भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

४८६ महानखः—बड़े-बड़े नखवाले नृसिंह, ४८७ महारोमा—विशाल रोमवाले वराहरूप, ४८८ महाकोशः—बहुत बड़े पेटवाले, ४८९ महाजटः—बड़ी-बड़ी जटावाले, ४९० प्रसन्नः—आनन्दमग्न, ४९१ प्रसादः—प्रसन्नताकी मूर्ति, ४९२ प्रत्ययः—ज्ञानस्वरूप, ४९३ गिरिसाधनः—पर्वतको युद्धका साधन बनानेवाले ॥ ८९ ॥ स्नेहनोऽस्नेहनश्चैव अजितश्च महामुनिः । वृक्षाकारो वृक्षकेतुरनलो वायुवाहनः ॥ ९० ॥ ४९४ स्नेहनः—प्रजाओंके प्रति पिताकी भाँति स्नेह रखनेवाले, ४९५ अस्नेहनः—आसक्तिसे रहित, ४९६ अजितः—किसीसे पराजित न होनेवाले, ४९७ महामुनिः—अत्यन्त मननशील, ४९८ वृक्षाकारः—संसारवृक्षस्वरूप, ४९९ वृक्षकेतुः—वृक्षके समान ऊँची ध्वजावाले, ५०० अनलः—अग्निस्वरूप, ५०१ वायुवाहनः—वायुका वाहनके रूपमें उपयोग करनेवाले ॥ ९० ॥ गण्डली मेरुधामा च देवाधिपतिरेव च । अथर्वशीर्षः सामास्य ऋक्सहस्रामितेक्षणः ॥ ९१ ॥ ५०२ गण्डली—पहाड़ोंकी गुफाओंमें छिपकर रहनेवाले, ५०३ मेरुधामा—मेरु-पर्वतको अपना निवासस्थान बनानेवाले, ५०४ देवाधिपतिः—देवताओंके स्वामी, ५०५ अथर्वशीर्षः—अथर्ववेद जिनका मस्तक है वे, ५०६ सामास्यः—सामवेद जिनका मुख है वे, ५०७ ऋक्सहस्रामितेक्षणः—सहस्रों ऋचाएँ जिनके नेत्र हैं ॥ ९१ ॥ यजुःपादभुजो गुह्यः प्रकाशो जङ्गमस्तथा । अमोघार्थः प्रसादश्च अभिगम्यः सुदर्शनः ॥ ९२ ॥ ५०८ यजुःपादभुजः—यजुर्वेद जिनके हाथ-पैर हैं, ५०९ गुह्यः—गोपनीयस्वरूप, ५१० प्रकाशः—भक्तोंपर कृपा करके स्वयं ही उनके समक्ष अपनेको प्रकाशित कर देनेवाले, ५११ जङ्गमः—चलने-फिरनेवाले, ५१२ अमोघार्थः—किसी वस्तुके लिये याचना करनेपर उसे अवश्य सफल बनानेवाले, ५१३ प्रसादः—दया करके शीघ्र प्रसन्न होनेवाले, ५१४ अभिगम्यः—सुगमतासे प्राप्त होने योग्य, ५१५ सुदर्शनः—सुन्दर दर्शनवाले ॥ ९२ ॥ उपकारः प्रियः सर्वः कनकः काञ्चनच्छविः । नाभिर्नन्दिकरो भावः पुष्करस्थपतिः स्थिरः ॥ ९३ ॥ ५१६ उपकारः—उपकार करनेवाले, ५१७ प्रियः—भक्तोंके प्रेमास्पद, ५१८ सर्वः—सर्वस्वरूप, ५१९ कनकः—सुवर्णस्वरूप, ५२० काञ्चनच्छविः—काञ्चनके समान कमनीय कान्तिवाले, ५२१ नाभिः—समस्त भुवनका मध्यदेशरूप, ५२२ नन्दिकरः—आनन्द देनेवाले, ५२३ भावः—श्रद्धा-भक्तिस्वरूप, ५२४ पुष्करस्थपतिः—ब्रह्माण्डरूपी पुष्करका निर्माण करनेवाले, ५२५ स्थिरः—स्थिरस्वरूप ॥ द्वादशस्त्रासनश्चाद्यो यज्ञो यज्ञसमाहितः ।