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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

रथियोंके छोड़े हुए सुवर्णमय पंखयुक्त तेजस्वी बाण कहीं भी कुण्ठित न होकर हाथियों और घोड़ोंपर पड़ने लगे ।। ६ ।।

तथा प्रवृत्ते संग्रामे धनुरुद्यम्य दंशितः । अभिपत्य महाबाहुर्भीष्मो भीमपराक्रमः ।। ७ ।। सौभद्रे भीमसेने च सात्यकौ च महारथे । कैकेये च विराटे च धृष्टद्युम्ने च पार्षते ।। ८ ।। एतेषु नरवीरेषु चेदिमत्स्येषु चाभिभूः । ववर्ष शरवर्षाणि वृद्धः कुरुपितामहः ।। ९ ।।

इस प्रकार युद्ध आरम्भ हो जानेपर भयंकर पराक्रमी एवं कुरुकुलके प्रभावशाली वृद्ध पितामह महाबाहु भीष्म धनुष उठाये कवच बाँधे सहसा आगे बढ़े और अभिमन्यु, भीमसेन, महारथी सात्यकि, केकय, विराट एवं द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न—इन सब नरवीरोंपर और चेदि तथा मत्स्यदेशीय योद्धाओंपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ।। ७—९ ।।

अभिद्यत ततो व्यूहस्तस्मिन् वीरसमागमे । सर्वेषामेव सैन्यानामासीद् व्यतिकरो महान् ।। १० ।।

वीरोंके इस संघर्षमें सेनाओंका व्यूह भंग हो गया और सभी सैनिकोंका आपसमें महान् सम्मिश्रण हो गया ।। १० ।।

सादिनो ध्वजिनश्चैव हताः प्रवरवाजिनः । विप्रद्रुतरथानीकाः समपद्यन्त पाण्डवाः ।। ११ ।।

घुड़सवार, ध्वजा धारण करनेवाले सैनिक तथा उत्तम घोड़े मारे गये। पाण्डवोंकी रथ-सेना पलायन करने लगी ।। ११ ।।

अर्जुनस्तु नरव्याघ्रो दृष्ट्वा भीष्मं महारथम् । वार्ष्णेयमब्रवीत् क्रुद्धो याहि यत्र पितामहः ।। १२ ।। एष भीष्मः सुसंक्रुद्धो वार्ष्णेय मम वाहिनीम् । नाशयिष्यति सुव्यक्तं दुर्योधनहिते रतः ।। १३ ।।

तब नरश्रेष्ठ अर्जुनने महारथी भीष्मको देखकर भगवान् श्रीकृष्णसे कुपित होकर कहा—'वार्ष्णेय! जहाँ पितामह भीष्म हैं, वहाँ चलिये। अन्यथा ये भीष्म अत्यन्त क्रोधमें भरकर निश्चय ही मेरी सारी सेनाका विनाश कर डालेंगे; क्योंकि इस समय ये दुर्योधनके हितमें तत्पर हैं ।। १२-१३ ।।

एष द्रोणः कृपः शल्यो विकर्णश्च जनार्दन । धार्तराष्ट्राश्च सहिता दुर्योधनपुरोगमाः ।। १४ ।। पञ्चालान् निहनिष्यन्ति रक्षिता दृढधन्वना । सोऽहं भीष्मं वधिष्यामि सैन्यहेतोर्जनार्दन ।। १५ ।।

‘जनार्दन! सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले भीष्मके द्वारा सुरक्षित हो ये द्रोण, कृप, शल्य, विकर्ण तथा दुर्योधन आदि समस्त धृतराष्ट्रपुत्र मिलकर पांचाल योद्धाओंका संहार कर डालेंगे। अतः सेनाकी रक्षाके लिये मैं भीष्मका वध कर डालूँगा’ ।। १४-१५ ।।
तमब्रवीद् वासुदेवो यत्तो भव धनंजय ।
एष त्वां प्रापयिष्यामि पितामहरथं प्रति ।। १६ ।।
तब भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘धनंजय! सावधान हो जाओ। अभी तुम्हें भीष्मके रथके समीप पहुँचाये देता हूँ’ ।। १६ ।।
एवमुक्त्वा ततः शौरी रथं तं लोकविश्रुतम् ।
प्रापयामास भीष्मस्य रथं प्रति जनेश्वर ।। १७ ।।
जनेश्वर! ऐसा कहकर श्रीकृष्णने उस विश्वविख्यात रथको भीष्मजीके रथके निकट पहुँचा दिया ।। १७ ।।
चलद्बहुपताकेन बलाकावर्णवाजिना ।
समुच्छ्रितमहाभीमनदद्वानरकेतुना ।। १८ ।।
महता मेघनादेन रथेनामिततेजसा ।
विनिघ्नन् कौरवानीकं शूरसेनांश्च पाण्डवः ।। १९ ।।
प्रायाच्छरणदः शीघ्रं सुहृदां हर्षवर्धनः ।
उस रथपर बहुत-सी पताकाएँ फहरा रही थीं। उसमें बकपंक्तिके समान श्वेतवर्णवाले चार घोड़े जुते हुए थे। उसके अत्यन्त ऊँचे ध्वजके ऊपर एक वानर भयंकर गर्जना करता था। उस रथके पहियोंकी घरघराहट मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर थी तथा वह रथ अनन्त तेज (कान्ति)-से सम्पन्न था। उस विशाल रथपर आरूढ़ हो पाण्डुनन्दन अर्जुन, जो सबको शरण देनेवाले और सुहृदोंका आनन्द बढ़ानेवाले थे, कौरव-सेना एवं शूरसेन-देशीय योद्धाओंका वध करते हुए शीघ्रतापूर्वक भीष्मके पास गये ।। १८-१९ १/२ ।।
तमापतन्तं वेगेन प्रभिन्नमिव वारणम् ।। २० ।।
त्रासयन्तं रणे शूरान् मर्दयन्तं च सायकैः ।
सैन्धवप्रमुखैर्गुप्तः प्राच्यसौवीरकेकयैः ।। २१ ।।
सहसा प्रत्युदीयाय भीष्मः शान्तनवोऽर्जुनम् ।
मदकी धारा बहानेवाले गजराजकी भाँति उन्हें वेगसे आते और रणक्षेत्रमें सायकोंद्वारा शूरवीरोंका मर्दन करके उन्हें भयभीत करते देख जयद्रथ आदि राजाओं तथा पूर्वदेश, सौवीर राज्य और केकय प्रदेशके योद्धाओंसे सुरक्षित शान्तनुनन्दन भीष्म सहसा अर्जुनकी ओर बढ़े ।। २०-२१ १/२ ।।
को हि गाण्डीवधन्वानमन्यः कुरुपितामहात् ।। २२ ।।
द्रोणवैकर्तनाभ्यां वा रथी संयातुमर्हति ।

