महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
विष्णोर्ललाटात् कमलं सौवर्णमभवत् तदा ॥ १३१ ॥
श्रीः सम्भूता यतो देवी पत्नी धर्मस्य धीमतः ।
उस समय भगवान् विष्णुके ललाटसे एक सुवर्णमय कमल प्रकट हुआ, जिससे बुद्धिमान् धर्मकी पत्नी श्रीदेवीका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १३१ १/२ ॥
श्रियः सकाशादर्थश्च जातो धर्मेण पाण्डव ॥ १३२ ॥
अथ धर्मस्तथैवार्थः श्रीश्च राज्ये प्रतिष्ठिता ।
पाण्डुनन्दन! धर्मके द्वारा श्रीदेवीसे अर्थकी उत्पत्ति हुई। तदनन्तर धर्म, अर्थ और श्री—तीनों ही राज्यमें प्रतिष्ठित हुए ॥ १३२ १/२ ॥
सुकृतस्य क्षयाच्चैव स्वर्लोकादेत्य मेदिनीम् ॥ १३३ ॥
पार्थिवो जायते तात दण्डनीतिविशारदः ।
तात! पुण्यका क्षय होनेपर मनुष्य स्वर्गलोकसे पृथिवीपर आता और दण्डनीतिविशारद राजाके रूपमें जन्म लेता है ॥ १३३ १/२ ॥
महत्त्वेन च संयुक्तो वैष्णवेन नरो भुवि ॥ १३४ ॥
बुद्ध्या भवति संयुक्तो माहात्म्यं चाधिगच्छति ।
वह मनुष्य इस भूतलपर भगवान् विष्णुकी महत्तासे युक्त तथा बुद्धिसम्पन्न हो विशेष माहात्म्य प्राप्त कर लेता है ॥ १३४ १/२ ॥
स्थापितं च ततो देवैर्न कश्चिदतिवर्तते ।
तिष्ठत्येकस्य च वशे तं चेदं न विधीयते ॥ १३५ ॥
तदनन्तर उसे देवताओंद्वारा राजाके पदपर स्थापित हुआ मानकर कोई भी उसकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करता। यह सारा जगत् उस एक ही व्यक्तिके वशमें स्थित रहता है, उसके ऊपर यह जगत् अपना शासन नहीं चला सकता ॥ १३५ ॥
शुभं हि कर्म राजेन्द्र शुभत्वायोपकल्पते ।
तुल्यस्यैकस्य यस्यायं लोको वचसि तिष्ठते ॥ १३६ ॥
राजेन्द्र! शुभ कर्मका परिणाम शुभ ही होता है, कभी तो अन्य मनुष्योंके समान होनेपर भी एक-मात्र राजाकी आज्ञामें यह सारा जगत् स्थित रहता है ॥ १३६ ॥
योऽस्य वै मुखमद्राक्षीत् सौम्यं सोऽस्य वशानुगः ।
सुभगं चार्थवन्तं च रूपवन्तं च पश्यति ॥ १३७ ॥
जिसने राजाका सौम्य मुख देख लिया, वह उसके अधीन हो गया। प्रत्येक मनुष्य राजाको सौभाग्यशाली, धनवान् और रूपवान् देखता है ॥ १३७ ॥
महत्त्वात् तस्य दण्डस्य नीतिर्विस्पष्टलक्षणा ।
नयचारश्च विपुलॊ येन सर्वमिदं ततम् ॥ १३८ ॥
पूर्वोक्त दण्डकी महत्तासे ही स्पष्ट लक्षणोंवाली नीति तथा न्यायोचित आचारका अधिक प्रचार होता है, जिससे यह सारा जगत् व्याप्त है ॥ १३८ ॥
आगमश्च पुराणानां महर्षीणां च सम्भवः ।
तीर्थवंशश्च वंशश्च नक्षत्राणां युधिष्ठिर ॥ १३९ ॥
सकलं चातुराश्रम्यं चातुर्होत्रं तथैव च ।
चातुर्वर्ण्यं तथैवात्र चातुर्विद्यं च कीर्तितम् ॥ १४० ॥
युधिष्ठिर! पुराणशास्त्र, महर्षियोंकी उत्पत्ति, तीर्थ-समूह, नक्षत्रसमुदाय, ब्रह्मचर्य आदि चार आश्रम, होता आदि चार प्रकारके ऋत्विजोंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञकर्म, चारों वर्ण और चारों विद्याओंका पूर्वोक्त नीतिशास्त्रमें प्रतिपादन किया गया है ॥ १३९-१४० ॥
इतिहासाश्च वेदाश्च न्यायः कृत्स्नश्च वर्णितः ।
तपो ज्ञानमहिंसा च सत्यासत्येन यः परः ॥ १४१ ॥
वृद्धोपसेवा दानं च शौचमुत्थानमेव च ।
सर्वभूतानुकम्पा च सर्वमत्रोपवर्णितम् ॥ १४२ ॥
इतिहास, वेद, न्याय—इन सबका उसमें पूरा-पूरा वर्णन है। तप, ज्ञान, अहिंसाका तथा जो सत्य, असत्यसे परे है उसका और वृद्धजनोंकी सेवा, दान, शौच, उत्थान तथा समस्त प्राणियोंपर दया आदि सभी विषयोंका उस ग्रन्थमें वर्णन है ॥ १४१-१४२ ॥
भुवि चाधोगतं यच्च तच्च सर्वं समर्पितम् ।
तस्मिन् पैतामहे शास्त्रे पाण्डवैतन्न संशयः ॥ १४३ ॥
पाण्डुनन्दन! अधिक क्या कहा जाय? जो कुछ इस पृथ्वीपर है और जो इसके नीचे है, उस सबका ब्रह्माजीके पूर्वोक्त शास्त्रमें समावेश किया गया है, इसमें संशय नहीं है ॥ १४३ ॥
ततो जगति राजेन्द्र सततं शब्दितं बुधैः ।
देवाश्च नरदेवाश्च तुल्या इति विशाम्पते ॥ १४४ ॥
राजेन्द्र! प्रजानाथ! तबसे जगत्में विद्वानोंने सदाके लिये यह घोषणा कर दी है कि 'देव और नरदेव (राजा) दोनों समान हैं' ॥ १४४ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं महत्त्वं प्रति राजसु ।
कार्त्स्न्येन भरतश्रेष्ठ किमन्यदिह वर्तते ॥ १४५ ॥
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार राजाओंका जो कुछ महत्त्व है, वह सब मैंने सम्पूर्ण रूपसे तुम्हें बता दिया। अब इस विषयमें तुम्हारे लिये और क्या जानना शेष रह गया है? ॥ १४५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सूत्राध्याये एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सूत्राध्यायविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥
* शत्रुपर चढ़ाई करनेके चार अवसर ये हैं—(१) अपने मित्रोंकी वृद्धि। (२) अपने कोशका भरपूर संग्रह। (३) शत्रुके मित्रोंका नाश। (४) शत्रुके कोशकी हानि।
