भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1771

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द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

भीष्म और अर्जुनका युद्ध

धृतराष्ट्र उवाच

एवं व्यूढेष्वनीकेषु मामकेष्वितरेषु च ।
कथं प्रहरतां श्रेष्ठाः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! इस प्रकार मेरे और पाण्डवोंके सैनिकोंकी व्यूह-रचना हो जानेपर उन श्रेष्ठ योद्धाओंने किस प्रकार युद्ध प्रारम्भ किया? ॥ १ ॥

संजय उवाच

(तावकाः पाण्डवैः सार्धं यथायुध्यन्त तच्छृणु ।)
समं व्यूढेष्वनीकेषु संनद्धरुचिरध्वजम् ।
अपारमिव संदृश्य सागरप्रतिमं बलम् ॥ २ ॥
तेषां मध्ये स्थितो राजन् पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
अब्रवीत् तावकान् सर्वान् युध्यध्वमिति दंशिताः ॥ ३ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! आपके पुत्रोंने पाण्डवोंके साथ जिस प्रकार युद्ध किया, वह बताता हूँ, सुनिये। जब सब सेनाओंकी व्यूह-रचना हो गयी, तब समस्त सेना एक होकर एक अपार महासागरके समान प्रतीत होने लगी। उसमें सब ओर रथ आदिमें आबद्ध सुन्दर ध्वजा फहराती दिखायी देती थी। उसे देखकर सैनिकोंके बीचमें खड़ा हुआ आपका पुत्र दुर्योधन आपके सभी योद्धाओंसे इस प्रकार बोला—‘कवचधारी वीरो! युद्ध आरम्भ करो’ ॥ २-३ ॥

ते मनः क्रूरमाधाय समभित्यक्तजीविताः ।
पाण्डवानभ्यवर्तन्त सर्व एवोच्छ्रितध्वजाः ॥ ४ ॥
तब उन सबने मनको कठोर बनाकर प्राणोंका मोह छोड़कर ऊँची ध्वजाएँ फहराते हुए पाण्डवोंपर आक्रमण किया ॥ ४ ॥

ततो युद्धं समभवत् तुमुलं लोमहर्षणम् ।
तावकानां परेषां च व्यतिषक्तरथद्विपम् ॥ ५ ॥
फिर तो आपके और पाण्डवोंके सैनिकोंमें रोमांचकारी घमासान युद्ध होने लगा। उसमें उभय पक्षके रथ और हाथी एक-दूसरेसे गुँथ गये थे ॥ ५ ॥

मुक्तास्तु रथिभिर्बाणा रुक्मपुङ्खाः सुतेजसः ।
संनिपेतुरकुण्ठाग्रा नागेषु च हयेषु च ॥ ६ ॥