महाराज! कुरुकुलके पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य तथा कर्णके सिवा दूसरा कौन ऐसा रथी है, जो गाण्डीवधारी अर्जुनका सामना कर सके ॥ २२ १/२ ॥
ततो भीष्मो महाराज सर्वलोकमहारथः ॥ २३ ॥
अर्जुनं सप्तसप्तत्या नाराचानां समाचिनोत् ।
द्रोणश्च पञ्चविंशत्या कृपः पञ्चाशता शरैः ॥ २४ ॥
दुर्योधनश्चतुःषष्ट्या शल्यश्च नवभिः शरैः ।
सैन्धवो नवभिश्चैव शकुनिश्चापि पञ्चभिः ॥ २५ ॥
विकर्णो दशभिर्भल्लै राजन् विव्याध पाण्डवम् ।
नरेश्वर! तदनन्तर सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात महारथी भीष्मने अर्जुनपर सतहत्तर बाण चलाये, द्रोणने पचीस, कृपाचार्यने पचास, दुर्योधनने चौंसठ, शल्यने नौ, जयद्रथने नौ, शकुनिने पाँच तथा विकर्णने दस भल्ल नामक बाणों-द्वारा पाण्डुनन्दन अर्जुनको बींध डाला ॥ २३—२५ १/२ ॥
स तैर्विद्धो महेष्वासः समन्तान्निशितैः शरैः ॥ २६ ॥
न विव्यथे महाबाहुर्भिद्यमान इवाचलः ।
इन समस्त तीखे बाणोंद्वारा चारों ओरसे विद्ध होनेपर भी महाधनुर्धर महाबाहु अर्जुन तनिक भी व्यथित नहीं हुए। ऐसा जान पड़ता था, मानो किसी पर्वतको बाणोंसे बींध दिया हो ॥ २६ १/२ ॥
स भीष्मं पञ्चविंशत्या कृपं च नवभिः शरैः ॥ २७ ॥
द्रोणं षष्ट्या नरव्याघ्रो विकर्णं च त्रिभिः शरैः ।
शल्यं चैव त्रिभिर्बाणै राजानं चैव पञ्चभिः ॥ २८ ॥
प्रत्यविध्यदमेयात्मा किरीटी भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् अमेय आत्मबलसे सम्पन्न, किरीटधारी पुरुषसिंह अर्जुनने भीष्मको पचीस, कृपाचार्यको नौ, द्रोणको साठ, विकर्णको तीन, शल्यको तीन तथा राजा दुर्योधनको पाँच बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २७-२८ १/२ ॥
तं सात्यकिर्विराटश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ २९ ॥
द्रौपदेयाऽभिमन्युश्च परिवव्रुर्धनंजयम् ।
उस समय सात्यकि, विराट, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पाँचों पुत्र और अभिमन्यु—इन सबने अर्जुनको उनकी रक्षाके लिये चारों ओरसे घेर लिया ॥ २९ १/२ ॥
ततो द्रोणं महेष्वासं गाङ्गेयस्य प्रिये रतम् ॥ ३० ॥
अभ्यवर्तत पाञ्चाल्यः संयुक्तः सह सोमकैः ।
तदनन्तर गंगानन्दन भीष्मका प्रिय करनेमें लगे हुए महाधनुर्धर द्रोणाचार्यपर सोमकोंसहित धृष्टद्युम्नने आक्रमण किया ॥ ३० १/२ ॥
भीष्मस्तु रथिनां श्रेष्ठो राजन् विव्याध पाण्डवम् ॥ ३१ ॥

अशीत्या निशितैर्बाणैस्ततोऽक्रोशन्त तावकाः ।
राजन्! तब रथियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने पाण्डुनन्दन अर्जुनको अस्सी पैने बाण मारकर बींध डाला। यह देखकर आपके सैनिक हर्षसे कोलाहल करने लगे ।। ३१ १/२ ।।
तेषां तु निनदं श्रुत्वा सहितानां प्रहृष्टवत् ।। ३२ ।।
प्रविवेश ततो मध्यं नरसिंहः प्रतापवान् ।
तेषां महारथानां स मध्यं प्राप्य धनंजयः ।। ३३ ।।
चिक्रीड धनुषा राजँल्लक्ष्यं कृत्वा महारथान् ।
ततो दुर्योधनो राजा भीष्ममाह जनेश्वरः ।। ३४ ।।
पीड्यमानं स्वकं सैन्यं दृष्ट्वा पार्थेन संयुगे ।
उन समस्त कौरवोंका हर्षनाद सुनकर प्रतापी पुरुषसिंह अर्जुनने उनकी सेनाके भीतर प्रवेश किया। राजन्! उन महारथियोंके भीतर पहुँचकर अर्जुन उन सबको अपने बाणोंका निशाना बनाकर धनुषसे खेल करने लगे। तब प्रजापालक राजा दुर्योधनने अर्जुनके द्वारा युद्धमें अपनी सेनाको पीड़ित हुई देख भीष्मसे कहा— ।। ३२-३४ १/२ ।।
एष पाण्डुसुतस्तात कृष्णेन सहितो बली ।। ३५ ।।
यततां सर्वसैन्यानां मूलं नः परिकृन्तति ।
त्वयि जीवति गाङ्गेय द्रोणे च रथिनां वरे ।। ३६ ।।
‘तात! ये पाण्डुके बलवान् पुत्र अर्जुन श्रीकृष्णके साथ आकर समस्त सैन्योंके प्रयत्नशील होनेपर भी हमलोगोंका मूलोच्छेद कर रहे हैं। गंगानन्दन! आपके तथा रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यके जीते-जी हमारे सैनिक मारे जा रहे हैं ।। ३५-३६ ।।
त्वत्कृते चैव कर्णोऽपि न्यस्तशस्त्रो विशाम्पते ।
न युध्यति रणे पार्थ हितकामः सदा मम ।। ३७ ।।
स तथा कुरु गाङ्गेय यथा हन्येत फाल्गुनः ।
‘प्रजानाथ! आपहीके कारण कर्णने भी हथियार डाल दिया है और वह रणभूमिमें अर्जुनसे युद्ध नहीं कर रहा है। कर्ण मेरा सदा हित चाहनेवाला है। गंगानन्दन! आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे अर्जुन मार डाले जायँ’ ।। ३७ १/२ ।।
एवमुक्तस्ततो राजन् पिता देवव्रतस्तव ।। ३८ ।।
धिक् क्षात्रं धर्ममित्युक्त्वा प्रायात् पार्थरथं प्रति ।
राजन्! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर आपके पितृ-तुल्य भीष्म ‘क्षत्रिय-धर्मको धिक्कार है’ ऐसा कहकर अर्जुनके रथकी ओर चले ।। ३८ १/२ ।।
उभौ श्वेतहयौ राजन् संसक्तौ प्रेक्ष्य पार्थिवाः ।। ३९ ।।
सिंहनादान् भृशं चक्रुः शङ्खान् दध्मुश्च मारिष ।
महाराज! उन दोनोंके रथोंमें श्वेत घोड़े जुते हुए थे। आर्य! उन्हें एक-दूसरेसे भिड़े हुए देख सब राजा जोर-जोरसे सिंहनाद करने और शंख फूँकने लगे ।। ३९ १/२ ।।

द्रौणिर्दुर्योधनश्चैव विकर्णश्च तवात्मजः ॥ ४० ॥
परिवार्य रणे भीष्मं स्थिता युद्धाय मारिष ।
आर्य! उस समय अश्वत्थामा, दुर्योधन और आपके पुत्र विकर्ण—ये सभी समरांगणमें भीष्मको घेरकर युद्धके लिये खड़े थे ॥ ४० १/२ ॥

तथैव पाण्डवाः सर्वे परिवार्य धनंजयम् ॥ ४१ ॥
स्थिता युद्धाय महते ततो युद्धमवर्तत ।
इसी प्रकार समस्त पाण्डव भी अर्जुनको सब ओरसे घेरकर महायुद्धके लिये वहाँ डटे हुए थे, अतः उनमें भारी युद्ध छिड़ गया ॥ ४१ १/२ ॥

गाङ्गेयस्तु रणे पार्थमानर्च्छन्नवभिः शरैः ॥ ४२ ॥
तमर्जुनः प्रत्यविध्यद् दशभिर्मर्मभेदिभिः ।
गंगानन्दन भीष्मने उस रणक्षेत्रमें नौ बाणोंसे अर्जुनको गहरी चोट पहुँचायी। तब अर्जुनने भी उन्हें दस मर्मभेदी बाणोंद्वारा बींध डाला ॥ ४२ १/२ ॥

