महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनक्तं कलिश्च कालश्च मकरः कालपूजितः ॥ ९४ ॥ ५२६ द्वादशः—ग्यारह रुद्रोंसे श्रेष्ठ बारहवें रुद्र, ५२७ त्रासनः—संहारकारी होनेके कारण भयानक, ५२८ आद्यः—सबके आदि कारण, ५२९ यज्ञः—यज्ञपुरुष, ५३० यज्ञसमाहितः—यज्ञमें उपस्थित रहनेवाले, ५३१ नक्तम्—प्रलयकालकी रात्रिस্বরূপ, ५३२ कलिः—कलिके स्वरूप, ५३३ कालः—सबको अपना ग्रास बनानेवाले कालरूप, ५३४ मकरः—मकराकार शिशुमार चक्र, ५३५ कालपूजितः—काल अर्थात् मृत्युके द्वारा पूजित ॥ ९४ ॥
सगणो गणकारश्च भूतवाहनसारथिः । भस्मशयो भस्मगोप्ता भस्मभूतस्तरूर्गणः ॥ ९५ ॥ ५३६ सगणः—प्रमथ आदि गणोंसे युक्त, ५३७ गणकारः—बाणासुर आदि भक्तोंको अपने गणमें सम्मिलित करनेवाले, ५३८ भूतवाहनसारथिः—त्रिपुर-विनाशके लिये समस्त प्राणियोंके योगक्षेमका निर्वाह करनेवाले ब्रह्माजीको सारथि बनानेवाले, ५३९ भस्मशयः—भस्मपर शयन करनेवाले, ५४० भस्मगोप्ता—भस्मद्वारा रक्षा करनेवाले, ५४१ भस्मभूतः—भस्मस्वरूप, ५४२ तरुः—कल्पवृक्षस्वरूप, ५४३ गणः—भृंगिरिटि और नन्दिकेश्वर आदि पार्षदरूप ॥ ९५ ॥
लोकपालस्तथालोको महात्मा सर्वपूजितः । शुक्लस्त्रिशुक्लः सम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः ॥ ९६ ॥ ५४४ लोकपालः—चतुर्दश भुवनोंका पालन करनेवाले, ५४५ अलोकः—लोकातीत, ५४६ महात्मा—, ५४७ सर्वपूजितः—सबके द्वारा पूजित, ५४८ शुक्लः—शुद्धस्वरूप, ५४९ त्रिशुक्लः—मन, वाणी और शरीर ये तीनों, ५५० सम्पन्नः—सम्पूर्ण सम्पदाओंसे युक्त, ५५१ शुचिः—परम पवित्र, ५५२ भूतनिषेवितः—समस्त प्राणियोंद्वारा सेवित ॥ ९६ ॥
आश्रमस्थः क्रियावस्थो विश्वकर्ममतिर्वरः । विशालशाखस्ताम्रोष्ठो ह्यम्बुजालः सुनिश्चलः ॥ ९७ ॥ ५५३ आश्रमस्थः—चारों आश्रमोंमें धर्मरूपसे स्थित रहनेवाले, ५५४ क्रियावस्थः—यज्ञादि क्रियाओंमें संलग्न, ५५५ विश्वकर्ममतिः—संसारकी रचनारूप कर्ममें कुशल, ५५६ वरः—सर्वश्रेष्ठ, ५५७ विशालशाखः—लंबी भुजाओंवाले, ५५८ ताम्रोष्ठः—लाल-लाल ओठवाले, ५५९ अम्बुजालः—जलसमूह—सागररूप, ५६० सुनिश्चलः—सर्वथा निश्चलरूप ॥ ९७ ॥
कपिलः कपिशः शुक्ल आयुश्चैव परोऽपरः । गन्धर्वो ह्यदितिस्तार्क्ष्यः सुविज्ञेयः सुशारदः ॥ ९८ ॥ ५६१ कपिलः—कपिल वर्ण, ५६२ कपिशः—पीले वर्णवाले, ५६३ शुक्लः—श्वेत वर्णवाले, ५६४ आयुः—जीवनरूप, ५६५ परः—प्राचीन, ५६६ अपरः—अर्वाचीन, ५६७