भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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प्राप्तिके लिये कौतूहलपूर्ण चित्तसे स्वयंवर देखने पांचालदेशकी ओर चल पड़े॥ १०९-११०॥

अङ्गारपर्णं निर्जित्य गङ्गाकूलेऽर्जुनस्तदा । सख्यं कृत्वा ततस्तेन तस्मादेव च शुश्रुवे ॥ १११ ॥ तापत्यमथ वासिष्ठमौर्वं चाख्यानमुत्तमम् । भ्रातृभिः सहितः सर्वैः पञ्चालानभितो ययौ ॥ ११२ ॥ पाञ्चालनगरे चापि लक्ष्यं भित्त्वा धनंजयः । द्रौपदीं लब्धवानत्र मध्ये सर्वमहीक्षिताम् ॥ ११३ ॥ भीमसेनार्जुनौ यत्र संरब्धान् पृथिवीपतीन् । शल्यकर्णौ च तरसा जितवन्तौ महामृधे ॥ ११४ ॥ चैत्ररथपर्वमें गंगाके तटपर अर्जुनने अंगारपर्ण गन्धर्वको जीतकर उससे मित्रता कर ली और उसीके मुखसे तपती, वसिष्ठ और और्वके उत्तम आख्यान सुने। फिर अर्जुनने वहाँसे अपने सभी भाइयोंके साथ पांचालकी ओर यात्रा की। तदनन्तर अर्जुनने पांचालनगरके बड़े-बड़े राजाओंसे भरी सभामें लक्ष्यवेध करके द्रौपदीको प्राप्त किया—यह कथा भी इसी पर्वमें है। वहीं भीमसेन और अर्जुनने रणांगणमें युद्धके लिये संनद्ध क्रोधान्ध राजाओंको तथा शल्य और कर्णको भी अपने पराक्रमसे पराजित कर दिया॥ १११—११४॥

दृष्ट्वा तयोश्च तद्वीर्यमप्रमेयममानुषम् । शङ्कमानौ पाण्डवांस्तान् रामकृष्णौ महामती ॥ ११५ ॥ जग्मतुस्तैः समागन्तुं शालां भार्गववेश्मनि । पञ्चानामेकपत्नीत्वे विमर्शो द्रुपदस्य च ॥ ११६ ॥ महामति बलराम एवं भगवान् श्रीकृष्णने जब भीमसेन एवं अर्जुनके अपरिमित और अतिमानुष बल-वीर्यको देखा, तब उन्हें यह शंका हुई कि कहीं ये पाण्डव तो नहीं हैं। फिर वे दोनों उनसे मिलनेके लिये कुम्हारके घर आये। इसके पश्चात् द्रुपदने ‘पाँचों पाण्डवोंकी एक ही पत्नी कैसे हो सकती है’—इस सम्बन्धमें विचार-विमर्श किया॥ ११५-११६॥

पञ्चेन्द्राणामुपाख्यानमत्रैवाद्भुतमुच्यते । द्रौपद्या देवविहितो विवाहश्चाप्यमानुषः ॥ ११७ ॥ इसी वैवाहिकपर्वमें पाँच इन्द्रोंका अद्भुत उपाख्यान और द्रौपदीके देवविहित तथा मनुष्य-परम्पराके विपरीत विवाहका वर्णन हुआ है॥ ११७॥

क्षत्तुश्च धृतराष्ट्रेण प्रेषणं पाण्डवान् प्रति । विदुरस्य च सम्प्राप्तिर्दर्शनं केशवस्य च ॥ ११८ ॥ इसके बाद धृतराष्ट्रने पाण्डवोंके पास विदुरजीको भेजा है, विदुरजी पाण्डवोंसे मिले हैं तथा उन्हें श्रीकृष्णका दर्शन हुआ है॥ ११८॥

खाण्डवप्रस्थवासश्च तथा राज्यार्धसर्जनम् ।