ततः शरसहस्रेण सुप्रयुक्तेन पाण्डवः ॥ ४३ ॥
अर्जुनः समरश्लाघी भीष्मस्यावारयद् दिशः ।
तदनन्तर युद्धकी श्लाघा रखनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनने अच्छी तरह छोड़े हुए एक हजार बाणोंद्वारा भीष्मको सब ओरसे रोक दिया ॥ ४३ १/२ ॥

शरजालं ततस्तत् तु शरजालेन मारिष ॥ ४४ ॥
वारयामास पार्थस्य भीष्मः शान्तनवस्तदा ।
माननीय महाराज! उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने अर्जुनके इस बाणसमूहका अपने बाणसमूहसे निवारण कर दिया ॥ ४४ १/२ ॥

उभौ परमसंहृष्टावुभौ युद्धाभिनन्दिनौ ॥ ४५ ॥
निर्विशेषमयुध्येतां कृतप्रतिकृतैषिणौ ।
वे दोनों वीर अत्यन्त हर्षमें भरकर युद्धका अभिनन्दन करनेवाले थे। दोनों ही दोनोंके किये हुए प्रहारका प्रतीकार करते हुए समानभावसे युद्ध करने लगे ॥ ४५ १/२ ॥

भीष्मचापविमुक्तानि शरजालानि संघशः ॥ ४६ ॥
शीर्यमाणान्यदृश्यन्त भिन्नान्यर्जुनसायकैः ।
भीष्मके धनुषसे छूटे हुए सायकोंके समूह अर्जुनके बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर इधर-उधर बिखरे दिखायी देने लगे ॥ ४६ १/२ ॥

तथैवार्जुनमुक्तानि शरजालानि सर्वशः ॥ ४७ ॥
गाङ्गेयशरनुन्नानि प्रापतन्त महीतले ।
इसी प्रकार अर्जुनके छोड़े हुए बाणसमूह गंगानन्दन भीष्मके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो पृथ्वीपर सब ओर पड़े हुए थे ॥ ४७ १/२ ॥

अर्जुनः पञ्चविंशत्या भीष्ममार्च्छच्छितैः शरैः ॥ ४८ ॥

भीष्मोऽपि समरे पार्थं विव्याध निशितैः शरैः । अर्जुनने पचीस तीखे बाणोंसे मारकर भीष्मको पीड़ित कर दिया। फिर भीष्मने भी समरभूमिमें अपने तीक्ष्ण सायकोंद्वारा अर्जुनको बींध दिया ॥ ४८ ½ ॥ अन्योन्यस्य हयान् विद्ध्वा ध्वजौ च सुमहाबलौ ॥ ४९ ॥ रथेषां रथचक्रे च चिक्रीडतुररिंदमौ । वे दोनों शत्रुओंका दमन करनेवाले तथा अत्यन्त बलवान् थे। अतः एक-दूसरेके घोड़ों, ध्वजाओं, रथके ईषादण्ड तथा पहियोंको बाणोंसे बींधकर खेल-सा करने लगे ॥ ४९ ½ ॥ ततः क्रुद्धो महाराज भीष्मः प्रहरतां वरः ॥ ५० ॥ वासुदेवं त्रिभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे । महाराज! तदनन्तर प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ भीष्मने कुपित होकर तीन बाणोंसे भगवान् श्रीकृष्णकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५० ½ ॥ भीष्मचापच्युतैस्तैस्तु निर्विद्धो मधुसूदनः ॥ ५१ ॥ विराज रणे राजन् सपुष्प इव किंशुकः । राजन्! भीष्मजीके धनुषसे छूटे हुए उन बाणोंसे विद्ध होकर भगवान् मधुसूदन रणभूमिमें रक्तरंजित हो खिले हुए पलाशके वृक्षके समान शोभा पाने लगे ॥ ५१ ½ ॥ ततोऽर्जुनो भृशं क्रुद्धो निविद्धं प्रेक्ष्य माधवम् ॥ ५२ ॥ सारथिं कुरुवृद्धस्य निर्बिभेद शितैः शरैः । श्रीकृष्णको घायल हुआ देख अर्जुन अत्यन्त कुपित हो उठे और उन्होंने तीखे सायकोंद्वारा कुरुकुलवृद्ध भीष्मके सारथिको विदीर्ण कर डाला ॥ ५२ ½ ॥ यतमानौ तु तौ वीरावन्योन्यस्य वधं प्रति ॥ ५३ ॥ न शक्नुतां तदान्योन्यमभिसंधातुमाहवे । इस प्रकार वे दोनों वीर एक-दूसरेके वधके लिये पूरा प्रयत्न कर रहे थे; तथापि वे युद्धभूमिमें परस्पर अभिसंधान (घातक प्रहार) करनेमें सफल न हो सके ॥ ५३ ½ ॥ तौ मण्डलानि चित्राणि गतप्रत्यागतानि च ॥ ५४ ॥ अदर्शयेतां बहुधा सूतसामर्थ्यलाघवात् । वे दोनों अपने सारथिकी शक्ति तथा शीघ्रकारिताके कारण नाना प्रकारके विचित्र मण्डल, आगे बढ़ने और पीछे हटने आदिके पैंतरे दिखाने लगे ॥ ५४ ½ ॥ अन्तरं च प्रहारेषु तर्कयन्तौ परस्परम् ॥ ५५ ॥ राजन्नन्तरमार्गस्थौ स्थितावास्तां मुहुर्मुहुः । राजन्! दोनों ही एक-दूसरेके प्रहारोंमें छिद्र ढूँढ़नेके लिये सतर्क थे। वे बारंबार छिद्रान्वेषणके मार्गमें स्थित हो छिद्र देखनेमें संलग्न रहते थे ॥ ५५ ½ ॥ उभौ सिंहखवोन्मिश्रं शङ्खशब्दं च चक्रतुः ॥ ५६ ॥ तथैव चापनिर्घोषं चक्रतुस्तौ महारथौ ।

वे दोनों महारथी सिंहनादसे मिला हुआ शंखनाद करते और धनुषकी टंकार फैलाते रहते थे ॥ ५६ १/२ ॥ तयोः शङ्खनिनादेन रथनेमिस्वनेन च ॥ ५७ ॥ दारिता सहसा भूमिश्चकम्पे च ननाद च । उनकी शंखध्वनि तथा रथके पहियोंकी घरघराहटसे पृथ्वी सहसा विदीर्ण-सी होकर काँपने और आर्तनाद करने लगी ॥ ५७ १/२ ॥ नोभयोरन्तरं कश्चिद् ददृशे भरतर्षभ ॥ ५८ ॥ बलिनौ युद्धदुर्धर्षावन्योन्यसदृशावुभौ । भरतश्रेष्ठ! वे दोनों वीर बलवान्, युद्धमें दुर्जय तथा एक-दूसरेके अनुरूप थे। अतः ढूँढ़नेपर भी कोई उनमेंसे किसीका अन्तर न देख सका ॥ ५८ १/२ ॥ चिह्नमात्रेण भीष्मं तु प्रजज्ञुस्तत्र कौरवाः ॥ ५९ ॥ तथा पाण्डुसुताः पार्थं चिह्नमात्रेण जज्ञिरे । उस समय कौरवोंने भीष्मको तालध्वज आदि चिह्नमात्रसे ही पहचाना। इसी प्रकार पाण्डुपुत्रोंने भी कपिध्वज आदि चिह्नमात्रसे ही पार्थकी पहचान की ॥ ५९ १/२ ॥ तयोर्नृवरयोर्दृष्ट्वा तादृशं तं पराक्रमम् ॥ ६० ॥ विस्मयं सर्वभूतानि जग्मुर्भारत संयुगे । भारत! उस संग्राममें उन दोनों श्रेष्ठ पुरुषोंके वैसे पराक्रमको देखकर सम्पूर्ण प्राणी बड़े विस्मयमें पड़ गये ॥ ६० १/२ ॥ न तयोर्विवरं कश्चिद् रणे पश्यति भारत ॥ ६१ ॥ धर्मे स्थितस्य हि यथा न कश्चिद् वृजिनं क्वचित् । भरतनन्दन! जैसे कोई धर्मनिष्ठ पुरुषमें कहीं कोई पाप नहीं देख पाता, उसी प्रकार कोई भी रणक्षेत्रमें उन दोनों योद्धाओंका छिद्र नहीं देख पाता था ॥ ६१ १/२ ॥ उभौ च शरजालेन तावदृश्यौ बभूवतुः ॥ ६२ ॥ प्रकाशौ च पुनस्तूर्णं बभूवतुरुभौ रणे । दोनों ही संग्रामभूमिमें एक-दूसरेके बाणसमूहोंसे आच्छादित होकर अदृश्य हो जाते और उन्हें छिन्न-भिन्न करके शीघ्र ही प्रकाशमें आ जाते थे ॥ ६२ १/२ ॥ तत्र देवाः सगन्धर्वाश्चारणाश्चर्षिभिः सह ॥ ६३ ॥ अन्योन्यं प्रत्यभाषन्त तयोर्दृष्ट्वा पराक्रमम् । न शक्यौ युधि संरब्धौ जेतुमेतौ कथञ्चन ॥ ६४ ॥ सदेवासुरगन्धर्वैर्लोकैरपि महारथौ ।

