भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2243, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2243

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीमहाभारतम्

आश्रमवासिकपर्व

आश्रमवासपर्व

प्रथमोऽध्यायः

भाइयोंसहित युधिष्ठर तथा कुन्ती आदि देवियोंके द्वार धृतराष्ट्र और गान्धारीकी सेवा

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत) का पाठ करना चाहिये ॥

जनमेजय उवाच

प्राप्य राज्यं महात्मानः पाण्डवा मे पितामहाः ।
कथमासन् महाराज्ञि धृतराष्ट्रे महात्मनि ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! मेरे प्रपितामह महात्मा पाण्डव अपने राज्यपर अधिकार प्राप्त कर लेनेके बाद महाराज धृतराष्ट्रके प्रति कैसा बर्ताव करते थे? ॥ १ ॥
स तु राजा हतामात्यो हतपुत्रो निराश्रयः ।
कथमासीद्धतैश्वर्यो गान्धारी च यशस्विनी ॥ २ ॥
राजा धृतराष्ट्र अपने मन्त्री और पुत्रोंके मारे जानेसे निराश्रय हो गये थे। उनका ऐश्वर्य नष्ट हो गया था। ऐसी अवस्थामें वे और यशस्विनी गान्धारी देवी किस प्रकार जीवन व्यतीत करते थे ॥ २ ॥
कियन्तं चैव कालं ते मम पूर्वपितामहाः ।