महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनारदस्याज्ञया चैव द्रौपद्याः समयक्रिया ॥ ११९ ॥ इसके पश्चात् धृतराष्ट्रका पाण्डवोंको आधा राज्य देना, इन्द्रप्रस्थमें पाण्डवोंका निवास करना एवं नारदजीकी आज्ञासे द्रौपदीके पास आने-जानेके सम्बन्धमें समय-निर्धारण आदि विषयोंका वर्णन है ॥ ११९ ॥
सुन्दोपसुन्दयोस्तद्वदाख्यानं परिकीर्तितम् । अनन्तरं च द्रौपद्या सहासीनं युधिष्ठिरम् ॥ १२० ॥ अनुप्रविश्य विप्रार्थे फाल्गुनो गृह्य चायुधम् । मोक्षयित्वा गृहं गत्वा विप्रार्थं कृतनिश्चयः ॥ १२१ ॥ समयं पालयन् वीरो वनं यत्र जगाम ह । पार्थस्य वनवासे च उलूप्या पथि संगमः ॥ १२२ ॥ इसी प्रसंगमें सुन्द और उपसुन्दके उपाख्यानका भी वर्णन है। तदनन्तर एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर द्रौपदीके साथ बैठे हुए थे। अर्जुनने ब्राह्मणके लिये नियम तोड़कर वहाँ प्रवेश किया और अपने आयुध लेकर ब्राह्मणकी वस्तु उसे प्राप्त करा दी और दृढ़ निश्चय करके वीरताके साथ मर्यादापालनके लिये वनमें चले गये। इसी प्रसंगमें यह कथा भी कही गयी है कि वनवासके अवसरपर मार्गमें ही अर्जुन और उलूपीका मेल-मिलाप हो गया ॥ १२०-१२२ ॥
पुण्यतीर्थानुसंयानं बभ्रुवाहनजन्म च । तत्रैव मोक्षयामास पञ्च सोऽप्सरसः शुभाः ॥ १२३ ॥ शापाद् ग्राहत्वमापन्ना ब्राह्मणस्य तपस्विनः । प्रभासतीर्थे पार्थेन कृष्णस्य च समागमः ॥ १२४ ॥ इसके बाद अर्जुनने पवित्र तीर्थोंकी यात्रा की है। इसी समय चित्रांगदाके गर्भसे बभ्रुवाहनका जन्म हुआ है और इसी यात्रामें उन्होंने पाँच शुभ अप्सराओंको मुक्तिदान किया, जो एक तपस्वी ब्राह्मणके शापसे ग्राह हो गयी थीं। फिर प्रभासतीर्थमें श्रीकृष्ण और अर्जुनके मिलनका वर्णन है ॥ १२३-१२४ ॥
द्वारकायां सुभद्रा च कामयानेन कामिनी । वासुदेवस्यानुमते प्राप्ता चैव किरीटिना ॥ १२५ ॥ तत्पश्चात् यह बताया गया है कि द्वारकामें सुभद्रा और अर्जुन परस्पर एक-दूसरेपर आसक्त हो गये, उसके बाद श्रीकृष्णकी अनुमतिसे अर्जुनने सुभद्राको हर लिया ॥ १२५ ॥
गृहीत्वा हरणं प्राप्ते कृष्णे देवकिनन्दने । अभिमन्योः सुभद्रायां जन्म चोत्तमतेजसः ॥ १२६ ॥ तदनन्तर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके दहेज लेकर पाण्डवोंके पास पहुँचनेकी और सुभद्राके गर्भसे परम तेजस्वी वीर बालक अभिमन्युके जन्मकी कथा है ॥ १२६ ॥
द्रौपद्यास्तनयानां च सम्भवोऽनुप्रकीर्तितः ।