भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 252

उन्मादो मदनः कामो ह्यश्वत्थोऽर्थकरो यशः ॥ ७० ॥ ३२६ पक्षी—गरुड़रूपधारी, ३२७ पक्षरूपः—शुक्लपक्षस्वरूप, ३२८ अतिदीप्तः—अत्यन्त तेजस्वी, ३२९ विशाम्पतिः—प्रजाओंके स्वामी, ३३० उन्मादः—प्रेममें उन्मत्त, ३३१ मदनः—कामदेवरूप, ३३२ कामः—कमनीय विषय, ३३३ अश्वत्थः—संसार-वृक्षरूप, ३३४ अर्थकरः—धन आदि देनेवाले, ३३५ यशः—यशस्वरूप ॥ ७० ॥

वामदेवश्च वामश्च प्राग् दक्षिणश्च वामनः । सिद्धयोगी महर्षिश्च सिद्धार्थः सिद्धसाधकः ॥ ७१ ॥ ३३६ वामदेवः—वामदेव ऋषिस्वरूप, ३३७ वामः—पापियोंके प्रतिकूल, ३३८ प्राक्—सबके आदि, ३३९ दक्षिणः—कुशल, ३४० वामनः—बलिको बाँधनेवाले वामन रूपधारी, ३४१ सिद्धयोगी—सनत्कुमार आदि सिद्ध महात्मा, ३४२ महर्षिः—वसिष्ठ आदि, ३४३ सिद्धार्थः—आप्तकाम, ३४४ सिद्धसाधकः—सिद्ध और साधकरूप ॥ ७१ ॥

भिक्षुश्च भिक्षुरूपश्च विपणो मृदुरव्ययः । महासेनो विशाखश्च षष्टिभागो गवां पतिः ॥ ७२ ॥ ३४५ भिक्षुः—संन्यासी, ३४६ भिक्षुरूपः—श्रीराम-कृष्ण आदिकी बालछविका दर्शन करनेके लिये भिक्षुरूप धारण करनेवाले, ३४७ विपणः—व्यवहारसे अतीत, ३४८ मृदुः—कोमल स्वभाववाले, ३४९ अव्ययः—अविनाशी, ३५० महासेनः—देव-सेनापति कार्तिकेयरूप, ३५१ विशाखः—कार्तिकेयके सहायक, ३५२ षष्टिभागः—प्रभव आदि साठ भागोंमें विभक्त संवत्सररूप, ३५३ गवाम्पतिः—इन्द्रियोंके स्वामी ॥ ७२ ॥

वज्रहस्तश्च विष्कम्भी चमूस्तम्भन एव च । वृत्तावृत्तकरस्तालो मधुर्मधुकलोचनः ॥ ७३ ॥ ३५४ वज्रहस्तः—हाथमें वज्र धारण करनेवाले इन्द्ररूप, ३५५ विष्कम्भी—विस्तारयुक्त, ३५६ चमूस्तम्भनः—दैत्यसेनाको स्तब्ध करनेवाले, ३५७ वृत्तावृत्तकरः—युद्धमें रथके द्वारा मण्डल बनाना वृत्त कहलाता है और शत्रुसेनाको विदीर्ण करके अक्षत शरीरसे लौट आना आवृत्त कहलाता है। इन दोनोंको कुशलतापूर्वक करनेवाले, ३५८ तालः—संसारसागरके तल प्रदेश—आधार-स्थान अर्थात् शुद्ध ब्रह्मको जाननेवाले, ३५९ मधुः—वसन्त ऋतुरूप, ३६० मधुकलोचनः—मधुके समान पिंगल नेत्रवाले ॥ ७३ ॥

वाचस्पत्यो वाजसनो नित्यमाश्रमपूजितः । ब्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी विचारवित् ॥ ७४ ॥ ३६१ वाचस्पत्यः—पुरोहितका काम करनेवाले, ३६२ वाजसनः—शुक्ल यजुर्वेदकी माध्यन्दिनी शाखाके प्रवर्तक, ३६३ नित्यमाश्रमपूजितः—सदा आश्रमोंद्वारा पूजित होनेवाले, ३६४ ब्रह्मचारी—ब्रह्मनिष्ठ, ३६५ लोकचारी—सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले, ३६६ सर्वचारी—सर्वत्र गमन करनेवाले, ३६७ विचारवित्—विचारोंके ज्ञाता ॥ ७४ ॥

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 252, कुल 2566 में से · BharatKosha