भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2244, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2244

स्थिता राज्ये महात्मानस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥ मेरे पूर्वपितामह महात्मा पाण्डव कितने समयतक अपने राज्यपर प्रतिष्ठित रहे? ये सब बातें मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

प्राप्य राज्यं महात्मानः पाण्डवा हतशत्रवः । धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य पृथिवीं पर्यपालयन् ॥ ४ ॥ **वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! जिनके शत्रु मारे गये थे, वे महात्मा पाण्डव राज्य पानेके अनन्तर राजा धृतराष्ट्रको ही आगे रखकर पृथ्वीका पालन करने लगे ॥ ४ ॥

धृतराष्ट्रमुपातिष्ठद् विदुरः संजयस्तथा । वैश्यापुत्रश्च मेधावी युयुत्सुः कुरुसत्तम ॥ ५ ॥ कुरुश्रेष्ठ! विदुर, संजय तथा वैश्यापुत्र मेधावी युयुत्सु—ये लोग सदा धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित रहते थे ॥ ५ ॥

पाण्डवाः सर्वकार्याणि सम्पृच्छन्ति स्म तं नृपम् । चक्रुस्तेनाभ्यनुज्ञाता वर्षाणि दश पञ्च च ॥ ६ ॥ पाण्डवलोग सभी कार्योंमें राजा धृतराष्ट्रकी सलाह पूछा करते थे और उनकी आज्ञा लेकर प्रत्येक कार्य करते थे। इस तरह उन्होंने पंद्रह वर्षोंतक राज्यका शासन किया ॥ ६ ॥

सदा हि गत्वा ते वीराः पर्युपासन्त तं नृपम् । पादाभिवादनं कृत्वा धर्मराजमते स्थिताः ॥ ७ ॥ वीर पाण्डव प्रतिदिन राजा धृतराष्ट्रके पास जा उनके चरणोंमें प्रणाम करके कुछ कालतक उनकी सेवामें बैठे रहते थे और सदा धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञाके अधीन रहते थे ॥ ७ ॥

ते मूर्ध्नि समुपाघ्राताः सर्वकार्याणि चक्रिरे । कुन्तिभोजसुता चैव गान्धारीमन्ववर्तत ॥ ८ ॥ धृतराष्ट्र भी स्नेहवश पाण्डवोंका मस्तक सूँघकर जब उन्हें जानेकी आज्ञा देते, तब वे आकर सब कार्य किया करते थे। कुन्तीदेवी भी सदा गान्धारीकी सेवामें लगी रहती थीं ॥ ८ ॥

द्रौपदी च सुभद्रा च याश्चान्याः पाण्डवस्त्रियः । समां वृत्तिमवर्तन्त तयोः श्वश्र्वोर्यथाविधि ॥ ९ ॥ द्रौपदी, सुभद्रा तथा पाण्डवोंकी अन्य स्त्रियाँ भी कुन्ती और गान्धारी दोनों सासुओंकी समान भावसे विधिवत् सेवा किया करती थीं ॥ ९ ॥

शयनानि महार्हाणि वासांस्याभरणानि च । राजार्हाणि च सर्वाणि भक्ष्यभोज्यान्यनेकशः ॥ १० ॥