वहाँ आये हुए देवता, गन्धर्व, चारण और महर्षिगण उन दोनोंका पराक्रम देखकर आपसमें कहने लगे कि ये दोनों महारथी वीर रोषावेशमें भरे हुए हैं; अतः ये देवता, असुर और गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण लोकोंके द्वारा भी किसी प्रकार जीते नहीं जा सकते ॥ ६३-६४ १/२ ॥

आश्चर्यभूतं लोकेषु युद्धमेतन्महाद्भुतम् ॥ ६५ ॥ नैतादृशानि युद्धानि भविष्यन्ति कथञ्चन । न हि शक्यो रणे जेतुं भीष्मः पार्थेन धीमता ॥ ६६ ॥ सधनुः सरथः साश्वः प्रवपन् सायकान् रणे ।

यह अत्यन्त अद्भुत युद्ध सम्पूर्ण लोकोंके लिये आश्चर्यजनक घटना है। भविष्यमें ऐसे युद्ध होनेकी किसी प्रकार भी सम्भावना नहीं है। बुद्धिमान् पार्थ रणभूमिमें भीष्मको कदापि जीत नहीं सकते; क्योंकि वे समरभूमिमें रथ, घोड़े और धनुषसहित उपस्थित हो बाणोंको बीजकी भाँति बो रहे हैं ॥ ६५-६६ १/२ ॥

तथैव पाण्डवं युद्धे देवैरपि दुरासदम् ॥ ६७ ॥ न विजेतुं रणे भीष्म उत्सहेत धनुर्धरम् । आलोकादपि युद्धं हि सममेतद् भविष्यति ॥ ६८ ॥

इसी प्रकार भीष्म भी युद्धमें देवताओंके लिये भी दुर्जय, गाण्डीवधारी पाण्डुपुत्र अर्जुनको जीतनेमें समर्थ नहीं हो सकते। यदि ये दोनों लड़ते रहें तो जबतक यह संसार स्थित है, तबतक इन दोनोंका यह युद्ध समानरूपसे ही चलता रहेगा ॥ ६७-६८ ॥

इति स्म वाचोऽश्रूयन्त प्रोच्चरन्त्यस्ततस्ततः । गाङ्गेयार्जुनयोः संख्ये स्तवयुक्ता विशाम्पते ॥ ६९ ॥

प्रजानाथ! इस प्रकार रणभूमिमें भीष्म और अर्जुनकी स्तुतिप्रशंसासे युक्त बहुत-सी बातें इधर-उधर लोगोंके मुँहसे निकलती और सुनायी देती थीं ॥ ६९ ॥

त्वदीयास्तु तदा योधाः पाण्डवेयाश्च भारत । अन्योन्यं समरे जघ्नुस्तयोस्तत्र पराक्रमे ॥ ७० ॥

भारत! उस समय वहाँ उन दोनों वीरोंके पराक्रम करते समय युद्धस्थलमें आपके और पाण्डवपक्षके योद्धा भी एक-दूसरेको मार रहे थे ॥ ७० ॥

शितधारैस्तथा खड्गैर्विमलैश्च परश्वधैः । शरैरन्यैश्च बहुभिः शस्त्रैर्नानाविधैरपि ॥ ७१ ॥ उभयोः सेनयोः शूरा न्यकृन्तन्त परस्परम् ।

तीखी धारवाले खड्गों, चमचमाते हुए फरसों, अन्य अनेक प्रकारके बाणों तथा भाँति-भाँतिके शस्त्रोंसे दोनों सेनाओंके शूरवीर एक-दूसरेको मारते थे ॥ ७१ १/२ ॥

वर्तमाने तथा घोरे तस्मिन् युद्धे सुदारुणे । द्रोणपाञ्चाल्ययो राजन् महानासीत् समागमः ॥ ७२ ॥

राजन्! जहाँ एक ओर इस प्रकार भयानक तथा अत्यन्त दारुण युद्ध चल रहा था, वहीं दूसरी ओर द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नमें भयंकर मुठभेड़ हो रही थी ।। ७२ ।।

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मार्जुनयुद्धे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्म और अर्जुनका युद्धविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५२ ।।

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७२ १/३ श्लोक हैं।]

अध्याय (पृष्ठ 1781)

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

धृष्टद्युम्न तथा द्रोणाचार्यका युद्ध

धृतराष्ट्र उवाच

कथं द्रोणो महेष्वासः पाञ्चाल्यश्चापि पार्षतः ।
उभौ समीयुतुर्यत्तौ तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! महाधनुर्धर द्रोणाचार्य तथा द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न—ये दोनों वीर किस प्रकार प्रयत्नपूर्वक आपसमें युद्ध कर रहे थे, वह सब वृत्तान्त मुझसे कहो ॥ १ ॥

दिष्टमेव परं मन्ये पौरुषादिति मे मतिः ।
यत्र शान्तनवो भीष्मो नातरद् युधि पाण्डवम् ॥ २ ॥
मैं तो पुरुषार्थसे अधिक प्रबल भाग्यको ही मानता हूँ और इसीपर विश्वास करता हूँ, जिसके अनुसार शान्तनुनन्दन भीष्म युद्धमें पाण्डुपुत्र अर्जुनसे पार न पा सके ॥ २ ॥

भीष्मो हि समरे क्रुद्धो हन्याल्लोकांश्चराचरान् ।
स कथं पाण्डवं युद्धे नातरत् संजयौजसा ॥ ३ ॥
संजय! भीष्म रणक्षेत्रमें कुपित हो जायँ तो वे चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण लोकोंको मार सकते हैं। फिर वे अपने पराक्रमद्वारा युद्धमें पाण्डुकुमार अर्जुनसे क्यों न पार पा सके? ॥ ३ ॥

संजय उवाच

शृणु राजन् स्थिरो भूत्वा युद्धमेतत् सुदारुणम् ।
न शक्याः पाण्डवा जेतुं देवैरपि सवासवैः ॥ ४ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! पाण्डवोंको तो इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी नहीं जीत सकते। अब आप इस अत्यन्त भयंकर युद्धका वृत्तान्त स्थिर होकर सुनिये ॥ ४ ॥

