महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५७- महादेवजीकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीके द्वारा अपनी रोषाग्निका उपसंहार तथा मृत्युकी उत्पत्ति २५८- मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना २५९- धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय २६०- युधिष्ठिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह उपस्थित करना २६१- जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना २६२- जाजलि और तुलाधारका धर्मके विषयमें संवाद २६३- जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश २६४- जाजलिको पक्षियोंका उपदेश २६५- राजा विचख्नुके द्वारा अहिंसा-धर्मकी प्रशंसा २६६- महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान-दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा २६७- द्युमत्सेन और सत्यवान्का संवाद—अहिंसा-पूर्वक राज्यशासनकी श्रेष्ठताका कथन २६८- स्यूमरश्मि और कपिलका संवाद—स्यूमरश्मिके द्वारा यज्ञकी अवश्यकर्तव्यताका निरूपण २६९- प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल संवाद २७०- स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन २७१- धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा २७२- यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा २७३- धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर २७४- मोक्षके साधनका वर्णन २७५- जीवात्माके देहाभिमानसे मुक्त होनेके विषयमें नारद और असितदेवलका संवाद २७६- तृष्णाके परित्यागके विषयमें माण्डव्य मुनि और जनकका संवाद २७७- शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्म-कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश—पिता-पुत्रका संवाद २७८- हारीत मुनिके द्वारा प्रतिपादित संन्यासीके स्वभाव, आचरण और धर्मोंका वर्णन २७९- ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र-शुक्र-संवादका आरम्भ