भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1635

पुमानाधिरथेः स्थातुं कश्चित् प्रमुखतोऽर्हति ।
अपि स्यान्मेदिनी हीना सोमसूर्यप्रभांशुभिः ॥ ६९ ॥
न वधः पुरुषेन्द्रस्य संयुगेष्वपलायिनः ।
जब अधिरथपुत्र कर्ण अपने धनुषकी प्रत्यंचाका स्पर्श कर रहा हो अथवा दस्ताने पहन चुका हो, उस समय कोई पुरुष उसके सामने नहीं ठहर सकता था। सम्भव है यह पृथ्वी चन्द्रमा और सूर्यकी प्रकाशमयी किरणोंसे वंचित हो जाय, परंतु युद्धमें पीठ न दिखानेवाले पुरुषशिरोमणि कर्णके वधकी कदापि सम्भावना नहीं थी ॥ ६८-६९ ½ ॥
येन मन्दः सहायेन भ्रात्रा दुःशासनेन च ॥ ७० ॥
वासुदेवस्य दुर्बुद्धिः प्रत्याख्यानमरोचयत् ।
स नूनं वृषभस्कन्धं कर्णं दृष्ट्वा निपातितम् ॥ ७१ ॥
दुःशासनं च निहतं मन्ये शोचति पुत्रकः ।
जिस कर्ण और भाई दुःशासनको अपना सहायक पाकर मूर्ख एवं दुर्बुद्धि दुर्योधनने श्रीकृष्णके प्रस्तावको ठुकरा देना ही उचित समझा था, मैं समझता हूँ, आज बैलोंके समान पुष्ट कंधेवाले कर्णको गिरा हुआ तथा दुःशासनको भी मारा गया देख मेरा वह पुत्र निश्चय ही शोकमें मग्न हो गया होगा ॥ ७०-७१ ½ ॥
हतं वैकर्तनं श्रुत्वा द्वैरथे सव्यसाचिना ॥ ७२ ॥
जयतःपाण्डवान् दृष्ट्वा किंस्विद् दुर्योधनोऽब्रवीत् ।
द्वैरथयुद्धमें सव्यसाची अर्जुनके हाथसे कर्णको मारा गया सुनकर और पाण्डवोंकी विजय होती देखकर दुर्योधनने क्या कहा था? ॥ ७२ ½ ॥
दुर्मर्षणं हतं दृष्ट्वा वृषसेनं च संयुगे ॥ ७३ ॥
प्रभग्नं च बलं दृष्ट्वा वध्यमानं महारथैः ।
पराङ्मुखांश्च राज्ञस्तु पलायनपरायणान् ॥ ७४ ॥
विद्रुतान् रथिनो दृष्ट्वा मन्ये शोचति पुत्रकः ।
दुर्मर्षण और वृषसेन भी युद्धमें मारे गये, महारथी पाण्डवोंकी मार खाकर सेनामें भगदड़ मच गयी, सहायक नरेश युद्धसे विमुख हो पलायन करने लगे और रथियोंने पीठ दिखा दी। यह सब देखकर मेरा बेटा शोक कर रहा होगा; ऐसा मुझे मालूम हो रहा है ॥ ७३-७४ ½ ॥
अनेयश्चाभिमानी च दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः ॥ ७५ ॥
हतोत्साहं बलं दृष्ट्वा किंस्विद् दुर्योधनोऽब्रवीत् ।
जो किसीकी सीख नहीं मानता है, जिसे अपनी विद्वत्ता और बुद्धिमत्ताका अभिमान है, उस दुर्बुद्धि, अजितेन्द्रिय दुर्योधनने अपने सेनाको हतोत्साह देखकर क्या कहा? ॥ ७५ ½ ॥