके लक्षण । तृड्दाहमूर्च्छाभ्रममोहकारि प्रयात्यधो वा विविधप्रकारम् । हृल्लासकोठानलसादकर्णस्वेदांगपीतत्वकरं कदाचित् ॥ ३ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA