महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1248, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअमांसभोजिनश्चैव सदा प्राणिदयायुताः । प्रतिकर्मप्रदा वापि वस्त्रदा धर्मकारणात् ।। भूमिशुद्धिकरा वापि कारणादग्निपूजकाः ।। एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि ते नराः । रूपेण स्पृहणीयास्तु भवन्त्येव न संशयः ।। श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक इसका रहस्य बताता हूँ। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। जो मनुष्य पूर्वजन्ममें लज्जायुक्त, प्रिय वचन बोलनेवाले, शक्तिशाली और सदा स्वभावतः मधुर स्वभाववाले होकर सर्वदा समस्त प्राणियोंपर दया करते हैं, कभी मांस नहीं खाते हैं, धर्मके उद्देश्यसे वस्त्र और आभूषणोंका दान करते हैं, भूमिकी शुद्धि करते हैं, कारणवश अग्निकी पूजा करते हैं; ऐसे सदाचारसम्पन्न मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर रूप-सौन्दर्यकी दृष्टिसे स्पृहणीय होते ही हैं, इसमें संशय नहीं है ।।
उमोवाच
विरूपाश्च प्रदृश्यन्ते मानुषेष्वेव केचन । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।। उमाने पूछा— भगवन्! मनुष्योंमें ही कुछ लोग बड़े कुरूप दिखायी देते हैं, इसमें कौन-सा कर्मविपाक कारण है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।। रूपयोगात् पुरा मर्त्या दर्पाहंकारसंयुताः । विरूपहासकाश्चैव स्तुतिनिन्दादिभिर्भृशम् ।। परोपतापिनश्चैव मांसादाश्च तथैव च । अभ्यसूयापराश्चैव अशुद्धाश्च तथा नराः ।। एवंयुक्तसमाचारा यमलोके सुदण्डिताः । कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते रूपवर्जिताः ।। विरूपाः सम्भवन्त्येव नास्ति तत्र विचारणा । श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! सुनो, मैं तुमको इसका कारण बताता हूँ। पूर्वजन्ममें सुन्दर रूप पाकर जो मनुष्य दर्प और अहंकारसे युक्त हो स्तुति और निन्दा आदिके द्वारा कुरूप मनुष्योंकी बहुत हँसी उड़ाया करते हैं, दूसरोंको सताते, मांस खाते, पराया दोष देखते और सदा अशुद्ध रहते हैं, ऐसे अनाचारी मनुष्य यमलोकमें भलीभाँति दण्ड पाकर जब फिर किसी प्रकार मनुष्य-योनिमें जन्म लेते हैं, तब रूपहीन और कुरूप होते ही हैं। इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं ।।
उमोवाच