महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८६ लोहिताक्षः—रक्तनेत्र, २८७ महाक्षः—बड़े नेत्रवाले, २८८ विजयाक्षः—विजयशील रथवाले, २८९ विशारदः—विद्वान्, २९० संग्रहः—संग्रह करनेवाले, २९१ निग्रहः—उद्दण्डोंको दण्ड देनेवाले, २९२ कर्ता—सबके उत्पादक, २९३ सर्पचीर-निवासनः—सर्पमय चीर धारण करनेवाले ।। ६५ ।।
मुख्योऽमुख्यश्च देहश्च काहलिः सर्वकामदः ।
सर्वकालप्रसादश्च सुबलो बलरूपधृक् ।। ६६ ।।
सर्वकामवरश्चैव सर्वदः सर्वतोमुखः ।
आकाशनिर्विरूपश्च निपाती ह्यवशः खगः ।। ६७ ।।
२९४ मुख्यः—सर्वश्रेष्ठ, २९५ अमुख्यः—जिससे बढ़कर मुख्य दूसरा कोई न हो वह, २९६ देहः—देहस्वरूप, २९७ काहलिः—काहल नामक वाद्यविशेषको बजानेवाले, २९८ सर्वकामदः—सम्पूर्ण कामनाओंके दाता, २९९ सर्वकालप्रसादः—सर्वदा कृपा करनेवाले, ३०० सुबलः—उत्तम बलसे सम्पन्न, ३०१ बलरूपधृक्—बल और रूपके आधार, ३०२ सर्वकामवरः—सम्पूर्ण कमनीय पदार्थोंमें श्रेष्ठ—मोक्षस्वरूप, ३०३ सर्वदः—सब कुछ देनेवाले, ३०४ सर्वतोमुखः—सब ओर मुखवाले, ३०५ आकाशनिर्विरूपः—आकाशकी भाँति जिनसे नाना प्रकारके रूप प्रकट होते हैं वे, ३०६ निपाती—पापियोंको नरकमें गिरानेवाले, ३०७ अवशः—जिनके ऊपर किसीका वश नहीं चलता वे, ३०८ खगः—आकाशगामी ।। ६६-६७ ।।
रौद्ररूपोंऽशुरादित्यो बहुरश्मिः सुवर्चसी ।
वसुवेगो महावेगो मनोवेगो निशाचरः ।। ६८ ।।
३०९ रौद्ररूपः—भयंकर रूपधारी, ३१० अंशुः—किरणस्वरूप, ३११ आदित्यः—अदितिपुत्र, ३१२ बहुरश्मिः—असंख्य किरणोंवाले, सूर्यरूप, ३१३ सुवर्चसी—उत्तम तेजसे सम्पन्न, ३१४ वसुवेगः—वायुके समान वेगवाले, ३१५ महावेगः—वायुसे भी अधिक वेगशाली, ३१६ मनोवेगः—मनके समान वेगवाले, ३१७ निशाचरः—रात्रिमें विचरनेवाले ।। ६८ ।।
सर्ववासी श्रियावासी उपदेशकरोऽकरः ।
मुनिरात्मनिरालोकः सम्भग्नश्च सहस्रदः ।। ६९ ।।
३१८ सर्ववासी—सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मरूपसे निवास करनेवाले, ३१९ श्रियावासी—लक्ष्मीके साथ निवास करनेवाले विष्णुरूप, ३२० उपदेशकरः—जिज्ञासुओंको तत्त्वका और काशीमें मरे हुए जीवोंको तारकमन्त्रका उपदेश करनेवाले, ३२१ अकरः—कर्तृत्वके अभिमानसे रहित, ३२२ मुनिः—मननशील, ३२३ आत्मनिरालोकः—देह आदिकी उपाधिसे अलग होकर आलोचना करनेवाले, ३२४ सम्भग्नः—सम्यक् रूपसे सेवित, ३२५ सहस्रदः—हजारोंका दान करनेवाले ।। ६९ ।।
पक्षी च पक्षरूपश्च अतिदीप्तो विशाम्पतिः ।