* पहला शत्रु राजा, दूसरा मित्र राजा, तीसरा शत्रु का मित्र राजा, चौथा मित्रका मित्र राजा, पाँचवाँ शत्रुके मित्रका मित्र राजा, छठा अपने पृष्ठभागकी रक्षाके लिये स्वयं उपस्थित हुआ राजा, सातवाँ शत्रु की सहायता एवं पृष्ठपोषणके लिये स्वयं उपस्थित राजा, आठवाँ अपने पक्षमें बुलानेपर आया हुआ राजा, नवाँ शत्रुपक्षमें बुलानेपर आया हुआ राजा, दसवाँ स्वयं विजयाभिलाषी नरेश, ग्यारहवाँ अपने और शत्रु दोनोंकी ओरसे मध्यस्थ राजा, बारहवाँ सबसे अधिक शक्तिशाली एवं उदासीन राजा—ये द्वादश राजमण्डल कहे गये हैं।
१-विष्णु, २-विरजा, ३-कीर्तिमान्, ४-कर्दम, ५-अनङ्ग, ६-अतिबल, ७-वेन, ८-पृथु। इस प्रकार गणना करनेपर राजा पृथु भगवान् विष्णुसे आठवीं पीढ़ीमें ज्ञात होते हैं।
वर्ण-धर्मका वर्णन
षष्टितमोऽध्यायः
वर्ण-धर्मका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
ततः पुनः स गाङ्गेयमभिवाद्य पितामहम् ।
प्राञ्जलिर्नियतो भूत्वा पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिरने मनको वशमें करके गङ्गानन्दन पितामह भीष्मको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर पूछा— ॥ १ ॥
के धर्माः सर्ववर्णानां चातुर्वर्ण्यस्य के पृथक् ।
चातुर्वर्ण्याश्रमाणां च राजधर्मांश्च के मताः ॥ २ ॥
‘पितामह! कौन-से ऐसे धर्म हैं, जो सभी वर्णोंके लिये उपयोगी हो सकते हैं। चारों वर्णोंके पृथक्-पृथक् धर्म कौन-से हैं? चारों वर्णोंके साथ ही चारों आश्रमोंके भी धर्म कौन हैं तथा राजाके द्वारा पालन करने योग्य कौन-कौन-से धर्म माने गये हैं? ॥ २ ॥
केन वै वर्धते राष्ट्रं राजा केन विवर्धते ।
केन पौराश्च भृत्याश्च वर्धन्ते भरतर्षभ ॥ ३ ॥
‘राष्ट्रकी वृद्धि कैसे होती है, राजाका अभ्युदय किस उपायसे होता है? भरतश्रेष्ठ! पुरवासियों और भरण-पोषण करने योग्य सेवकोंकी उन्नति भी किस उपायसे होती है? ॥ ३ ॥
कोशं दण्डं च दुर्गं च सहायान् मन्त्रिणस्तथा ।
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान् कीदृशान् वर्जयेन्नृपः ॥ ४ ॥
‘राजाको किस प्रकारके कोश, दण्ड, दुर्ग, सहायक, मन्त्री, ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्योंका त्याग कर देना चाहिये? ॥ ४ ॥
केषु विश्वसितव्यं स्याद् राज्ञा कस्याञ्चिदापदि ।
कुतो वाऽऽत्मा दृढं रक्ष्यस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ५ ॥
‘पितामह! किसी आपत्तिके आनेपर राजाको किन लोगोंपर विश्वास करना चाहिये और किन लोगोंसे अपने शरीरकी दृढ़तापूर्वक रक्षा करनी चाहिये? यह मुझे बताइये’ ॥ ५ ॥
भीष्म उवाच
नमो धर्माय महते नमः कृष्णाय वेधसे ।
ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान् ॥ ६ ॥
**भीष्मजीने कहा—**महान् धर्मको नमस्कार है, विश्वविधाता श्रीकृष्णको नमस्कार है। अब मैं उपस्थित ब्राह्मणोंको नमस्कार करके सनातन धर्मका वर्णन आरम्भ करता हूँ॥ ६॥
अक्रोधः सत्यवचनं संविभागः क्षमा तथा ।
प्रजनः स्वेषु दारेषु शौचमद्रोह एव च ॥ ७ ॥
आर्जवं भृत्यभरणं नवैते सार्ववर्णिकाः ।
ब्राह्मणस्य तु यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि केवलम् ॥ ८ ॥
किसीपर क्रोध न करना, सत्य बोलना, धनको बाँटकर भोगना, क्षमाभाव रखना, अपनी ही पत्नीके गर्भसे संतान पैदा करना, बाहर-भीतरसे पवित्र रहना, किसीसे द्रोह न करना, सरलभाव रखना और भरण-पोषणके योग्य व्यक्तियोंका पालन करना—ये नौ सभी वर्णोंके लिये उपयोगी धर्म हैं। अब मैं केवल ब्राह्मणका जो धर्म है, उसे बता रहा हूँ॥ ७-८॥
दममेव महाराज धर्ममाहुः पुरातनम् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव तत्र कर्म समाप्यते ॥ ९ ॥
महाराज! इन्द्रिय-संयमको ब्राह्मणोंका प्राचीन धर्म बताया गया है। इसके सिवा, उन्हें सदा वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करना चाहिये; क्योंकि इसीसे उनके सब कर्मोंकी पूर्ति हो जाती है ॥ ९ ॥
तं चेद् द्विजमुपागच्छेद् वर्तमानं स्वकर्मणि ।
अकुर्वाणं विकर्माणि शान्तं प्रज्ञानतर्पितम् ॥ १० ॥
कुर्वीतापत्यसंतानमथो दद्याद् यजेत च ।
संविभज्य च भोक्तव्यं धनं सद्भिरीर्यते ॥ ११ ॥
यदि अपने वर्णोचित कर्ममें स्थित, शान्त और ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त ब्राह्मणको किसी प्रकारके असत् कर्मका आश्रय लिये बिना ही धन प्राप्त हो जाय तो वह उस धनसे विवाह करके संतानकी उत्पत्ति करे अथवा उस धनको दान और यज्ञमें लगा दे। धनको बाँटकर ही भोगना चाहिये, ऐसा सत्पुरुषोंका कथन है ॥
परिनिष्ठितकार्यस्तु स्वाध्यायेनैव ब्राह्मणः ।
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ १२ ॥
ब्राह्मण केवल वेदोंके स्वाध्यायसे ही कृतकृत्य हो जाता है। वह दूसरा कर्म करे या न करे। सब जीवोंके प्रति मैत्रीभाव रखनेके कारण वह मैत्र कहलाता है ॥
क्षत्रियस्यापि यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि भारत ।
दद्याद् राजन् न याचेत यजेत न च याजयेत् ॥ १३ ॥
भरतनन्दन! क्षत्रियका भी जो धर्म है, वह तुम्हें बता रहा हूँ। राजन्! क्षत्रिय दान तो करे, किंतु किसीसे याचना न करे; स्वयं यज्ञ करे, किंतु पुरोहित बनकर दूसरोंका यज्ञ न
करावे ॥ १३ ॥ नाध्यापयेदधीयीत प्रजाश्च परिपालयेत् । नित्योद्युक्तो दस्युवधे रणे कुर्यात् पराक्रमम् ॥ १४ ॥ वह अध्ययन करे, किंतु अध्यापक न बने, प्रजाजनोंका सब प्रकारसे पालन करता रहे। लुटेरों और डाकुओंका वध करनेके लिये सदा तैयार रहे। रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करे ॥ १४ ॥
ये तु क्रतुभिरीजानाः श्रुतवन्तश्च भूमिपाः । य एवाहवजेतारस्त एषां लोकजित्तमाः ॥ १५ ॥ इन राजाओंमें जो भूपाल बड़े-बड़े यज्ञ करनेवाले तथा वेदशास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न हैं और जो युद्धमें विजय प्राप्त करनेवाले हैं, वे ही पुण्यलोकोंपर विजय प्राप्त करनेवालोंमें उत्तम हैं ॥ १५ ॥
अविक्षतेन देहेन समराद् यो निवर्तते । क्षत्रियो नास्य तत् कर्म प्रशंसन्ति पुराविदः ॥ १६ ॥ जो क्षत्रिय शरीरपर घाव हुए बिना ही समर-भूमिसे लौट आता है, उसके इस कर्मकी पुरातन धर्मको जाननेवाले विद्वान् प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ १६ ॥
एवं हि क्षत्रबन्धूनां मार्गमाहुः प्रधानतः । नास्य कृत्यतमं किंचिदन्यद् दस्युनिबर्हणात् ॥ १७ ॥ दानमध्ययनं यज्ञो राज्ञां क्षेमो विधीयते । तस्माद् राज्ञा विशेषेण योद्धव्यं धर्ममीप्सता ॥ १८ ॥ इस प्रकार युद्धको ही क्षत्रियोंके लिये प्रधान मार्ग बताया गया है, उसके लिये लुटेरोंके संहारसे बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठतम कर्म नहीं है। यद्यपि दान, अध्ययन और यज्ञ—इनके अनुष्ठानसे भी राजाओंका कल्याण होता है, तथापि युद्ध उनके लिये सबसे बढ़कर है; अतः विशेषरूपसे धर्मकी इच्छा रखनेवाले राजाको सदा ही युद्धके लिये उद्यत रहना चाहिये ॥ १७-१८ ॥
स्वेषु धर्मेष्ववस्थाप्य प्रजाः सर्वा महीपतिः । धर्मेण सर्वकृत्यानि शमनिष्ठानि कारयेत् ॥ १९ ॥ राजा समस्त प्रजाओंको अपने-अपने धर्मोंमें स्थापित करके उनके द्वारा शान्तिपूर्ण समस्त कर्मोंका धर्मके अनुसार अनुष्ठान करावे ॥ १९ ॥
परिनिष्ठितकार्यस्तु नृपतिः परिपालनात् । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यादैन्द्रो राजन्य उच्यते ॥ २० ॥ राजा दूसरा कर्म करे या न करे, प्रजाकी रक्षा करने-मात्रसे वह कृतकृत्य हो जाता है। उसमें इन्द्र देवता-सम्बन्धी बलकी प्रधानता होनेसे राजा ‘ऐन्द्र’ कहलाता है ॥
वैश्यस्यापि हि यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि शाश्वतम् ।
दानमध्ययनं यज्ञः शौचेन धनसंचयः ॥ २१ ॥ अब वैश्यका जो सनातन धर्म है, वह तुम्हें बता रहा हूँ। दान, अध्ययन, यज्ञ और पवित्रतापूर्वक धनका संग्रह ये वैश्यके कर्म हैं ॥ २१ ॥ पितृवत् पालयेद् वैश्यो युक्तः सर्वान् पशूनिह । विकर्म तद् भवेदन्यत् कर्म यत् स समाचरेत् ॥ २२ ॥ वैश्य सदा उद्योगशील रहकर पुत्रोंकी रक्षा करनेवाले पिताके समान सब प्रकारके पशुओंका पालन करे। इन कर्मोंके सिवा वह और जो कुछ भी करेगा, वह उसके लिये विपरीत कर्म होगा ॥ २२ ॥ रक्षया स हि तेषां वै महत् सुखमवाप्नुयात् । प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददौ पशून् ॥ २३ ॥ पशुओंके पालनसे वैश्यको महान् सुखकी प्राप्ति हो सकती है। प्रजापतिने पशुओंकी सृष्टि करके उनके पालनका भार वैश्यको सौंप दिया था ॥ २३ ॥ ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः । तस्य वृत्तिं प्रवक्ष्यामि यच्च तस्योपजीवनम् ॥ २४ ॥ ब्राह्मण और राजाको उन्होंने सारी प्रजाके पोषणका भार सौंपा था। अब मैं वैश्यकी उस वृत्तिका वर्णन करूँगा, जिससे उसका जीवन-निर्वाह हो ॥ २४ ॥ षण्णामेकां पिबेद् धेनुं शताच्च मिथुनं हरेत् । लब्धाच्च सप्तमं भागं तथा शृङ्गे कलां खुरे ॥ २५ ॥ वैश्य यदि राजा या किसी दूसरेकी छः दुधारू गौओंका एक वर्षतक पालन करे तो उनमेंसे एक गौका दूध वह स्वयं पीये (यही उसके लिये वेतन है)। यदि दूसरेकी एक सौ गौओंका वह पालन करे तो सालभरमें एक गाय और एक बैल मालिकसे वेतनके रूपमें ले ले। यदि उन पशुओंके दूध आदि बेचनेसे धन प्राप्त हो तो उसमें सातवाँ भाग वह अपने वेतनके रूपमें ग्रहण करे। सींग बेचनेसे जो धन मिले, उसमेंसे भी वह सातवाँ भाग ही ले; परंतु पशुविशेषका बहुमूल्य खुर बेचनेसे जो धन प्राप्त हो, उसका सोलहवाँ भाग ही उसे ग्रहण करना चाहिये ॥ २५ ॥ सस्यानां सर्वबीजानामेषा सांवत्सरी भृतिः । न च वैश्यस्य कामः स्यान्न रक्षेयं पशूनिति ॥ २६ ॥ दूसरेके अनाजकी फसलों तथा सब प्रकारके बीजोंकी रक्षा करनेपर वैश्यको उपजका सातवाँ भाग वेतनके रूपमें ग्रहण करना चाहिये। यह उसके लिये वार्षिक वेतन है। वैश्यके मनमें कभी यह संकल्प नहीं उठना चाहिये कि 'मैं पशुओंका पालन नहीं करूँगा' ॥ २६ ॥ वैश्ये चेच्छति नान्येन रक्षितव्याः कथंचन । शूद्रस्यापि हि यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि भारत ॥ २७ ॥
जबतक वैश्य पशुपालनका कार्य करना चाहे, तबतक मालिकको दूसरे किसीके द्वारा किसी तरह भी वह कार्य नहीं कराना चाहिये, भारत! अब मैं शूद्रका भी धर्म तुम्हें बता रहा हूँ॥ २७ ॥
प्रजापतिर्हि वर्णानां दासं शूद्रमकल्पयत् ।
तस्माच्छूद्रस्य वर्णानां परिचर्या विधीयते ॥ २८ ॥
प्रजापतिने अन्य तीनों वर्णोंके सेवकके रूपमें शूद्रकी सृष्टि की है; अतः शूद्रके लिये तीनों वर्णोंकी सेवा ही शास्त्र-विहित कर्म है ॥ २८ ॥
तेषां शुश्रूषणाच्चैव महत् सुखमवाप्नुयात् ।
शूद्र एतान् परिचरेत् त्रीन् वर्णाननुपूर्वशः ॥ २९ ॥
वह उन तीनों वर्णोंकी सेवासे ही महान् सुखका भागी हो सकता है। अतः शूद्र इन तीनों वर्णोंकी क्रमशः सेवा करे ॥ २९ ॥
संचयांश्च न कुर्वीत जातु शूद्रः कथंचन ।
पापीयान् हि धनं लब्ध्वा वशे कुर्याद् गरीयसः ॥ ३० ॥
शूद्रको कभी किसी प्रकार भी धनका संग्रह नहीं करना चाहिये; क्योंकि धन पाकर वह महान् पापमें प्रवृत्त हो जाता है और अपनेसे श्रेष्ठतम पुरुषोंको भी अपने अधीन रखने लगता है ॥ ३० ॥
राज्ञा वा समनुज्ञातः कामं कुर्वीत धार्मिकः ।
तस्य वृत्तिं प्रवक्ष्यामि यच्च तस्योपजीवनम् ॥ ३१ ॥
धर्मात्मा शूद्र राजाकी आज्ञा लेकर अपनी इच्छाके अनुसार कोई धार्मिक कृत्य कर सकता है। अब मैं उसकी वृत्तिका वर्णन करूँगा, जिससे उसकी आजीविका चल सकती है ॥ ३१ ॥
अवश्यं भरणीयो हि वर्णानां शूद्र उच्यते ।
छत्रं वेष्टनमौशीरमुपानद् व्यजनानि च ॥ ३२ ॥
यातयामानि देयानि शूद्राय परिचारिणे ।
तीनों वर्णोंको शूद्रका भरण-पोषण अवश्य करना चाहिये; क्योंकि वह भरण-पोषण करने योग्य कहा गया है। अपनी सेवामें रहनेवाले शूद्रको उपभोगमें लाये हुए छाते, पगड़ी, अनुलेपन, जूते और पंखे देने चाहिये ॥ ३२ १/२ ॥
अधार्याणि विशीर्णानि वसनानि द्विजातिभिः ॥ ३३ ॥
शूद्रायैव प्रदेयानि तस्य धर्मधनं हि तत् ।
फटे-पुराने कपड़े, जो अपने धारण करने योग्य न रहें, वे द्विजातियोंद्वारा शूद्रको ही दे देने योग्य हैं; क्योंकि धर्मतः वे सब वस्तुएँ शूद्रकी ही सम्पत्ति हैं ॥ ३३ १/२ ॥
यं च कञ्चिद् द्विजातीनां शूद्रः शुश्रूषुराव्रजेत् ॥ ३४ ॥
कल्प्यां तेन तु ते प्राहुर्वृत्तिं धर्मविदो जनाः ।
द्विजातियोंमेंसे जिस किसीकी सेवा करनेके लिये कोई शूद्र आवे, उसीको उसकी जीविकाकी व्यवस्था करनी चाहिये; ऐसा धर्मज्ञ पुरुषोंका कथन है ॥ ३४½ ॥
देयः पिण्डोऽनपत्याय भर्त्तव्यो वृद्धदुर्बलौ ॥ ३५ ॥
शूद्रेण तु न हातव्यो भर्ता कस्याञ्चिदापदि ।
अतिरेकेण भर्त्तव्यो भर्ता द्रव्यपरिक्षये ॥ ३६ ॥
यदि स्वामी संतानहीन हो तो सेवा करनेवाले शूद्रको ही उसके लिये पिण्डदान करना चाहिये। यदि स्वामी बूढ़ा या दुर्बल हो तो उसका सब प्रकारसे भरण-पोषण करना चाहिये। किसी आपत्तिमें भी शूद्रको अपने स्वामीका परित्याग नहीं करना चाहिये। यदि स्वामीके धनका नाश हो जाय तो शूद्रको अपने कुटुम्बके पालनसे बचे हुए धनके द्वारा उसका भरण-पोषण करना चाहिये ॥ ३५-३६ ॥
न हि स्वमस्ति शूद्रस्य भर्तृहार्यधनो हि सः ।
उक्तस्त्रयाणां वर्णानां यज्ञस्तस्य च भारत ।
स्वाहाकारवषट्कारौ मन्त्रः शूद्रे न विद्यते ॥ ३७ ॥
शूद्रका अपना कोई धन नहीं होता। उसके सारे धनपर उसके स्वामीका ही अधिकार होता है। भरतनन्दन! यज्ञका अनुष्ठान तीनों वर्णों तथा शूद्रके लिये भी आवश्यक बताया गया है। शूद्रके यज्ञमें स्वाहाकार, वषट्कार तथा वैदिक मन्त्रोंका प्रयोग नहीं होता है ॥ ३७ ॥
तस्माच्छूद्रः पाकयज्ञैर्यजेताव्रतवान् स्वयम् ।
पूर्णपात्रमयीमाहुः पाकयज्ञस्य दक्षिणाम् ॥ ३८ ॥
अतः शूद्र स्वयं वैदिक व्रतोंकी दीक्षा न लेकर पाकयज्ञों (बलिवैश्वदेव आदि) द्वारा यजन करे। पाकयज्ञकी दक्षिणा पूर्णपात्रमयी* बतायी गयी है ॥ ३८ ॥
शूद्रः पैजवनो नाम सहस्राणां शतं ददौ ।
ऐन्द्राग्नेन विधानेन दक्षिणामिति नः श्रुतम् ॥ ३९ ॥
हमने सुना है कि पैजवन नामक शूद्रने ऐन्द्राग्न यज्ञकी विधिसे मन्त्रहीन यज्ञका अनुष्ठान करके उसकी दक्षिणाके रूपमें एक लाख पूर्णपात्र दान किये थे ॥ ३९ ॥
यतो हि सर्ववर्णानां यज्ञस्तस्यैव भारत ।
अग्रे सर्वेषु यज्ञेषु श्रद्धायज्ञो विधीयते ॥ ४० ॥
भरतनन्दन! ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंका जो यज्ञ है वह सब सेवाकार्य करनेके कारण शूद्रका भी है ही (उसे भी उसका फल मिलता ही है; अतः उसे पृथक् यज्ञ करनेकी आवश्यकता नहीं है)। सम्पूर्ण यज्ञोंमें पहले श्रद्धारूप यज्ञका ही विधान है ॥ ४० ॥
दैवतं हि महच्छ्रद्धा पवित्रं यजतां च यत् ।
दैवतं हि परं विप्राः स्वेन स्वेन परस्परम् ॥ ४१ ॥
क्योंकि श्रद्धा सबसे बड़ा देवता है। वही यज्ञ करने-वालोंको पवित्र करती है। ब्राह्मण साक्षात् यज्ञ करानेके कारण परम देवता माने गये हैं। सभी वर्णोंके लोग अपने-अपने कर्मद्वारा एक-दूसरेके यज्ञोंमें सहायक होते हैं॥
अयजन्न्रिह सत्रैस्ते तैस्तैः कामैः समाहिताः ।
संसृष्टा ब्राह्मणैरेव त्रिषु वर्णेषु सृष्टयः ॥ ४२ ॥
सभी वर्णके लोगोंने यहाँ यज्ञोंका अनुष्ठान किया है और उनके द्वारा वे मनोवाञ्छित फलोंसे सम्पन्न हुए हैं। ब्राह्मणोंने ही तीनों वर्णोंकी संतानोंकी सृष्टि की है॥
देवानापि ये देवा यद् ब्रूयुस्ते परं हितम् ।