द्रोणस्तु निशितैर्बाणैर्धृष्टद्युम्नमविध्यत ।
सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥ ५ ॥
द्रोणाचार्यने अपने तीखे बाणोंसे धृष्टद्युम्नको घायल कर दिया और उनके सारथिको भल्लके द्वारा मारकर रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ॥ ५ ॥

तथास्य चतुरो वाहांश्चतुर्भिः सायकोत्तमैः ।
पीडयामास संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नस्य मारिष ॥ ६ ॥
आर्य! क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्यने चार उत्तम सायकोंसे धृष्टद्युम्नके चारों घोड़ोंको भी बहुत पीड़ा दी ॥ ६ ॥

धृष्टद्युम्नस्ततो द्रोणं नवत्या निशितैः शरैः ।

विव्याध प्रहसन् वीरस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ७ ॥
तब धृष्टद्युम्नने हँसकर नब्बे पैने बाणोंसे द्रोणाचार्यको घायल कर दिया और कहा —'खड़े रहो, खड़े रहो' ॥ ७ ॥
ततः पुनरमेयात्मा भारद्वाजः प्रतापवान् ।
शरैः प्रच्छादयामास धृष्टद्युम्नममर्षणम् ॥ ८ ॥
तदनन्तर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न प्रतापी द्रोणाचार्यने पुनः अमर्षशील धृष्टद्युम्नको अपने बाणोंसे ढक दिया ॥ ८ ॥
आददे च शरं घोरं पार्षतान्तचिकीर्षया ।
शक्राशनिसमस्पर्शं कालदण्डमिवापरम् ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् धृष्टद्युम्नका अन्त कर डालनेकी इच्छासे द्वितीय कालदण्डके समान एक भयंकर बाण हाथमें लिया, जिसका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान कठोर था ॥ ९ ॥
हाहाकारो महानासीत् सर्वसैन्येषु भारत ।
तमिषुं संधितं दृष्ट्वा भारद्वाजेन संयुगे ॥ १० ॥
भरतनन्दन! युद्धमें द्रोणाचार्यके द्वारा उस बाणका संधान होता देख सम्पूर्ण पाण्डव-सेनामें महान् हाहाकार मच गया ॥ १० ॥
तत्राद्भुतमपश्याम धृष्टद्युम्नस्य पौरुषम् ।
यदेकः समरे वीरस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ ११ ॥
उस समय मैंने वहाँ धृष्टद्युम्नका अद्भुत पराक्रम देखा। वह वीर समरांगणमें अकेला ही पर्वतके समान अविचल भावसे खड़ा रहा ॥ ११ ॥
तं च दीप्तं शरं घोरमायान्तं मृत्युमात्मनः ।
चिच्छेद शरवृष्टिं च भारद्वाजे मुमोच ह ॥ १२ ॥
अपने लिये मृत्यु बनकर आते हुए उस भयंकर तेजस्वी बाणको देखकर धृष्टद्युम्नने तत्काल ही उसे काट गिराया और द्रोणाचार्यपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १२ ॥
तत उच्चुक्रुशुः सर्वे पञ्चालाः पाण्डवैः सह ।
धृष्टद्युम्नेन तत् कर्म कृतं दृष्ट्वा सुदुष्करम् ॥ १३ ॥
धृष्टद्युम्नके द्वारा किये हुए उस अत्यन्त दुष्कर कर्मको देखकर पाण्डवसहित समस्त पांचाल वीर हर्षसे कोलाहल कर उठे ॥ १३ ॥
ततः शक्तिं महावेगां स्वर्णवैदूर्यभूषिताम् ।
द्रोणस्य निधनाकाङ्क्षी चिक्षेप स पराक्रमी ॥ १४ ॥
तदनन्तर द्रोणाचार्यकी मृत्यु चाहनेवाले पराक्रमी वीर धृष्टद्युम्नने उनके ऊपर सुवर्ण और वैदूर्यमणिसे भूषित अत्यन्त वेगशालिनी शक्ति चलायी ॥ १४ ॥
तामापतन्तीं सहसा शक्तिं कनकभूषिताम् ।
त्रिधा चिच्छेद समरे भारद्वाजो हसन्निव ॥ १५ ॥

उस सुवर्णभूषित शक्तिको सहसा आती देख द्रोणाचार्यने समरभूमिमें हँसते-हँसते उसके तीन टुकड़े कर दिये ॥ १५ ॥
शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ।
ववर्ष शरवर्षाणि द्रोणं प्रति जनेश्वर ॥ १६ ॥
जनेश्वर! अपनी शक्तिको नष्ट हुई देख प्रतापी धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यपर पुनः बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १६ ॥
शरवर्षं ततस्तत् तु संनिवार्य महायशाः ।
द्रोणो द्रुपदपुत्रस्य मध्ये चिच्छेद कार्मुकम् ॥ १७ ॥
तब महायशस्वी द्रोणने उस बाण-वर्षाका निवारण करके द्रुपदपुत्रके धनुषको बीचसे ही काट डाला ॥ १७ ॥
सच्छिन्नधन्वा समरे गदां गुर्वीं महायशाः ।
द्रोणाय प्रेषयामास गिरिसारमयीं बली ॥ १८ ॥
धनुष कट जानेपर महायशस्वी बलवान् वीर धृष्टद्युम्नने समरभूमिमें द्रोणाचार्यपर लोहेकी बनी हुई एक भारी गदा चलायी ॥ १८ ॥
सा गदा वेगवन्मुक्ता प्रायाद् द्रोणजिघांसया ।
तत्राद्भुतमपश्याम भारद्वाजस्य विक्रमम् ॥ १९ ॥
द्रोणाचार्यके वधकी इच्छासे वेगपूर्वक छोड़ी हुई वह गदा बड़े जोरसे चली; परंतु वहाँ हमलोगोंने उस समय द्रोणाचार्यका अद्भुत पराक्रम देखा ॥ १९ ॥
लाघवाद् व्यंसयामास गदां हेमविभूषिताम् ।
व्यंसयित्वा गदां तां च प्रेषयामास पार्षतम् ॥ २० ॥
भल्लान् सुनिशितान् पीतान् रुक्मपुंखान् सुदारुणान् ।
ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे ॥ २१ ॥
उन्होंने बड़ी फुर्तीसे उस स्वर्णभूषित गदाको व्यर्थ कर दिया। इस प्रकार उस गदाको निष्फल करके द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्नपर सुवर्णमय पंखोंसे युक्त अत्यन्त तीक्ष्ण पानीदार और भयंकर ‘भल्ल’ नामक बाण चलाये। वे बाण धृष्टद्युम्नका कवच छेदकर रणक्षेत्रमें उनका रक्त पीने लगे ॥ २०-२१ ॥
अथान्यद् धनुरदाय धृष्टद्युम्नो महारथः ।
द्रोणं युधि पराक्रम्य शरैर्विव्याध पञ्चभिः ॥ २२ ॥
तब महारथी धृष्टद्युम्नने दूसरा धनुष लेकर युद्धमें पराक्रमपूर्वक पाँच बाण मारकर द्रोणाचार्यको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ २२ ॥
रुधिराक्तौ ततस्तौ तु शुशुभाते नरर्षभौ ।
वसन्तसमये राजन् पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ २३ ॥

राजन्! उस समय वे दोनों नरश्रेष्ठ लहूलुहान होकर वसंत-ऋतुमें खिले हुए दो पलाश वृक्षोंकी भाँति अत्यन्त शोभा पाने लगे ॥ २३ ॥

