भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1634, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1634

रणभूमिमें जिसके भयसे डरे हुए पुरुषशिरोमणि धर्मराज युधिष्ठिरने तेरह वर्षोंतक कभी अच्छी तरह नींद नहीं ली, जिस महामनस्वी बलवान् सूतपुत्रके बलका भरोसा करके मेरा पुत्र दुर्योधन पाण्डवोंकी पत्नीको बलपूर्वक सभामें घसीट लाया और वहाँ भी भरी सभामें उसने पाण्डवोंके देखते-देखते समस्त कुरुवंशियोंके समीप पांचालराजकुमारीको दासपत्नी बतलाया, साथ ही जिसने उसे सम्बोधित करके कहा—'कृष्णे! तेरे पति अब नहींके बराबर हैं। ये सभी थोथे तिलोंके समान नपुंसक हो गये हैं। सुन्दरि! अब तू दूसरे किसी पतिका आश्रय ले' पूर्वकालमें जिस सूतपुत्रने सभामें रोषपूर्वक द्रौपदीको ये कठोर बातें सुनायी थीं, वह स्वयं शत्रुओंद्वारा कैसे मारा गया? ।। ५७—६१ १/२ ।।

यदि भीष्मो रणश्लाघी द्रोणो वा युधि दुर्मदः ।। ६२ ।। न हनिष्यति कौन्तेयान् पक्षपातात् सुयोधन । सर्वानैव हनिष्यामि व्येतु ते मानसो ज्वरः ।। ६३ ।।

जिसने मेरे पुत्रसे कहा था कि 'दुर्योधन! यदि युद्धकी श्लाघा रखनेवाले भीष्म अथवा रणदुर्मद द्रोणाचार्य पक्षपात करनेके कारण कुन्तीपुत्रोंको नहीं मारेंगे तो मैं उन सबको मार डालूँगा। तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ।। ६२-६३ ।।

किं करिष्यति गाण्डीवमक्षय्यौ च महेषुधी । स्निग्धचन्दनदिग्धस्य मच्छरस्याभिधावतः ।। ६४ ।। स नूनमृषभस्कन्धो ह्यर्जुनेन कथं हतः ।

'गाण्डीव धनुष अथवा दोनों अक्षय तरकस मेरे उस बाणका क्या कर लेंगे, जो चिकने चन्दनसे चर्चित हो शत्रुओंपर बड़े वेगसे धावा करता है' ऐसी बातें कहनेवाला कर्ण, जिसके कंधे बैलोंके समान हृष्टपुष्ट थे, निश्चय ही अर्जुनके हाथसे कैसे मारा गया? ।। ६४ १/२ ।।

यश्च गाण्डीवमुक्तानां स्पर्शमुग्रमचिन्तयन् ।। ६५ ।। अपतिर्ह्यसि कृष्णेति ब्रुवन् पार्थानवैक्षत । यस्य नासीद् भयं पार्थैः सपुत्रैः सजनार्दनैः ।। ६६ ।। स्वबाहुबलमाश्रित्य मुहूर्तंमपि संजय । तस्य नाहं वधं मन्ये देवैरपि सवासवैः ।। ६७ ।। प्रतीपमभिधावद्भिः किं पुनस्तात पाण्डवैः ।

संजय! जिसने गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंके आघातकी तनिक भी परवा न करके 'कृष्णे! अब तू पतिहीना हो गयी' ऐसा कहते हुए कुन्तीपुत्रोंकी ओर देखा था, जिसे अपने बाहुबलके भरोसे कभी दो घड़ीके लिये भी पुत्रोंसहित पाण्डवों और भगवान् श्रीकृष्णसे भी भय नहीं हुआ। तात! यदि शत्रुपक्षकी ओरसे इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी धावा करें तो उनके द्वारा भी कर्णके वध होनेका विश्वास मुझे नहीं हो सकता था, फिर पाण्डवोंकी तो बात ही क्या है? ।। ६५—६७ १/२ ।।

न हि ज्यां संस्पृशानस्य तलत्रे वापि गृह्णतः ।। ६८ ।।