तस्माद् वर्णैः सर्वयज्ञाः संसृज्यन्ते न काम्यया ॥ ४३ ॥
जो देवताओंके भी देवता हैं, वे ब्राह्मण जो कुछ कहें, वही सबके लिये परम हितकारक है; अतः अन्य वर्णोंके लोग ब्राह्मणोंके बताये अनुसार ही सब यज्ञोंका अनुष्ठान करें, अपनी इच्छासे न करें ॥ ४३ ॥
ऋग्यजुःसामवित् पूज्यो नित्यं स्याद् देववद् द्विजः ।
अनृग्यजुरसामा च प्राजापत्य उपद्रवः ।
यज्ञो मनीषया तात सर्ववर्णेषु भारत ॥ ४४ ॥
ऋक्, साम और यजुर्वेदका ज्ञाता ब्राह्मण सदा देवताके समान पूजनीय है। दास या शूद्र ऋक्, यजु और सामके ज्ञानसे शून्य होता है; तो भी वह 'प्राजापत्य' (प्रजापतिका भक्त) कहा गया है। तात! भरतनन्दन! मानसिक संकल्पद्वारा जो भावनात्मक यज्ञ होता है, उसमें सभी वर्णोंका अधिकार है ॥ ४४ ॥
नास्य यज्ञकृतो देवा ईहन्ते नेतरे जनाः ।
ततः सर्वेषु वर्णेषु श्रद्धायज्ञो विधीयते ॥ ४५ ॥
इस मानसिक यज्ञ करनेवाले यजमानके यज्ञमें देवता और मनुष्य सभी भाग ग्रहण करनेकी अभिलाषा रखते हैं; क्योंकि उसका यज्ञ श्रद्धाके कारण परम पवित्र होता है; अतः श्रद्धाप्रधान यज्ञ करनेका अधिकार सभी वर्णोंको प्राप्त है ॥ ४५ ॥
स्वं दैवतं ब्राह्मणः स्वेन नित्यं
परान् वर्णानयजन्नैवमासीत् ।
अधरो वितानः संसृष्टो वैश्यो
ब्राह्मणस्त्रिषु वर्णेषु यज्ञसृष्टः ॥ ४६ ॥
ब्राह्मण अपने कर्मोंद्वारा ही सदा दूसरे वर्णोंके लिये अपने-अपने देवताके समान है; अतः वह दूसरे वर्णोंका यज्ञ न करता हो, ऐसी बात नहीं है। जिस यज्ञमें वैश्य आचार्य आदिके रूपमें कार्य कर रहा हो, वह निकृष्ट माना गया है। विधाताने केवल ब्राह्मणको ही तीनों वर्णोंका यज्ञ करानेके लिये उत्पन्न किया है ॥ ४६ ॥
तस्माद् वर्णा ऋजवो ज्ञातिवर्णाः
संसृज्यन्ते तस्य विकार एव । एकं साम यजुरेकम्गेका विप्रश्चैको निश्चये तेषु सृष्टः ॥ ४७ ॥ विधाता एकमात्र ब्राह्मणसे ही अन्य तीन वर्णोंकी सृष्टि करते हैं, अतः शेष तीन वर्ण भी ब्राह्मणके समान ही सरल तथा उनके जाति-भाई या कुटुम्बी हैं। क्षत्रिय आदि तीनों वर्ण ब्राह्मणकी संतान ही हैं। जैसे ऋक्, यजुः और साम एकमात्र अकारसे ही प्रकट होनेके कारण परस्पर अभिन्न हैं, उसी प्रकार उन सभी वर्णोंमें तत्त्वका निश्चय किया जाय तो एकमात्र ब्राह्मण ही उन सबके रूपमें प्रकट हुआ है, अतः ब्राह्मणके साथ सबकी अभिन्नता है ॥ ४७ ॥ अत्र गाथा यज्ञगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । वैखानसानां राजेन्द्र मुनीनां यष्टुमिच्छताम् ॥ ४८ ॥ राजेन्द्र! प्राचीन बातोंको जाननेवाले विद्वान् इस विषयमें यज्ञकी अभिलाषा रखनेवाले वैखानस मुनियोंकी कही हुई एक गाथाका उल्लेख किया करते हैं, जो यज्ञके सम्बन्धमें गायी गयी है ॥ ४८ ॥ उदितेऽनुदिते वापि श्रद्दधानो जितेन्द्रियः । वह्निं जुहोति धर्मेण श्रद्धा वै कारणं महत् ॥ ४९ ॥ 'सूर्यके उदय होनेपर अथवा सूर्योदयसे पहले ही श्रद्धालु एवं जितेन्द्रिय मनुष्य जो धर्मके अनुसार अग्निमें आहुति देता है, उसमें श्रद्धा ही प्रधान हेतु है ॥ ४९ ॥ यत् स्कन्नमस्य तत् पूर्वं यदस्कन्नं तदुत्तरम् । बहूनि यज्ञरूपाणि नानाकर्मफलानि च ॥ ५० ॥ (बह्वृच ब्राह्मणमें सोलह प्रकारके अग्निहोत्र बताये गये हैं) होताका किया हुआ जो हवन वायुदेवताके उद्देश्यसे होता है, वह स्कन्नसंज्ञक होम प्रथम है और उससे भिन्न जो स्कन्नसंज्ञक होम है, वह अन्तिम या सबसे उत्कृष्ट है। इसी प्रकार रौद्र आदि बहुत-से यज्ञ हैं, जो नाना प्रकारके कर्मफल देनेवाले हैं ॥ ५० ॥ तानि यः सम्प्रजानाति ज्ञाननिश्चयनिश्चितः । द्विजातिः श्रद्धयोपेतः स यष्टुं पुरुषोऽर्हति ॥ ५१ ॥ उन षोडश प्रकारके अग्निहोत्रोंको जो जानता है, वही यज्ञ-सम्बन्धी निश्चयात्मक ज्ञानसे सम्पन्न है। ऐसा ज्ञानी एवं श्रद्धालु द्विज ही यज्ञ करनेका अधिकारी है ॥ स्तेनो वा यदि वा पापो यदि वा पापकृत्तमः । यष्टुमिच्छति यज्ञं यः साधुमेव वदन्ति तम् ॥ ५२ ॥ यदि कोई चोर हो, पापी हो अथवा पापाचारियोंमें भी सबसे महान् हो तो भी जो यज्ञ करना चाहता है, उसे सभी लोग 'साधु' ही कहते हैं ॥ ५२ ॥ ऋषयस्तं प्रशंसन्ति साधु चैतदसंशयम् ।
सर्वथा सर्वदा वर्णैर्यष्टव्यमिति निर्णयः ॥ ५३ ॥
ऋषि भी उसकी प्रशंसा करते हैं। यह यज्ञ-कर्म श्रेष्ठ है, इसमें कोई संदेह नहीं है; अतः सभी वर्णके लोगोंको सदा सब प्रकारसे यज्ञ करना चाहिये, यही शास्त्रोंका निर्णय है ॥ ५३ ॥
न हि यज्ञसमं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
तस्माद् यष्टव्यमित्याहुः पुरुषेणानसूयता ।
श्रद्धापवित्रमाश्रित्य यथाशक्ति यथेच्छया ॥ ५४ ॥
तीनों लोकोंमें यज्ञके समान कुछ भी नहीं है; इसलिये मनुष्यको दोषदृष्टिका परित्याग करके शास्त्रीय विधिका आश्रय ले अपनी शक्ति और इच्छाके अनुसार उत्तम श्रद्धापूर्वक यज्ञका अनुष्ठान करना चाहिये, ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वर्णाश्रमधर्मकथने षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें वर्णाश्रमधर्मका वर्णनविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥
* पूर्णपात्रका परिमाण इस प्रकार है—आठ मुट्ठी अन्नको ‘किंचित्’ कहते हैं, आठ किंचित्का एक ‘पुष्कल’ होता है और चार पुष्कलका एक ‘पूर्णपात्र’ होता है। इस प्रकार दे सौ छप्पन मुट्ठीका एक पूर्णपात्र होता है।
आश्रम-धर्मका वर्णन
एकषष्टितमोऽध्यायः
आश्रम-धर्मका वर्णन
भीष्म उवाच
आश्रमाणां महाबाहो शृणु सत्यपराक्रम ।
चतुर्णामपि नामानि कर्माणि च युधिष्ठिर ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—सत्यपराक्रमी महाबाहु युधिष्ठिर! अब तुम चारों आश्रमोंके नाम और कर्म सुनो ॥ १ ॥
वानप्रस्थं भैक्ष्यचर्यं गार्हस्थ्यं च महाश्रमम् ।
ब्रह्मचर्याश्रमं प्राहुश्चतुर्थं ब्राह्मणैर्वृतम् ॥ २ ॥
ब्रह्मचर्य, महान् आश्रम गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और भैक्ष्यचर्य (संन्यास)—ये चार आश्रम हैं। चौथे आश्रम संन्यासका अवलम्बन केवल ब्राह्मणोंने किया है ॥ २ ॥
जटाधारणसंस्कारं द्विजातित्वमवाप्य च ।
आधानादीनि कर्माणि प्राप्य वेदमधीत्य च ॥ ३ ॥
सदारो वाप्यदारो वा आत्मवान् संयतेन्द्रियः ।
वानप्रस्थाश्रमं गच्छेत् कृतकृत्यो गृहाश्रमात् ॥ ४ ॥
(ब्रह्मचर्य-आश्रममें) चूड़ाकरण-संस्कार और उपनयनके अनन्तर द्विजत्वको प्राप्त हो वेदाध्ययन पूर्ण करके (समावर्तनके पश्चात् विवाह करे, फिर) गार्हस्थ्य आश्रममें अग्निहोत्र आदि कर्म सम्पन्न करके इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए मनस्वी पुरुष स्त्रीको साथ लेकर अथवा बिना स्त्रीके ही गृहस्थाश्रमसे कृतकृत्य हो वानप्रस्थाश्रममें प्रवेश करे ॥ ३-४ ॥
तत्रारण्यकशास्त्राणि समधीत्य स धर्मवित् ।
ऊर्ध्वरेताः प्रव्रजित्वा गच्छत्यक्षरसात्मताम् ॥ ५ ॥
वहाँ धर्मज्ञ पुरुष आरण्यकशास्त्रोंका अध्ययन करके वानप्रस्थ-धर्मका पालन करे। तत्पश्चात् ब्रह्मचर्य पालनपूर्वक उस आश्रमसे निकल जाय और विधिपूर्वक संन्यास ग्रहण कर ले। इस प्रकार संन्यास लेनेवाला पुरुष अविनाशी ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ५ ॥
एतान्येव निमित्तानि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ।
कर्तव्यानीह विप्रेण राजन्नादौ विपश्चिता ॥ ६ ॥
राजन्! विद्वान् ब्राह्मणको ऊर्ध्वरेता मुनियोंद्वारा आचरणमें लाये हुए इन्हीं साधनोंका सर्वप्रथम आश्रय लेना चाहिये ॥ ६ ॥
चरितब्रह्मचर्यस्य ब्राह्मणस्य विशाम्पते ।
भैक्ष्यचर्यास्वधीकारः प्रशस्त इह मोक्षिणः ॥ ७ ॥
प्रजानाथ! जिसने ब्रह्मचर्यका पालन किया है, उस ब्रह्मचारी ब्राह्मणके मनमें यदि मोक्षकी अभिलाषा जाग उठे तो उसे ब्रह्मचर्य-आश्रमसे ही संन्यास ग्रहण करनेका उत्तम अधिकार प्राप्त हो जाता है ॥ ७ ॥
यत्रास्तमितशायी स्यान्निराशीरनिकेतनः ।
यथोपलब्धजीवी स्यान्मुनिर्दन्तो जितेन्द्रियः ॥ ८ ॥
संन्यासीको चाहिये कि वह मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए मुनिवृत्तिसे रहे। किसी वस्तुकी कामना न करे। अपने लिये मठ या कुटी न बनवाये। निरन्तर घूमता रहे और जहाँ सूर्यास्त हो वहीं ठहर जाय। प्रारब्धवश जो कुछ मिल जाय, उसीसे जीवन-निर्वाह करे ॥ ८ ॥
निराशीः स्यात् सर्वसमो निर्भोगो निर्विकारवान् ।
विप्रः क्षेमाश्रमं प्राप्तो गच्छत्यक्षरसात्मताम् ॥ ९ ॥
आशा-तृष्णाका सर्वथा त्याग करके सबके प्रति समान भाव रखे। भोगोंसे दूर रहे और हृदयमें किसी प्रकारका विकार न आने दे। इन्हीं सब धर्मोंके कारण इस आश्रमको 'क्षेमाश्रम' (कल्याणप्राप्तिका स्थान) कहते हैं। इस आश्रममें आया हुआ ब्राह्मण अविनाशी ब्रह्मके साथ एकता प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥
अधीत्य वेदान् कृतसर्वकृत्यः
सन्तानमुत्पाद्य सुखानि भुक्त्वा ।
समाहितः प्रचरेद् दुष्करं यो
गार्हस्थ्यधर्मं मुनिधर्मजुष्टम् ॥ १० ॥
अब गृहस्थाश्रमके धर्म सुनो—जो वेदोंका अध्ययन पूर्ण करके समस्त वेदोक्त शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करनेके पश्चात् अपनी विवाहिता पत्नीके गर्भसे संतान उत्पन्न कर उस आश्रमके न्यायोचित भोगोंको भोगता और एकाग्रचित्त हो मुनिजनोचित धर्मसे युक्त दुष्कर गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करता है, वह उत्तम है ॥ १० ॥
स्वदारतुष्टस्त्वृतुकालगामी
नियोगसेवी न शठो न जिह्मः ।
मिताशनो देवरतः कृतज्ञः
सत्यो मृदुश्चानृशंसः क्षमावान् ॥ ११ ॥
गृहस्थको चाहिये कि वह अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखते हुए संतुष्ट रहे। ऋतुकालमें ही पत्नीके साथ समागम करे। शास्त्रोंकी आज्ञाका पालन करता रहे। शठता और कुटिलतासे दूर रहे। परिमित आहार ग्रहण करे। देवताओंकी आराधनामें तत्पर रहे। उपकार
करनेवालोंके प्रति कृतज्ञता प्रकट करे। सत्य बोले। सबके प्रति मृदुभाव रखे। किसीके प्रति क्रूर न बने और सदा क्षमाभाव रखे ॥ ११ ॥
दान्तो विधेयो हव्यकव्येऽप्रमत्तो
ह्यन्नस्य दाता सततं द्विजेभ्यः ।
अमत्सरी सर्वलिङ्गप्रदाता
वैताननित्यश्च गृहाश्रमी स्यात् ॥ १२ ॥