अमर्षितस्ततो राजन् पराक्रम्य चमूमुखे । द्रोणो द्रुपदपुत्रस्य पुनश्चिच्छेद कार्मुकम् ॥ २४ ॥

राजन्! तब उस सेनाके अग्रभागमें खड़े हो अमर्षमें भरे हुए द्रोणाचार्यने पराक्रम प्रकट करते हुए पुनः धृष्टद्युम्नका धनुष काट दिया ॥ २४ ॥

अथैनं छिन्नधन्वानं शरैः संनतपर्वभिः । अभ्यवर्षदमेयात्मा वृष्ट्या मेघ इवाचलम् ॥ २५ ॥

तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न द्रोणाचार्यने जिसका धनुष कट गया था, उन धृष्टद्युम्नपर झुकी हुई गाँठवाले बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, मानो मेघ किसी पर्वतपर जलकी बूँदें बरसा रहा हो ॥ २५ ॥

सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् । अथास्य चतुरो वाहांश्चतुर्भिर्निशितैः शरैः ॥ २६ ॥ पातयामास समरे सिंहनादं ननाद च । ततोऽपरेण भल्लेन हस्ताच्चापमथाच्छिनत् ॥ २७ ॥

साथ ही उन्होंने भल्ल मारकर धृष्टद्युम्नके सारथिको रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया और चार तीखे बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको भी मार गिराया। फिर वे समरांगणमें जोर- जोरसे सिंहनाद करने लगे। इतना ही नहीं, उन्होंने दूसरा बाण मारकर उनके हाथमें स्थित दूसरे धनुषको भी काट डाला ॥ २६-२७ ॥

सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । गदापाणिरवारोहत् ख्यापयन् पौरुषं महत् ॥ २८ ॥ तामस्य विशिखैस्तूर्णं पातयामास भारत । रथादनवरूढस्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २९ ॥

इस प्रकार धनुष कट जाने और घोड़े तथा सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुए धृष्टद्युम्न हाथमें गदा लेकर उतरने लगे। भारत! इतनेहीमें अपने महान् पौरुषका परिचय देते हुए द्रोणाचार्यने तुरंत ही बाण मारकर रथसे उतरते-उतरते ही उनकी गदाको भी गिरा दिया। वह एक अद्भुत-सी घटना हुई ॥ २८-२९ ॥

ततः स विपुलं चर्म शतचन्द्रं च भानुमत् । खड्गं च विपुलं दिव्यं प्रगृह्य सुभुजो बली ॥ ३० ॥ अभिदुद्राव वेगेन द्रोणस्य वधकाङ्क्षया । आमिषार्थी यथा सिंहो वने मत्तमिव द्विपम् ॥ ३१ ॥

तब सुन्दर बाँहोंवाले बलवान् वीर धृष्टद्युम्नने चन्द्राकार सौ फुल्लियोंसे सुशोभित तेजस्वी और विस्तृत ढाल तथा दिव्य एवं विशाल खड्ग हाथमें लेकर द्रोणका वध करनेकी

इच्छासे उनके ऊपर वेगपूर्वक आक्रमण किया। ठीक उसी तरह, जैसे मांस चाहनेवाला सिंह वनमें किसी मतवाले हाथीपर धावा करता है ॥ ३०-३१ ॥ तत्राद्भुतमपश्याम भारद्वाजस्य पौरुषम् । लाघवं चास्त्रयोगं च बलं बाह्वोश्च भारत ॥ ३२ ॥ भारत! उस समय हमने वहाँ द्रोणाचार्यका अद्भुत हस्तलाघव, अस्त्र-प्रयोग, बाहुबल तथा पुरुषार्थ देखा ॥ ३२ ॥ यदेनं शरवर्षेण वारयामास पार्षतम् । न शशाक ततो गन्तुं बलवानपि संयुगे ॥ ३३ ॥ उन्होंने अपने बाणोंकी वर्षासे द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नको सहसा आगे बढ़नेसे रोक दिया। अतः वे बलवान् होनेपर भी युद्धमें द्रोणाचार्यके पासतक न पहुँच सके ॥ ३३ ॥ निवारितस्तु द्रोणेन धृष्टद्युम्नो महारथः । न्यवारयच्छरौघांस्तांश्चर्मणा कृतहस्तवत् ॥ ३४ ॥ द्रोणाचार्यसे रोके गये महारथी धृष्टद्युम्न सिद्धहस्त वीर पुरुषकी भाँति अपनी ढालसे ही उनके बाण-समूहोंका निवारण करने लगे ॥ ३४ ॥ ततो भीमो महाबाहुः सहसाभ्यपतद् बली । साहाय्यकारी समरे पार्षतस्य महात्मनः ॥ ३५ ॥ तब बलवान् वीर महाबाहु भीम सहसा समरमें महामना धृष्टद्युम्नकी सहायता करनेके लिये आ पहुँचे ॥ ३५ ॥ स द्रोणं निशितैर्बाणै राजन् विव्याध सप्तभिः । पार्षतं च रथं तूर्णं स्वकमारोहयत् तदा ॥ ३६ ॥ राजन्! उन्होंने सात पैने बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको घायल कर दिया और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नको तुरंत ही अपने रथपर चढ़ा लिया ॥ ३६ ॥ ततो दुर्योधनो राजन् भानुमन्तमचोदयत् । सैन्येन महता युक्तं भारद्वाजस्य रक्षणे ॥ ३७ ॥ महाराज! तब दुर्योधनने विशाल सेनासे युक्त भानुमान्‌को द्रोणाचार्यकी रक्षाके कार्यमें नियुक्त किया ॥ ३७ ॥ ततः सा महती सेना कलिङ्गानां जनेश्वर । भीममभ्युद्ययौ तूर्णं तव पुत्रस्य शासनात् ॥ ३८ ॥ जनेश्वर! उस समय आपके पुत्रकी आज्ञासे कलिंगदेशीय वीरोंकी वह विशाल सेना तुरंत ही भीमसेनके सम्मुख आ पहुँची ॥ ३८ ॥ पाञ्चाल्यमथ संत्यज्य द्रोणोऽपि रथिनां वरः । विराटद्रुपदौ वृद्धौ वारयामास संयुगे ॥ ३९ ॥

तब रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य भी धृष्टद्युम्नको छोड़कर युद्धस्थलमें विराट और द्रुपद इन दोनों वृद्ध नरेशोंको आगे बढ़नेसे रोकने लगे ॥ ३९ ॥

धृष्टद्युम्नोऽपि समरे धर्मराजानमभ्ययात् । ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ ४० ॥ कलिङ्गानां च समरे भीमस्य च महात्मनः । जगतः प्रक्षयकरं घोररूपं भयावहम् ॥ ४१ ॥

इधर धृष्टद्युम्न भी उस समरांगणमें धर्मराज युधिष्ठिरके पास चले गये। तत्पश्चात् समरभूमिमें कलिंगदेशीय योद्धाओं और महामनस्वी भीमसेनका अत्यन्त भयंकर तथा रोमांचकारी युद्ध होने लगा। जो सम्पूर्ण जगत्‌का विनाश करनेवाला घोरस्वरूप एवं महान् भयदायक था ॥ ४०-४१ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि धृष्टद्युम्नद्रोणयुद्धे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें धृष्टद्युम्न और द्रोणका युद्धविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1787)

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चतुष्पञ्चशत्तमोऽध्यायः

भीमसेनका कलिंगों और निषादोंसे युद्ध, भीमसेनके द्वारा शक्रदेव, भानुमान् और केतुमान्का वध तथा उनके बहुत-से सैनिकोंका संहार

