महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 245, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंशुद्ध वस्तुरूप, ५१ महान्—पूजनीय, ५२ नियमः—शौच-संतोष आदि नियमोंके पालनसे प्राप्त होने योग्य, ५३ नियमाश्रितः—नियमोंके आश्रयभूत ॥ ३६ ॥
सर्वकर्मा स्वयम्भूत आदिरादिकरो निधिः ।
सहस्राक्षो विशालाक्षः सोमो नक्षत्रसाधकः ॥ ३७ ॥
५४ सर्वकर्मा—सारा जगत् जिनका कर्म है वे, ५५ स्वयम्भूतः—नित्यसिद्ध, ५६ आदिः—सबसे प्रथम, ५७ आदिकरः—आदि पुरुष हिरण्यगर्भकी सृष्टि करनेवाले, ५८ निधिः—अक्षय ऐश्वर्यके भण्डार, ५९ सहस्राक्षः—सहस्रों नेत्रवाले, ६० विशालाक्षः—विशाल नेत्रवाले, ६१ सोमः—चन्द्रस्वरूप, ६२ नक्षत्रसाधकः—नक्षत्रोंके साधक ॥ ३७ ॥
चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्ग्रहो ग्रहपतिर्वरः ।
अत्रिरत्र्या नमस्कर्ता मृगबाणार्पणोऽनघः ॥ ३८ ॥
६३ चन्द्रः—चन्द्रमारूपसे आह्लादकारी, ६४ सूर्यः—सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत सूर्य, ६५ शनिः—, ६६ केतुः—, ६७ ग्रहः—चन्द्रमा और सूर्यपर ग्रहण लगानेवाला राहु, ६८ ग्रहपतिः—ग्रहोंके पालक, ६९ वरः—वरणीय, ७० अत्रिः—अत्रि ऋषिस्वरूप, ७१ अत्र्या नमस्कर्ता—अत्रिपत्नी अनसूयाको दुर्वासारूपसे नमस्कार करनेवाले, ७२ मृगबाणार्पणः—मृगरूपधारी यज्ञपर बाण चलानेवाले, ७३ अनघः—पापरहित ॥ ३८ ॥
महातपा घोरतपा अदीनो दीनसाधकः ।
संवत्सरकरो मन्त्रः प्रमाणं परमं तपः ॥ ३९ ॥
७४ महातपाः—महान् तपस्वी, ७५ घोरतपाः—भयंकर तपस्या करनेवाले, ७६ अदीनः—उदार, ७७ दीनसाधकः—शरणमें आये हुए दीन-दुखियोंका मनोरथ सिद्ध करनेवाले, ७८ संवत्सरकरः—संवत्सरका निर्माता, ७९ मन्त्रः—प्रणव आदि मन्त्ररूप, ८० प्रमाणम्—प्रमाणस्वरूप, ८१ परमं तपः—उत्कृष्ट तपःस्वरूप ॥ ३९ ॥
योगी योज्यो महाबीजो महारेता महाबलः ।
सुवर्णरेताः सर्वज्ञः सुबीजो बीजवाहनः ॥ ४० ॥
८२ योगी—योगनिष्ठ, ८३ योज्यः—मनोयोगके आश्रय, ८४ महाबीजः—महान् कारणरूप, ८५ महारेताः—महावीर्यशाली, ८६ महाबलः—महान् शक्तिसे सम्पन्न, ८७ सुवर्णरेताः—अग्निरूप, ८८ सर्वज्ञः—सब कुछ जाननेवाले, ८९ सुबीजः—उत्तम बीजरूप, ९० बीजवाहनः—जीवोंके संस्काररूप बीजको वहन करनेवाले ॥ ४० ॥
दशबाहुस्त्वनिमिषो नीलकण्ठ उमापतिः ।
विश्वरूपः स्वयं श्रेष्ठो बलवीरोऽबलो गणः ॥ ४१ ॥
९१ दशबाहुः—दस भुजाओंसे युक्त, ९२ अनिमिषः—कभी पलक न गिरानेवाले, ९३ नीलकण्ठः—जगत्की रक्षाके लिये हालाहल विषका पान करके उसके नील चिह्नको कण्ठमें धारण करनेवाले, ९४ उमापतिः—गिरिराजकुमारी उमाके पतिदेव, ९५ विश्वरूपः