गृहस्थाश्रमी पुरुष इन्द्रियोंका संयम करे, गुरुजनों एवं शास्त्रोंकी आज्ञा माने, देवताओं और पितरोंकी तृप्तिके लिये हव्य और कव्य समर्पित करनेमें कभी भूल न होने दे, ब्राह्मणोंको निरन्तर अन्नदान करे, ईर्ष्या-द्वेषसे दूर रहे, अन्य सब आश्रमोंको भोजन देकर उनका पालन-पोषण करता रहे और सदा यज्ञ-यागादिमें लगा रहे ॥ १२ ॥
अथात्र नारायणगीतमाहु-
र्महर्षयस्तात महानुभावाः ।
महार्थमत्यन्ततपःप्रयुक्तं
तदुच्यमानं हि मया निबोध ॥ १३ ॥
तात! इस विषयमें महानुभाव महर्षिगण नारायण-गीतका उल्लेख किया करते हैं जो महान् अर्थसे युक्त और अत्यन्त तपस्याद्वारा प्रेरित होकर कहा गया है। मैं उसका वर्णन करता हूँ, तुम सुनो ॥ १३ ॥
सत्यार्जवं चातिथिपूजनं च
धर्मस्तथार्थश्च रतिः स्वदारैः ।
निषेवितव्यानि सुखानि लोके
ह्यस्मिन् परे चैव मतं ममैतत् ॥ १४ ॥
'गृहस्थ पुरुष इस लोकमें सत्य, सरलता, अतिथि-सत्कार, धर्म, अर्थ, अपनी पत्नीके प्रति अनुराग तथा सुखका सेवन करे। ऐसा होनेपर ही उसे परलोकमें भी सुख प्राप्त होते हैं, यह मेरा मत है' ॥ १४ ॥
भरणं पुत्रदाराणां वेदानां धारणं तथा ।
वसतामाश्रमं श्रेष्ठं वदन्ति परमर्षयः ॥ १५ ॥
श्रेष्ठ आश्रम गार्हस्थ्यमें निवास करनेवाले द्विजोंके लिये महर्षिगण यह कर्तव्य बताते हैं कि वह स्त्री और पुत्रोंका भरण-पोषण तथा वेदशास्त्रोंका स्वाध्याय करे ॥
एवं हि यो ब्राह्मणो यज्ञशीलो
गार्हस्थ्यमध्यावसते यथावत् ।
गृहस्थवृत्तिं प्रविशोध्य सम्यक्
स्वर्गे विशुद्धं फलमाप्नुते सः ॥ १६ ॥
जो ब्राह्मण इस प्रकार स्वभावतः यज्ञपरायण हो, गृहस्थ-धर्मका यथावत् रूपसे पालन करता है, वह गृहस्थ-वृत्तिका अच्छी तरह शोधन करके स्वर्गलोकमें विशुद्ध फलका भागी होता है ।। १६ ।।
तस्य देहपरित्यागादिष्टाः कामाक्षया मताः ।
आनन्त्यायोपतिष्ठन्ति सर्वतोऽक्षिशिरोमुखाः ।। १७ ।।
उस गृहस्थको देह-त्यागके पश्चात् उसके अभीष्ट मनोरथ अक्षयरूपसे प्राप्त होते हैं। वे उस पुरुषका संकल्प जानकर इस प्रकार अनन्तकालतकके लिये उसकी सेवामें उपस्थित हो जाते हैं, मानो उनके नेत्र, मस्तक और मुख सभी दिशाओंकी ओर हों ।। १७ ।।
स्मरन्नेको जपन्नेकः सर्वनेको युधिष्ठिर ।
एकस्मिन्नेव चाचार्ये शुश्रूषूर्मलपङ्कवान् ।। १८ ।।
युधिष्ठिर! ब्रह्मचारीको चाहिये कि वह अकेला ही वेदमन्त्रोंका चिन्तन और अभीष्ट मन्त्रोंका जप करते हुए सारे कार्य सम्पन्न करे, अपने शरीरमें मैल और कीचड़ लगी हो तो भी वह सेवाके लिये उद्यत हो एकमात्र आचार्यकी ही परिचर्यामें संलग्न रहे ।। १८ ।।
ब्रह्मचारी व्रती नित्यं नित्यं दीक्षापरो वशी ।
परिचार्य तथा वेदं कृत्यं कुर्वन् वसेत् सदा ।। १९ ।।
ब्रह्मचारी नित्य निरन्तर मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए व्रत एवं दीक्षाके पालनमें तत्पर रहे। वेदोंका स्वाध्याय करते हुए सदा कर्तव्य-कर्मोंके पालनपूर्वक गुरु-गृहमें निवास करे ।। १९ ।।
शुश्रूषां सततं कुर्वन् गुरोः सम्प्रणमेत च ।
षट्कर्मसु निवृत्तश्च न प्रवृत्तश्च सर्वशः ।। २० ।।
निरन्तर गुरुकी सेवामें संलग्न रहकर उन्हें प्रणाम करे। जीवन-निर्वाहके उद्देश्यसे किये जानेवाले यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन तथा दान और प्रतिग्रह—इन छः कर्मोंसे अलग रहे और किसी भी असत् कर्ममें वह कभी प्रवृत्त न हो ।। २० ।।
न चरत्यधिकारेण सेवेत द्विषतो न च ।
एषोऽऽश्रमपदस्तात ब्रह्मचारिण इष्यते ।। २१ ।।
अपने अधिकारका प्रदर्शन करते हुए व्यवहार न करे; द्वेष रखनेवालोंका सङ्ग न करे। वत्स युधिष्ठिर! ब्रह्मचारीके लिये यही आश्रम-धर्म अभीष्ट है ।। २१ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि चतुराश्रमधर्मकथने
एकषष्टितमोऽध्यायः ।। ६१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें चारों आश्रमोंके धर्मोंका वर्णनविषयक एकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६१ ।।
ब्राह्मणधर्म और कर्तव्यपालनका महत्त्व
द्विषष्टितमोऽध्यायः
ब्राह्मणधर्म और कर्तव्यपालनका महत्त्व
युधिष्ठिर उवाच
शिवान् सुखान् महोदर्कानहिंस्राँल्लोकसम्मतान् ।
ब्रूहि धर्मान् सुखोपायान् मद्विधानां सुखावहान् ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले— पितामह! अब आप ऐसे धर्मोंका वर्णन कीजिये; जो कल्याणमय, सुखमय, भविष्यमें अभ्युदयकारी, हिंसारहित, लोकसम्मानित, सुखसाधक तथा मुझ-जैसे लोगोंके लिये सुखपूर्वक आचरणमें लाये जा सकते हों ॥ १ ॥
भीष्म अवाच
ब्राह्मणस्य तु चत्वारस्त्वाश्रमा विहिताः प्रभो ।
वर्णास्तान् नानुवर्तन्ते त्रयो भारतसत्तम ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— प्रभो! भरतवंशावतंस युधिष्ठिर! चारों आश्रम ब्राह्मणोंके लिये ही विहित हैं। अन्य तीनों वर्णोंके लोग उन सभी आश्रमोंका अनुसरण नहीं करते हैं ॥
उक्तानि कर्माणि बहूनि राजन्
स्वर्ग्याणि राजन्यपरायणानि ।
नेमानि दृष्टान्तविधौ स्मृतानि
क्षात्रे हि सर्वं विहितं यथावत् ॥ ३ ॥
