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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 246

—जगतस्वरूप, ९६ स्वयं श्रेष्ठः—स्वतःसिद्ध श्रेष्ठतासे सम्पन्न, ९७ बलवीरः—बलके द्वारा वीरता प्रकट करनेवाले, ९८ अबलो गणः—निर्बल समुदायस्वरूप ।। ४१ ।।

गणकर्ता गणपतिर्दिग्वासाः काम एव च ।
मन्त्रवित् परमो मन्त्रः सर्वभावकरो हरः ।। ४२ ।।

९९ गणकर्ता—अपने पार्षदगणोंका संघटन करनेवाले, १०० गणपतिः—प्रमथगणोंके स्वामी, १०१ दिग्वासाः—दिगम्बर, १०२ कामः—कमनीय, १०३ मन्त्रवित्—मन्त्रवेत्ता, १०४ परमो मन्त्रः—उत्कृष्ट मन्त्ररूप, १०५ सर्वभावकरः—समस्त पदार्थोंकी सृष्टि करनेवाले, १०६ हरः—दुःख हरण करनेवाले ।। ४२ ।।

कमण्डलुधरो धन्वी बाणहस्तः कपालवान् ।
अशनी शतघ्नी खड्गी पट्टिशी चायुधी महान् ।। ४३ ।।

१०७ कमण्डलुधरः—एक हाथमें कमण्डलु धारण करनेवाले, १०८ धन्वी—दूसरे हाथमें धनुष धारण करनेवाले, १०९ बाणहस्तः—तीसरे हाथमें बाण लिये रहनेवाले, ११० कपालवान्—चौथे हाथमें कपालधारी, १११ अशनी—पाँचवें हाथमें वज्र धारण करनेवाले, ११२ शतघ्नी—छठे हाथमें शतघ्नी रखनेवाले, ११३ खड्गी—सातवेंमें खड्गधारी, ११४ पट्टिशी—आठवेंमें पट्टिश धारण करनेवाले, ११५ आयुधी—नवें हाथमें अपने सामान्य आयुध त्रिशूलको लिये रहनेवाले, ११६ महान्—सर्वश्रेष्ठ ।। ४३ ।।

सुवहस्तः सुरूपश्च तेजस्तेजस्करो निधिः ।
उष्णीषी च सुवक्त्रश्च उदग्रो विनतस्तथा ।। ४४ ।।

११७ सुवहस्तः—दसवें हाथमें सुवा धारण करनेवाले, ११८ सुरूपः—सुन्दर रूपवाले, ११९ तेजः—तेजस्वी, १२० तेजस्करो निधिः—भक्तोंके तेजकी वृद्धि करनेवाले निधिरूप, १२१ उष्णीषी—सिरपर साफा धारण करनेवाले, १२२ सुवक्त्रः—सुन्दर मुखवाले, १२३ उदग्रः—ओजस्वी, १२४ विनतः—विनयशील ।। ४४ ।।

दीर्घश्च हरिकेशश्च सुतीर्थः कृष्ण एव च ।
शृगालरूपः सिद्धार्थो मुण्डः सर्वशुभङ्करः ।। ४५ ।।

१२५ दीर्घः—ऊँचे कदवाले, १२६ हरिकेशः—ब्रह्मा, विष्णु, महेशस्वरूप, १२७ सुतीर्थः—उत्तम तीर्थस्वरूप, १२८ कृष्णः—सच्चिदानन्दस्वरूप, १२९ शृगालरूपः—सियारका रूप धारण करनेवाले, १३० सिद्धार्थः—जिनके सभी प्रयोजन सिद्ध हैं, १३१ मुण्डः—मूँड़ मुड़ाये हुए, भिक्षुस्वरूप, १३२ सर्वशुभंकरः—समस्त प्राणियोंका हित करनेवाले ।। ४५ ।।

अजश्च बहुरूपश्च गन्धधारी कपर्द्यपि ।
ऊर्ध्वरेता ऊर्ध्वलिङ्ग ऊर्ध्वशायी नभःस्थलः ।। ४६ ।।

१३३ अजः—अजन्मा, १३४ बहुरूपः—बहुत-से रूप धारण करनेवाले, १३५ गन्धधारी—कुंकुम और कस्तूरी आदि सुगन्धित पदार्थ धारण करनेवाले, १३६ कपर्दी