धृतराष्ट्र उवाच

तथा प्रतिसमादिष्टः कालिङ्गो वाहिनीपतिः ।
कथमद्भुतकर्मार्णं भीमसेनं महाबलम् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! दुर्योधनकी वैसी आज्ञा पाकर सेनापति कलिंगराजने अद्भुत पराक्रमी महाबली भीमसेनके साथ किस प्रकार युद्ध किया? ॥ १ ॥

चरन्तं गदया वीरं दण्डहस्तमिवान्तकम् ।
योधयामास समरे कालिङ्गः सह सेनया ॥ २ ॥
वीरवर भीमसेन जब गदा हाथमें लेकर विचरते हैं, तब दण्डधारी यमराजके समान जान पड़ते हैं। उनके साथ समरांगणमें सेनासहित कलिंगराजने किस प्रकार युद्ध किया? ॥ २ ॥

संजय उवाच

पुत्रेण तव राजेन्द्र स तथोक्तो महाबलः ।
महत्या सेनया गुप्तः प्रायाद् भीमरथं प्रति ॥ ३ ॥
**संजयने कहा—**राजेन्द्र! आपके पुत्रका उपर्युक्त आदेश पाकर अपनी विशाल सेनासे सुरक्षित हो महाबली कलिंगराज भीमसेनके रथके पास गया ॥ ३ ॥

तामापतन्तीं महतीं कलिङ्गानां महाचमूम् ।
रथाश्वनागकलिलां प्रगृहीतमहायुधाम् ॥ ४ ॥
भीमसेनः कलिङ्गानामाच्छर्द भारत वाहिनीम् ।
केतुमन्तं च नैषादिमायान्तं सह चेदिभिः ॥ ५ ॥
भारत! रथ, घोड़े, हाथी और पैदलोंसे भरी हुई कलिंगोंकी उस विशाल वाहिनीको हाथोंमें बड़े-बड़े आयुध लिये आती देख चेदिदेशीय सैनिकोंके साथ भीमसेनने उसे बाणोंद्वारा पीड़ित करना आरम्भ किया। साथ ही युद्धके लिये आते हुए निषादराजपुत्र केतुमान्को भी चोट पहुँचायी ॥

ततः श्रुतायुः संक्रुद्धो राज्ञा केतुमता सह ।
आससाद रणे भीमं व्यूढानीकेषु चेदिषु ॥ ६ ॥

तब राजा केतुमान्‌के साथ क्रोधमें भरा हुआ श्रुतायु भी रणक्षेत्रमें भीमसेनके सामने आया। उस समय चेदि-देशीय सैनिकोंकी सेनाएँ व्यूहबद्ध होकर खड़ी थीं ॥ ६ ॥

रथैरनेकसाहस्रैः कलिङ्गानां नराधिप । अयुतेन गजानां च निषादैः सह केतुमान् ॥ ७ ॥ भीमसेनं रणे राजन् समन्तात् पर्यवारयत् । नरेश्वर! कलिंगोंके कई सहस्र रथ और दस हजार हाथियों एवं निषादोंके साथ केतुमान् उस रणस्थलमें भीमसेनको सब ओरसे रोकने लगा ॥ ७ १/२ ॥

चेदिमत्स्यकरूषाश्च भीमसेनपदानुगाः ॥ ८ ॥ अभ्यधावन्त समरे निषादान् सह राजभिः । ततः प्रवृत्ते युद्धं घोररूपं भयावहम् ॥ ९ ॥ तब भीमसेनके पदचिह्नोंपर चलनेवाले चेदि, मत्स्य तथा करूषदेशके क्षत्रियोंने समरभूमिमें निषादों एवं उनके राजाओंपर आक्रमण किया। फिर तो दोनों दलोंमें अत्यन्त घोर और भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ८-९ ॥

न प्राजानन्त योधाः स्वान् परस्परजिघांसया । घोरमासीत् ततो युद्धं भीमस्य सहसा परैः ॥ १० ॥ यथेन्द्रस्य महाराज महत्या दैत्यसेनया । महाराज! उस समय एक-दूसरोंको मार डालनेकी इच्छा रखकर सब योद्धा अपने और परायेकी पहचान नहीं कर पाते थे। शत्रुओंके साथ भीमसेनका वह युद्ध सहसा उसी प्रकार अत्यन्त भयंकर हो चला, जैसे विशाल दैत्य-सेनाके साथ देवराज इन्द्रका युद्ध हुआ करता है ॥ १० १/२ ॥

तस्य सैन्यस्य संग्रामे युध्यमानस्य भारत ॥ ११ ॥ बभूव सुमहान् शब्दः सागरस्येव गर्जतः । भरतनन्दन! संग्रामभूमिमें युद्ध करती हुई उस कलिंग-सेनाका महान् कोलाहल समुद्रकी गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ ११ १/२ ॥

अन्योन्यं स्म तदा योधा विकर्षन्तो विशाम्पते ॥ १२ ॥ महीं चक्रुश्चितां सर्वां शशलोहितसंनिभाम् । राजन्! उस समय सब योद्धाओंने छिन्न-भिन्न होकर परस्पर एक-दूसरेको खींचते हुए वहाँकी सारी भूमिको अपनी रक्तरंजित लाशोंसे पाट दिया। वह भूमि खरगोशके रक्तकी भाँति लाल दिखायी देने लगी ॥ १२ १/२ ॥

योधांश्च स्वान् परान् वापि नाभ्यजानञ्जिघांसया ॥ १३ ॥ स्वानप्याददते स्वांश्च शूराः परमदुर्जयाः ।

परम दुर्जय शूर सैनिक विपक्षीको मार डालनेकी अभिलाषा लेकर अपने और परायेको भी जान नहीं पाते थे। बहुधा अपने ही पक्षके सैनिक अपने ही योद्धाओंको मारनेके लिये पकड़ लेते थे ॥ १३ ½ ॥ विमर्दः सुमहानासीदल्पानां बहुभिः सह ॥ १४ ॥ कलिङ्गैः सह चेदीनां निषादैश्च विशाम्पते । राजन्! इस प्रकार वहाँ बहुसंख्यक कलिंगों और निषादोंके साथ अल्पसंख्यक चेदिदेशीय सैनिकोंका बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा ॥ १४ ½ ॥ कृत्वा पुरुषकारं तु यथाशक्ति महाबलाः ॥ १५ ॥ भीमसेनं परित्यज्य संन्यवर्तन्त चेदयः । महाबली चेदि सैनिक यथाशक्ति पुरुषार्थ प्रकट करके भीमसेनको छोड़कर भाग चले ॥ १५ ½ ॥ सर्वैः कलिङ्गैरासन्नः संनिवृत्तेषु चेदिषु ॥ १६ ॥ स्वबाहुबलमास्थाय न न्यवर्तत पाण्डवः । न चचाल रथोपस्थाद् भीमसेनो महाबलः ॥ १७ ॥ चेदिदेशीय सैनिकोंके पलायन कर जानेपर समस्त कलिंग भीमसेनके निकट जा पहुँचे; तो भी महाबली पाण्डुनन्दन भीमसेन अपने बाहुबलका भरोसा करके पीछे नहीं हटे और न रथकी बैठकसे तनिक भी विचलित हुए ॥ १६-१७ ॥ शितैर्वाकिरद् बाणैः कलिङ्गानां वरूथिनीम् । कालिङ्गस्तु महेष्वासः पुत्रश्चास्य महारथः ॥ १८ ॥ शक्रदेव इति ख्यातो जघ्नतुः पाण्डवं शरैः । वे कलिंगोंकी सेनापर अपने तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे। महाधनुर्धर कलिंगराज और उसका महारथी पुत्र शक्रदेव दोनों मिलकर पाण्डुनन्दन भीमसेनपर बाणोंका प्रहार करने लगे ॥ १८ ½ ॥ ततो भीमो महाबाहुर्विधुन्वन् रुचिरं धनुः ॥ १९ ॥ योधयामास कालिङ्गं स्वबाहुबलमाश्रितः । तब महाबाहु भीमने अपने बाहुबलका आश्रय लेकर सुन्दर धनुषकी टंकार फैलाते हुए कलिंगराजसे युद्ध आरम्भ किया ॥ १९ ½ ॥ शक्रदेवस्तु समरे विसृजन् सायकान् बहून् ॥ २० ॥ अश्वाञ्जघान समरे भीमसेनस्य सायकैः । शक्रदेवने समरभूमिमें बहुत-से सायकोंकी वर्षा करते हुए उन सायकोंद्वारा भीमसेनके घोड़ोंको मार डाला ॥ २० ½ ॥ तं दृष्ट्वा विरथं तत्र भीमसेनमरिंदमम् ॥ २१ ॥ शक्रदेवोऽभिदुद्राव शरैरवकिरन् शितैः ।

