भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1772

रथियोंके छोड़े हुए सुवर्णमय पंखयुक्त तेजस्वी बाण कहीं भी कुण्ठित न होकर हाथियों और घोड़ोंपर पड़ने लगे ।। ६ ।।

तथा प्रवृत्ते संग्रामे धनुरुद्यम्य दंशितः । अभिपत्य महाबाहुर्भीष्मो भीमपराक्रमः ।। ७ ।। सौभद्रे भीमसेने च सात्यकौ च महारथे । कैकेये च विराटे च धृष्टद्युम्ने च पार्षते ।। ८ ।। एतेषु नरवीरेषु चेदिमत्स्येषु चाभिभूः । ववर्ष शरवर्षाणि वृद्धः कुरुपितामहः ।। ९ ।।

इस प्रकार युद्ध आरम्भ हो जानेपर भयंकर पराक्रमी एवं कुरुकुलके प्रभावशाली वृद्ध पितामह महाबाहु भीष्म धनुष उठाये कवच बाँधे सहसा आगे बढ़े और अभिमन्यु, भीमसेन, महारथी सात्यकि, केकय, विराट एवं द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न—इन सब नरवीरोंपर और चेदि तथा मत्स्यदेशीय योद्धाओंपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ।। ७—९ ।।

अभिद्यत ततो व्यूहस्तस्मिन् वीरसमागमे । सर्वेषामेव सैन्यानामासीद् व्यतिकरो महान् ।। १० ।।

वीरोंके इस संघर्षमें सेनाओंका व्यूह भंग हो गया और सभी सैनिकोंका आपसमें महान् सम्मिश्रण हो गया ।। १० ।।

सादिनो ध्वजिनश्चैव हताः प्रवरवाजिनः । विप्रद्रुतरथानीकाः समपद्यन्त पाण्डवाः ।। ११ ।।

घुड़सवार, ध्वजा धारण करनेवाले सैनिक तथा उत्तम घोड़े मारे गये। पाण्डवोंकी रथ-सेना पलायन करने लगी ।। ११ ।।

अर्जुनस्तु नरव्याघ्रो दृष्ट्वा भीष्मं महारथम् । वार्ष्णेयमब्रवीत् क्रुद्धो याहि यत्र पितामहः ।। १२ ।। एष भीष्मः सुसंक्रुद्धो वार्ष्णेय मम वाहिनीम् । नाशयिष्यति सुव्यक्तं दुर्योधनहिते रतः ।। १३ ।।

तब नरश्रेष्ठ अर्जुनने महारथी भीष्मको देखकर भगवान् श्रीकृष्णसे कुपित होकर कहा—'वार्ष्णेय! जहाँ पितामह भीष्म हैं, वहाँ चलिये। अन्यथा ये भीष्म अत्यन्त क्रोधमें भरकर निश्चय ही मेरी सारी सेनाका विनाश कर डालेंगे; क्योंकि इस समय ये दुर्योधनके हितमें तत्पर हैं ।। १२-१३ ।।

एष द्रोणः कृपः शल्यो विकर्णश्च जनार्दन । धार्तराष्ट्राश्च सहिता दुर्योधनपुरोगमाः ।। १४ ।। पञ्चालान् निहनिष्यन्ति रक्षिता दृढधन्वना । सोऽहं भीष्मं वधिष्यामि सैन्यहेतोर्जनार्दन ।। १५ ।।