राजन्! क्षत्रियके लिये शास्त्रमें बहुत-से ऐसे स्वर्गसाधक कर्म बताये गये हैं, जो हिंसाप्रधान हैं, जैसे युद्ध। परंतु ये कर्म ब्राह्मणके लिये आदर्श नहीं हो सकते; क्योंकि क्षत्रियके लिये सभी प्रकारके कर्मोंका यथोचित विधान है ॥ ३ ॥
क्षात्राणि वैश्यानि च सेवमानः
शौद्राणि कर्माणि च ब्राह्मणः सन् ।
अस्मिँल्लोके निन्दितो मन्दचेताः
परे च लोके निरयं प्रयाति ॥ ४ ॥
जो ब्राह्मण होकर क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके कर्मोंका सेवन करता है, वह मन्दबुद्धि पुरुष इस लोकमें निन्दित और परलोकमें नरकगामी होता है ॥ ४ ॥
या संज्ञा विहिता लोके दासे शुनि वृके पशौ ।
विकर्मणि स्थिते विप्रे सैव संज्ञा च पाण्डव ॥ ५ ॥
पाण्डुनन्दन! लोकमें दास, कुत्ते, भेड़िये तथा अन्य पशुओंके लिये जो निन्दासूचक संज्ञा दी गयी है, अपने वर्णधर्मके विपरीत कर्ममें लगे हुए ब्राह्मणके लिये भी वही संज्ञा दी
जाती है ॥ ५ ॥
षट्कर्मसम्प्रवृत्तस्य आश्रमेषु चतुर्ष्वपि ।
सर्वधर्मोपपन्नस्य संवृतस्य कृतात्मनः ॥ ६ ॥
ब्राह्मणस्य विशुद्धस्य तपस्यभिरतस्य च ।
निराशिषो वदान्यस्य लोका ह्यक्षरसम्मताः ॥ ७ ॥
जो ब्राह्मण यज्ञ करना-कराना, विद्या पढ़ना-पढ़ाना तथा दान लेना और देना—इन छः कर्मोंमें ही प्रवृत्त होता है, चारों आश्रमोंमें स्थित हो उनके सम्पूर्ण धर्मोंका पालन करता है, धर्ममय कवचसे सुरक्षित होता है और मनको वशमें किये रहता है, जिसके मनमें कोई कामना नहीं होती, जो बाहर-भीतरसे शुद्ध, तपस्यापरायण और उदार होता है, उसे अविनाशी लोक प्राप्त होते हैं ॥
यो यस्मिन् कुरुते कर्म यादृशं येन यत्र च ।
तादृशं तादृशेनैव स गुणं प्रतिपद्यते ॥ ८ ॥
जो पुरुष जिस अवस्थामें, जिस देश अथवा कालमें, जिस उद्देश्यसे जैसा कर्म करता है, वह (उसी अवस्थामें वैसे ही देश अथवा कालमें) वैसे भावसे उस कर्मका वैसा ही फल पाता है ॥ ८ ॥
वृद्ध्या कृषिवणिक्त्वेन जीवसंजीवनेन च ।
वेत्तुमर्हसि राजेन्द्र स्वाध्यायगणितं महत् ॥ ९ ॥
राजेन्द्र! वैश्यकी व्याज लेनेवाली वृत्ति, खेती और वाणिज्यके समान तथा क्षत्रियके प्रजापालनरूप कर्मके समान ब्राह्मणोंके लिये वेदाभ्यासरूपी कर्म ही महान् है—ऐसा तुम्हें समझना चाहिये ॥ ९ ॥
कालसंचोदितो लोकः कालपर्यायनिश्चितः ।
उत्तमाधममध्यानि कर्माणि कुरुतेऽवशः ॥ १० ॥
कालके उलट-फेरसे प्रभावित तथा स्वभावसे प्रेरित हुआ मनुष्य विवश-सा होकर उत्तम, मध्यम और अधम कर्म करता है ॥ १० ॥
अन्तवन्ति प्रधानानि पुरा श्रेयस्कराणि च ।
स्वकर्मनिरतो लोके ह्यक्षरः सर्वतोमुखः ॥ ११ ॥
पहलेके जो कल्याणकारी और अमङ्गलकारी शुभाशुभ कर्म हैं, वे ही प्रधान होकर इस शरीरका निर्माण करते हैं। इस शरीरके साथ ही उनका भी अन्त हो जाता है; परंतु जगत्में अपने वर्णाश्रमोचित कर्मके पालनमें तत्पर रहनेवाला पुरुष तो हर अवस्थामें सर्वव्यापी और अविनाशी ही है ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वर्णाश्रमधर्मकथने
द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें वर्णाश्रमधर्मका वर्णनविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६२ ।।
वर्णाश्रमधर्मका वर्णन तथा राजधर्मकी श्रेष्ठता
त्रिषष्टितमोऽध्यायः
वर्णाश्रमधर्मका वर्णन तथा राजधर्मकी श्रेष्ठता
भीष्म उवाच
ज्याकर्षणं शत्रुनिबर्हणं च
कृषिर्वणिज्या पशुपालनं च ।
शुश्रूषणं चापि तथार्थहेतो-
रकार्यमेतत् परमं द्विजस्य ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! धनुषकी डोरी खींचना, शत्रुओंको उखाड़ फेंकना, खेती, व्यापार और पशुपालन करना अथवा धनके उद्देश्यसे दूसरोंकी सेवा करना—ये ब्राह्मणके लिये अत्यन्त निषिद्ध कर्म हैं ॥ १ ॥
सेव्यं तु ब्रह्म षट्कर्म गृहस्थेन मनीषिणा ।
कृतकृत्यस्य चारण्ये वासो विप्रस्य शस्यते ॥ २ ॥
मनीषी ब्राह्मण यदि गृहस्थ हो तो उसके लिये वेदोंका अभ्यास और यजन-याजन आदि छःकर्म ही सेवन करने योग्य हैं। गृहस्थ आश्रमका उद्देश्य पूर्ण कर लेनेपर ब्राह्मणके लिये (वानप्रस्थी होकर) वनमें निवास करना उत्तम माना गया है ॥ २ ॥
राजप्रेष्यं कृषिधनं जीवनं च वणिक्पथा ।
कौटिल्यं कौलटेयं च कुसीदं च विवर्जयेत् ॥ ३ ॥
गृहस्थ ब्राह्मण राजाकी दासता, खेतीके द्वारा धनका उपार्जन, व्यापारसे जीवन-निर्वाह, कुटिलता, व्यभिचारिणी स्त्रियोंके साथ व्यभिचारकर्म तथा सूदखोरी छोड़ दे ॥ ३ ॥
शूद्रो राजन् भवति ब्रह्मबन्धु-
र्दुश्चारित्रो यश्च धर्मादपेतः ।
वृषलीपतिः पिशुनो नर्तनश्च
राजप्रेष्यो यश्च भवेद् विकर्मा ॥ ४ ॥
राजन्! जो ब्राह्मण दुश्चरित्र, धर्महीन, शूद्रजातीय कुलटा स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाला, चुगलखोर, नाचनेवाला, राजसेवक तथा दूसरे-दूसरे विपरीत कर्म करनेवाला होता है, वह ब्राह्मणत्वसे गिरकर शूद्र हो जाता है ॥ ४ ॥
जपन् वेदानजपंश्चापि राजन्
समः शूद्रैर्दासवच्चापि भोज्यः ।
एते सर्वे शूद्रसमा भवन्ति
राजन्नेतान् वर्जयेद् देवकृत्ये ॥ ५ ॥