भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2245, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2245

युधिष्ठिरो महाराज धृतराष्ट्रैऽभ्युपाहरत् ।
तथैव कुन्ती गान्धार्यां गुरुवृत्तिमवर्तत ॥ ११ ॥
महाराज! राजा युधिष्ठिर बहुमूल्य शय्या, वस्त्र, आभूषण तथा राजाके उपभोगमें आने योग्य सब प्रकारके उत्तम पदार्थ एवं अनेकानेक भक्ष्य, भोज्य पदार्थ धृतराष्ट्रको अर्पण किया करते थे। इसी प्रकार कुन्तीदेवी भी अपनी सासकी भाँति गान्धारीकी परिचर्या किया करती थीं ॥ १०-११ ॥
विदुरः संजयश्चैव युयुत्सुश्चैव कौरव ।
उपासते स्म तं वृद्धं हतपुत्रं जनाधिपम् ॥ १२ ॥
कुरुनन्दन! जिनके पुत्र मारे गये थे, उन बूढ़े राजा धृतराष्ट्रकी विदुर, संजय और युयुत्सु —ये तीनों सदा सेवा करते रहते थे ॥ १२ ॥
श्यालो द्रोणस्य यश्चासीद् दयितो ब्राह्मणो महान् ।
स च तस्मिन् महेष्वासः कृपः समभवत् तदा ॥ १३ ॥
द्रोणाचार्यके प्रिय साले महान् ब्राह्मण महा-धनुर्धर कृपाचार्य तो उन दिनों सदा धृतराष्ट्रके ही पास रहते थे ॥ १३ ॥
व्यासश्च भगवान् नित्यमासांचक्रे नृपेण ह ।
कथाः कुर्वन् पुराणर्षिर्देवर्षिपितृरक्षसाम् ॥ १४ ॥
पुरातन ऋषि भगवान् व्यास भी प्रतिदिन उनके पास आकर बैठते और उन्हें देवर्षि, पितर तथा राक्षसोंकी कथाएँ सुनाया करते थे ॥ १४ ॥
धर्मयुक्तानि कार्याणि व्यवहारान्वितानि च ।
धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातो विदुरस्तान्यकारयत् ॥ १५ ॥
धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुरजी उनके समस्त धार्मिक और व्यावहारिक कार्य करते-कराते थे ॥ १५ ॥
सामन्तेभ्यः प्रियाण्यस्य कार्याणि सुबहून्यपि ।
प्राप्यन्तेऽर्थैः सुलघुभिः सुनयाद् विदुरस्य वै ॥ १६ ॥
विदुरजीकी अच्छी नीतिके कारण उनके बहुतेरे प्रिय कार्य थोड़े खर्चमें ही सामन्तों (सीमावर्ती राजाओं)-से सिद्ध हो जाया करते थे ॥ १६ ॥
अकरोद् बन्धमोक्षं च वध्यानां मोक्षणं तथा ।
न च धर्मसुतो राजा कदाचित् किंचिदब्रवीत् ॥ १७ ॥
वे कैदियोंको कैदसे छुटकारा दे देते और वधके योग्य मनुष्योंको भी प्राणदान देकर छोड़ देते थे; किंतु धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर इसके लिये उनसे कभी कुछ कहते नहीं थे ॥ १७ ॥
विहारयात्रासु पुनः कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
सर्वान् कामान् महातेजाः प्रददावम्बिकासुते ॥ १८ ॥