महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरणे जेतुमशक्यं तं ज्ञात्वा ते भरतर्षभ ।। शान्तास्ते विबुधाः सर्वे पार्थबाणाभिपीडिताः । भरतश्रेष्ठ! कुन्तीकुमार अर्जुनके साथ बारंबार युद्ध करके जब देवताओंने यह समझ लिया कि इन्हें समरांगणमें पराजित करना असम्भव है, तब वे अर्जुनके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण युद्धसे विरत हो गये (भाग खड़े हुए)। युगान्ते यानि दृश्यन्ते निमित्तानि महान्त्यपि । सर्वाणि तत्र दृश्यन्ते सुघोराणि महीपते ।। महाराज! प्रलयकालमें जो विनाशसूचक अत्यन्त भयंकर अपशकुन दिखायी देते हैं, वे सभी उस समय प्रत्यक्ष दीखने लगे। ततो देवगणाः सर्वे पार्थं समभिदुद्रुवुः । असम्भ्रान्तस्तु तान् दृष्ट्वा स तां देवमयीं चमूम् । त्वरितः फाल्गुनो गृह्य तीक्ष्णांस्तानाशुगांस्तदा ।। शक्रं देवांश्च सम्प्रेक्ष्य तस्थौ काल इवात्यये ।। तदनन्तर सब देवताओंने एक साथ अर्जुनपर धावा किया; परंतु उस देवसेनाको देखकर अर्जुनके मनमें घबराहट नहीं हुई। वे तुरंत ही तीखे बाण हाथमें लेकर इन्द्र और देवताओंकी ओर देखते हुए प्रलयकालमें सर्वसंहारक कालकी भाँति अविचलभावसे खड़े हो गये। ततो देवगणाः सर्वे बीभत्सुं सपुरंदराः । अवाकिरञ्छरव्रातैर्मानुषं तं महीपते ।। राजन्! अर्जुनको मानव समझकर इन्द्रसहित सब देवता उनपर बाणसमूहोंकी बौछार करने लगे। ततः पार्थो महातेजा गाण्डीवं गृह्य सत्वरः ।। वारयामास देवानां शरव्रातैः शरांस्तदा । परंतु महातेजस्वी पार्थने शीघ्रतापूर्वक गाण्डीव धनुष लेकर अपने बाणसमूहोंकी वर्षासे देवताओंके बाणोंको रोक दिया। पुनः क्रुद्धाः सुराः सर्वे मर्त्यं संख्ये महाबलाः ।। नानाशस्त्रैर्ववर्षुस्तं सव्यसाचिं महीपते ।। पिताजी! यह देख समस्त महाबली देवता पुनः कुपित हो गये और उस युद्धमें मरणधर्मा अर्जुनपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी बौछार करने लगे। तान् पार्थः शस्त्रवर्षान् वै विसृष्टान् विबुधैस्तदा । द्विधा त्रिधा च चिच्छेद ख एव निशितैः शरैः ।। अर्जुनने अपने तीखे बाणोंद्वारा देवताओंके छोड़े हुए उन अस्त्र-शस्त्रोंके आकाशमें ही दो-दो तीन-तीन टुकड़े कर दिये।