भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 253

ईशान ईश्वरः कालो निशाचारी पिनाकवान् । निमित्तस्थो निमित्तं च नन्दिर्नन्दिकरो हरिः ॥ ७५ ॥ ३६८ ईशानः—नियन्ता, ३६९ ईश्वरः—सबके शासक, ३७० कालः—कालस्वरूप, ३७१ निशाचारी—प्रलयकालकी रातमें विचरनेवाले, ३७२ पिनाकवान्—पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, ३७३ निमित्तस्थः—अन्तर्यामी, ३७४ निमित्तम्—निमित्त कारणरूप, ३७५ नन्दिः—ज्ञानसम्पत्तिरूप, ३७६ नन्दिकरः—ज्ञानरूपसम्पत्ति देनेवाले, ३७७ हरिः—विष्णुस्वरूप ॥

नन्दीश्वरश्च नन्दी च नन्दनो नन्दिवर्द्धनः । भगहारी निहन्ता च कालो ब्रह्मा पितामहः ॥ ७६ ॥ ३७८ नन्दीश्वरः—नन्दी नामक पार्षदके स्वामी, ३७९ नन्दी—नन्दी नामक गणरूप, ३८० नन्दनः—परम आनन्द प्रदान करनेवाले, ३८१ नन्दिवर्द्धनः—समृद्धि बढ़ानेवाले, ३८२ भगहारी—ऐश्वर्यका अपहरण करनेवाले, ३८३ निहन्ता—मृत्युरूपसे सबको मारनेवाले, ३८४ कालः—चौंसठ कलाओंके निवासस्थान, ३८५ ब्रह्मा—लोकस्रष्टा ब्रह्मा, ३८६ पितामहः—प्रजापतिके भी पिता ॥ ७६ ॥

चतुर्मुखो महालिङ्गश्चारुलिङ्गस्तथैव च । लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो योगाध्यक्षो युगावहः ॥ ७७ ॥ ३८७ चतुर्मुखः—चार मुखवाले, ३८८ महालिङ्गः—महालिङ्गस्वरूप, ३८९ चारुलिङ्गः—रमणीय वेषधारी, ३९० लिङ्गाध्यक्षः—प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंके अध्यक्ष, ३९१ सुराध्यक्षः—देवताओंके अधिपति, ३९२ योगाध्यक्षः—योगके अध्यक्ष, ३९३ युगावहः—चारों युगोंके निर्वाहक ॥ ७७ ॥

बीजाध्यक्षो बीजकर्ता अध्यात्मानुगतो बलः । इतिहासः सकल्पश्च गौतमोऽथ निशाकरः ॥ ७८ ॥ ३९४ बीजाध्यक्षः—कारणोंके अध्यक्ष, ३९५ बीजकर्ता—कारणोंके उत्पादक, ३९६ अध्यात्मानुगतः—अध्यात्मशास्त्रका अनुसरण करनेवाले, ३९७ बलः—बलवान्, ३९८ इतिहासः—महाभारत आदि इतिहासरूप, ३९९ सकल्पः—कल्प—यज्ञोंके प्रयोग और विधिके विचारके साथ मीमांसा और न्यायका समूह, ४०० गौतमः—तर्कशास्त्रके प्रणेता मुनिस्वरूप, ४०१ निशाकरः—चन्द्रमारूप ॥ ७८ ॥

दम्भो ह्यदम्भो वैदम्भो वश्यो वशकरः कलिः । लोककर्ता पशुपतिर्महाकर्ता ह्यनौषधः ॥ ७९ ॥ ४०२ दम्भः—शत्रुओंका दमन करनेवाले, ४०३ अदम्भः—दम्भरहित, ४०४ वैदम्भः—दम्भरहित पुरुषोंके आत्मीय, ४०५ वश्यः—भक्तपराधीन, ४०६ वशकरः—दूसरोंको वशमें करनेकी शक्ति रखनेवाले, ४०७ कलिः—कलि नामक युग, ४०८ लोककर्ता—जगत्की सृष्टि करनेवाले, ४०९ पशुपतिः—पशुओं—जीवोंके स्वामी, ४१० महाकर्ता—