शत्रुदमन भीमसेनको वहाँ रथहीन हुआ देख शक्रदेव तीखे बाणोंकी वर्षा करता हुआ उनकी ओर दौड़ा ॥ २१ १/२ ॥ भीमस्योपरि राजेन्द्र शक्रदेवो महाबलः ॥ २२ ॥ ववर्ष शरवर्षाणि तपान्ते जलदो यथा । राजेन्द्र! जैसे गर्मीके अन्तमें बादल पानीकी बूँदें बरसाता है, उसी प्रकार महाबली शक्रदेव भीमसेनके ऊपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ २२ १/२ ॥ हताश्वे तु रथे तिष्ठन् भीमसेनो महाबलः ॥ २३ ॥ शक्रदेवाय चिक्षेप सर्वशैक्यायसीं गदाम् । जिसके घोड़े मारे गये थे, उसी रथपर खड़े हुए महाबली भीमसेनने शक्रदेवको लक्ष्य करके सम्पूर्णतः लोहेके सारतत्त्वकी बनी हुई अपनी गदा चलायी ॥ २३ १/२ ॥ स तया निहतो राजन् कालिङ्गतनयो रथात् ॥ २४ ॥ सध्वजः सह सूतेन जगाम धरणीतलम् । राजन्! उस गदाकी चोट खाकर कलिंगराजकुमार प्राणशून्य हो अपने सारथि और ध्वजके साथ ही रथसे नीचे पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २४ १/२ ॥ हतमात्मसुतं दृष्ट्वा कलिङ्गानां जनाधिपः ॥ २५ ॥ रथैरनेकसाहस्रैर्भीमस्यावारयद् दिशः । अपने पुत्रको मारा गया देख कलिंगराजने कई हजार रथोंके द्वारा भीमसेनकी सम्पूर्ण दिशाओंको रोक लिया ॥ २५ १/२ ॥ ततो भीमो महावेगां त्यक्त्वा गुर्वीं महागदाम् ॥ २६ ॥ निस्त्रिंशमाददे घोरं चिकीर्षुः कर्म दारुणम् । चर्म चाप्रतिमं राजन्नार्षभं पुरुषर्षभ ॥ २७ ॥ नक्षत्रैरर्धचन्द्रैश्च शातकुम्भमयैश्चितम् । नरश्रेष्ठ! तब भीमसेनने अत्यन्त वेगशालिनी एवं भारी और विशाल गदाको वहीं छोड़कर अत्यन्त भयंकर कर्म करनेकी इच्छासे तलवार खींच ली तथा ऋषभके चमड़ेकी बनी हुई अनुपम ढाल हाथमें ले ली। राजन्! उस ढालमें सुवर्णमय नक्षत्र और अर्धचन्द्रके आकारकी फूलियाँ जड़ी हुई थीं ॥ २६-२७ १/२ ॥ कालिङ्गस्तु ततः क्रुद्धो धनुर्ज्यामवमृज्य च ॥ २८ ॥ प्रगृह्य च शरं घोरमेकं सर्पविषोपमम् । प्राहिणोद् भीमसेनाय वधाकाङ्क्षी जनेश्वरः ॥ २९ ॥ इधर क्रोधमें भरे हुए कलिंगराजने धनुषकी प्रत्यंचाको रगड़कर सर्पके समान विषैला एक भयंकर बाण हाथमें लिया और भीमसेनके वधकी इच्छासे उनपर चलाया ॥ २८-२९ ॥ तमापतन्तं वेगेन प्रेरितं निशितं शरम् ।

भीमसेनो द्विधा राजंश्छिच्छेद विपुलासिना ।। ३० ।।
उदक्रोशच्च संहृष्टस्त्रासयानो वरूथिनीम् ।

राजन्! भीमसेनने अपने विशाल खड्गसे उसके वेगपूर्वक चलाये हुए तीखे बाणके दो टुकड़े कर दिये और कलिंगोंकी सेनाको भयभीत करते हुए हर्षमें भरकर बड़े जोरसे सिंहनाद किया ।। ३० १/२ ।।
कालिङ्गोऽथ ततः क्रुद्धो भीमसेनाय संयुगे ।। ३१ ।।
तोमरान् प्राहिणोच्छीघ्रं चतुर्दश शिलाशितान् ।

तब कलिंगराजने रणक्षेत्रमें अत्यन्त कुपित हो भीमसेनपर तुरंत ही चौदह तोमरोंका प्रहार किया, जिन्हें सानपर चढ़ाकर तेज किया गया था ।। ३१ १/२ ।।
तानप्राप्तान् महाबाहुः खगतानेव पाण्डवः ।। ३२ ।।
चिच्छेद सहसा राजन्नसम्भ्रान्तो वरासिना ।

राजन्! वे तोमर अभी भीमसेनतक पहुँच ही नहीं पाये थे कि उन महाबाहु पाण्डुकुमारने बिना किसी घबराहटके अपनी अच्छी तलवारसे सहसा उन्हें आकाशमें ही काट डाला ।। ३२ १/२ ।।
निकृत्य तु रणे भीमस्तोमरान् वै चतुर्दश ।। ३३ ।।
भानुमन्तं ततो भीमः प्राद्रवत् पुरुषर्षभः ।

इस प्रकार पुरुषश्रेष्ठ भीमसेनने रणक्षेत्रमें उन चौदह तोमरोंको काटकर भानुमान्पर धावा किया ।। ३३ १/२ ।।
भानुमांस्तु ततो भीमं शरवर्षेण छादयन् ।। ३४ ।।
ननाद बलवन्नादं नादयानो नभस्तलम् ।

यह देख भानुमान्ने अपने बाणोंकी वर्षासे भीमसेनको आच्छादित करके आकाशको प्रतिध्वनित करते हुए बड़े जोरसे गर्जना की ।। ३४ १/२ ।।
न च तं ममृषे भीमः सिंहनादं महाहवे ।। ३५ ।।
ततः शब्देन महता विननाद महास्वनः ।
तेन नादेन वित्रस्ता कलिङ्गानां वरूथिनी ।। ३६ ।।

भीमसेन उस महासमरमें भानुमान्की वह गर्जना न सह सके। उन्होंने और भी अधिक जोरसे सिंहके समान दहाड़ना आरम्भ किया। उनकी उस गर्जनासे कलिंगोंकी वह विशाल वाहिनी संत्रस्त हो उठी ।। ३५-३६ ।।
न भीमं समरे मेने मानुषं भरतर्षभ ।
ततो भीमो महाबाहुर्नर्दित्वा विपुलं स्वनम् ।। ३७ ।।
सासिवेगवदाप्लुत्य दन्ताभ्यां वारणोत्तमम् ।
आरुरोह ततो मध्यं नागराजस्य मारिष ।। ३८ ।।