महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2294, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथा दैत्यचमूं शक्रस्तापयामास संयुगे । तथा भीष्मः पाण्डवेयांस्तापयामास भारत ॥ ३३ ॥ भारत! जैसे पूर्वकालमें देवराज इन्द्रने संग्रामभूमिमें दैत्योंकी सेनाको संतप्त किया था, उसी प्रकार भीष्मजी पाण्डवयोध्दाओंको संताप दे रहे थे ॥ ३३ ॥
तथा चैनं पराक्रान्तमालोक्य मधुसूदनः । उवाच देवकीपुत्रः प्रीयमाणो धनंजयम् ॥ ३४ ॥ उन्हें इस प्रकार पराक्रम करते देख मधु दैत्यको मारनेवाले देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे प्रसन्नतापूर्वक कहा— ॥ ३४ ॥
एष शान्तनवो भीष्मः सेनयोरन्तरे स्थितः । संनिहत्य बलादेनं विजयस्ते भविष्यति ॥ ३५ ॥ ‘अर्जुन! ये शान्तनुनन्दन भीष्म दोनों सेनाओंके बीचमें खड़े हैं। यदि तुम बलपूर्वक इन्हें मार सको तो तुम्हारी विजय हो जायगी ॥ ३५ ॥
बलात् संस्तम्भयस्वैनं यत्रैषा भिद्यते चमूः । न हि भीष्मशरानन्यः सोढुमुत्सहते विभो ॥ ३६ ॥ ‘जहाँ ये इस सेनाका संहार कर रहे हैं, वहीं पहुँचकर इन्हें बलपूर्वक स्तम्भित कर दो (जिससे ये आगे या पीछे किसी ओर हट न सकें)। विभो! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो भीष्मके बाणोंकी चोट सह सके’ ॥ ३६ ॥
ततस्तस्मिन् क्षणे राजंश्चोदितो वानरध्वजः । सध्वजं सरथं साश्वं भीष्ममन्तर्दधे शरैः ॥ ३७ ॥ राजन्! इस प्रकार भगवान्से प्रेरित होकर कपिध्वज अर्जुनने उसी क्षण अपने बाणोंद्वारा ध्वज, रथ और घोड़ोंसहित भीष्मको आच्छादित कर दिया ॥ ३७ ॥
स चापि कुरुमुख्यानामृषभः पाण्डवेरितान् । शरव्रातैः शरव्रातान् बहुधा विदुधाव तान् ॥ ३८ ॥ कुरुश्रेष्ठ वीरोंमें प्रधान भीष्मने भी अपने बाणसमूहोंद्वारा अर्जुनके चलाये हुए बाणसमुदायके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ ३८ ॥
(तथा पुनर्जघानाशु पाण्डवानां महारथान् । शरैरशनिकल्पैश्च शिताग्रैश्च सुपर्वभिः ॥) तत्पश्चात् उत्तम गाँठ और तीखी धारवाले वज्रतुल्य बाणोंद्वारा वे पुनः पाण्डव महारथियोंका शीघ्रतापूर्वक वध करने लगे।
ततः पञ्चालराजश्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् । पाण्डवो भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ३९ ॥ यमौ च चेकितानश्च केकयाः पञ्च चैव ह । सात्यकिश्च महाबाहुः सौभद्रोऽथ घटोत्कचः ॥ ४० ॥