महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३३- ब्राह्मप्रलय एवं महाप्रलयका वर्णन २३४- ब्राह्मणोंका कर्तव्य और उन्हें दान देनेकी महिमाका वर्णन २३५- ब्राह्मणके कर्तव्यका प्रतिपादन करते हुए कालरूप नदको पार करनेका उपाय बतलाना २३६- ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति २३७- सृष्टिके समस्त कार्योंमें बुद्धिकी प्रधानता और प्राणियोंकी श्रेष्ठताके तारतम्यका वर्णन २३८- नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन, युगधर्मका वर्णन एवं कालका महत्त्व २३९- ज्ञानका साधन और उसकी महिमा २४०- योगसे परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन २४१- कर्म और ज्ञानका अन्तर तथा ब्रह्म-प्राप्तिके उपायका वर्णन २४२- आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य-आश्रमका वर्णन २४३- ब्राह्मणोंके उपलक्षणसे गार्हस्थ्य-धर्मका वर्णन २४४- वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्म और महिमाका वर्णन २४५- संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान् संन्यासीकी प्रशंसा २४६- परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनका उपाय तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय २४७- महाभूतादि तत्त्वोंका विवेचन २४८- बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक २४९- ज्ञानके साधन तथा ज्ञानीके लक्षण और महिमा २५०- परमात्माकी प्राप्तिका साधन, संसार-नदीका वर्णन और ज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्ति २५१- ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणके लक्षण और परब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय २५२- शरीरमें पंचभूतोंके कार्य और गुणोंकी पहचान २५३- स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरसे भिन्न जीवात्माका और परमात्माका योगके द्वारा साक्षात्कार करनेका प्रकार २५४- कामरूपी अद्भुत वृक्षका तथा उसे काटकर मुक्ति प्राप्त करनेके उपायका और शरीररूपी नगरका वर्णन २५५- पंचभूतोंके तथा मन और बुद्धिके गुणोंका विस्तृत वर्णन २५६- युधिष्ठिरका मृत्युविषयक प्रश्न, नारदजीका राजा अकम्पनसे मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाते हुए ब्रह्माजीकी रोषाग्निसे प्रजाके दग्ध होनेका वर्णन