भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 250

—बलका संचार करनेवाले, २५५ महीचारी—सारी पृथ्वीपर विचरनेवाले, २५६ स्रुतः—सर्वत्र पहुँचे हुए ।। ६० ।।

सर्वतूर्यनिनादी च सर्वातोद्यपरिग्रहः ।
व्यालरूपो गुहावासी गुहो माली तरङ्गवित् ॥ ६१ ॥
२५७ सर्वतूर्यनिनादी—सब प्रकारके बाजे बजानेवाले, २५८ सर्वातोद्यपरिग्रहः—सम्पूर्ण वाद्योंका संग्रह करनेवाले, २५९ व्यालरूपः—शेषनागस्वरूप, २६० गुहावासी—सबकी हृदयगुफामें निवास करनेवाले, २६१ गुहः—कार्तिकेयस्वरूप, २६२ माली—मालाधारी, २६३ तरङ्गवित्—क्षुधा-पिपासा आदि छहों ऊर्मियोंके ज्ञाता साक्षी ।। ६१ ।।

त्रिदशस्त्रिकालधृक् कर्मसर्वबन्धविमोचनः ।
बन्धनस्त्वसुरेन्द्राणां युधि शत्रुविनाशनः ॥ ६२ ॥
२६४ त्रिदशः—प्राणियोंकी तीन दशाओं—जन्म, स्थिति और विनाशके हेतुभूत, २६५ त्रिकालधृक्—भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंको धारण करनेवाले, २६६ कर्मसर्वबन्धविमोचनः—कर्मोंके समस्त बन्धनोंको काटनेवाले, २६७ असुरेन्द्राणां बन्धनः—बलि आदि असुरपतियोंको बाँध लेनेवाले, २६८ युधिशत्रुविनाशनः—युद्धमें शत्रुओंका विनाश करनेवाले ।। ६२ ।।

सांख्यप्रसादो दुर्वासाः सर्वसाधुनिषेवितः ।
प्रस्कन्दनो विभागज्ञोऽतुल्यो यज्ञविभागवित् ॥ ६३ ॥
२६९ सांख्यप्रसादः—आत्मा और अनात्माके विवेकरूप सांख्यज्ञानसे प्रसन्न होनेवाले, २७० दुर्वासाः—अत्रि और अनसूयाके पुत्र रुद्रावतार दुर्वासा मुनि, २७१ सर्वसाधुनिषेवितः—समस्त साधुपुरुषोंद्वारा सेवित, २७२ प्रस्कन्दनः—ब्रह्मादिको भी स्थानभ्रष्ट करनेवाले, २७३ विभागज्ञः—प्राणियोंके कर्म और फलोंके विभागको यथोचितरूपसे जाननेवाले, २७४ अतुल्यः—तुलनारहित, २७५ यज्ञविभागवित्—यज्ञसम्बन्धी हविष्यके विभिन्न भागोंका ज्ञान रखनेवाले ।। ६३ ।।

सर्ववासः सर्वचारी दुर्वासा वासवोऽमरः ।
हैमो हेमकरोऽयज्ञः सर्वधारी धरोत्तमः ॥ ६४ ॥
२७६ सर्ववासः—सर्वत्र निवास करनेवाले, २७७ सर्वचारी—सर्वत्र विचरनेवाले, २७८ दुर्वासाः—अनन्त और अपार होनेके कारण जिनको वस्त्रसे आच्छादित करना दुर्लभ है, २७९ वासवः—इन्द्रस्वरूप, २८० अमरः—अविनाशी, २८१ हैमः—हिमसमूह—हिमालयस्वरूप, २८२ हेमकरः—सुवर्णके उत्पादक, २८३ अयज्ञः—कर्मरहित, २८४ सर्वधारी—सबको धारण करनेवाले, २८५ धरोत्तमः—धारण करनेवालोंमें सबसे उत्तम—अखिल ब्रह्माण्डको धारण करनेवाले ।। ६४ ।।

लोहिताक्षो महाक्षश्च विजयाक्षो विशारदः ।
संग्रहो निग्रहः कर्ता सर्पचीरनिवासनः ॥ ६५ ॥