भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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१७१- गौतमका राक्षसराजके यहाँसे सुवर्णराशि लेकर लौटना और अपने मित्र बकके वधका घृणित विचार मनमें लाना १७२- कृतघ्न गौतमद्वारा मित्र राजधर्माका वध तथा राक्षसोंद्वारा उसकी हत्या और कृतघ्नके मांसको अभक्ष्य बताना १७३- राजधर्मा और गौतमका पुनः जीवित होना

(मोक्षधर्मपर्व)

१७४- शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन १७५- अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश १७६- त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश १७७- मंकिगीता—धनकी तृष्णासे दुःख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति १७८- जनककी उक्ति तथा राजा नहुषके प्रश्नोंके उत्तरमें बोध्यगीता १७९- प्रह्लाद और अवधूतका संवाद—अजगर-वृत्तिकी प्रशंसा १८०- सद्बुद्धिका आश्रय लेकर आत्महत्यादि पापकर्मसे निवृत्त होनेके सम्बन्धमें काश्यप ब्राह्मण और इन्द्रका संवाद १८१- शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका प्रतिपादन १८२- भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत्की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन १८३- आकाशसे अन्य चार स्थूल भूतोंकी उत्पत्तिका वर्णन १८४- पंचमहाभूतोंके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन १८५- शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि वायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन १८६- जीवकी सत्तापर नाना प्रकारकी युक्तियोंसे शंका उपस्थित करना १८७- जीवकी सत्ता तथा नित्यताको युक्तियोंसे सिद्ध करना १८८- वर्णविभागपूर्वक मनुष्योंकी और समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका वर्णन १८९- चारों वर्णोंके अलग-अलग कर्मोंका और सदाचारका वर्णन तथा वैराग्यसे परब्रह्मकी प्राप्ति १९०- सत्यकी महिमा, असत्यके दोष तथा लोक और परलोकके सुख-दुःखका विवेचन १९१- ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन १९२- वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार १९३- शिष्टाचारका फलसहित वर्णन, पापको छिपानेसे हानि और धर्मकी प्रशंसा

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