भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2246, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2246

महातेजस्वी कुरुराज युधिष्ठिर विहार और यात्राके अवसरोंपर राजा धृतराष्ट्रको समस्त मनोवाञ्छित वस्तुओंकी सुविधा देते थे ॥ १८ ॥
आरालिकाः सूपकारा रागखाण्डविकास्तथा ।
उपातिष्ठन्त राजानं धृतराष्ट्रं यथा पुरा ॥ १९ ॥
राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें पहलेकी ही भाँति उक्त अवसरोंपर भी रसोईके काममें निपुण आरालिक³, सूपकार³ और रागखाण्डविक³ मौजूद रहते थे ॥ १९ ॥
वासांसि च महार्हाणि माल्यानि विविधानि च ।
उपाजह्रुर्यथान्यायं धृतराष्ट्रस्य पाण्डवाः ॥ २० ॥
पाण्डवलोग धृतराष्ट्रको यथोचित रूपसे बहुमूल्य वस्त्र और नाना प्रकारकी मालाएँ भेंट करते थे ॥ २० ॥
मैरेयकाणि मांसानि पानकानि लघूनि च ।
चित्रान् भक्ष्यविकारांश्च चक्रुस्तस्य यथा पुरा ॥ २१ ॥
वे उनकी सेवामें पहलेकी ही भाँति सुखभोगप्रद फलके गूदे, हलके पानक (मीठे शर्बत) और अन्यान्य विचित्र प्रकारके भोजन प्रस्तुत करते थे ॥ २१ ॥
ये चापि पृथिवीपालाः समाजग्मुस्ततस्ततः ।
उपातिष्ठन्त ते सर्वे कौरवेन्द्रं यथा पुरा ॥ २२ ॥
भिन्न-भिन्न देशोंसे जो-जो भूपाल वहाँ पधारते थे, वे सब पहलेकी ही भाँति कौरवराज धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित होते थे ॥ २२ ॥
कुन्ती च द्रौपदी चैव सात्वती च यशस्विनी ।
उलूपी नागकन्या च देवी चित्राङ्गदा तथा ॥ २३ ॥
धृष्टकेतोश्च भगिनी जरासंधसुता तथा ।
एताश्चान्याश्च बह्व्यो वै योषितः पुरुषर्षभ ॥ २४ ॥
किंकराः पर्युपातिष्ठन् सर्वाः सुबलजां तथा ।
पुरुषप्रवर! कुन्ती, द्रौपदी, यशस्विनी सुभद्रा, नागकन्या उलूपी, देवी चित्रांगदा, धृष्टकेतुकी बहिन तथा जरासंधकी पुत्री—ये तथा कुरुकुलकी दूसरी बहुत-सी स्त्रियाँ दासीकी भाँति सुबलपुत्री गान्धारीकी सेवामें लगी रहती थीं ॥ २३-२४ १/२ ॥
यथा पुत्रवियुक्तोऽयं न किंचिद् दुःखमाप्नुयात् ॥ २५ ॥
इति तानन्वशाद् भ्रातृन् नित्यमेव युधिष्ठिरः ।
राजा युधिष्ठिर सदा भाइयोंको यह उपदेश देते थे कि ‘बन्धुओ! तुम ऐसा बर्ताव करो, जिससे अपने पुत्रोंसे बिछुड़े हुए इन राजा धृतराष्ट्रको किंचिन्मात्र भी दुःख न प्राप्त हो’ ॥ २५ १/२ ॥
एवं ते धर्मराजस्य श्रुत्वा वचनमर्थवत् ॥ २६ ॥