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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 261

तारनेवाले, ६८६ सारङ्गः—चातकस्वरूप, ६८७ नवचक्राङ्गः—नूतन हंसरूप, ६८८ केतुमाली—ध्वजा-पताकाओंकी मालाओंसे अलंकृत, ६८९ सभावानः—धर्मस्थानकी रक्षा करनेवाले ।।

भूतालयो भूतपतिरहोरात्रमनिन्दितः ।। ११३ ।।

६९० भूतालयः—सम्पूर्ण भूतोंके घर, ६९१ भूतपतिः—सम्पूर्ण प्राणियोंके स्वामी, ६९२ अहोरात्रम्—दिन-रात्रिस্বরূপ, ६९३ अनिन्दितः—निन्दारहित ।। ११३ ।।

वाहिता सर्वभूतानां निलयश्च विभुर्भवः । अमोघः संयतो ह्यश्वो भोजनः प्राणधारणः ।। ११४ ।।

६९४ सर्वभूतानां वाहिता—सम्पूर्ण भूतोंका भार वहन करनेवाले, ६९५ सर्वभूतानां निलयः—समस्त प्राणियोंके निवासस्थान, ६९६ विभुः—सर्वव्यापी, ६९७ भवः—सत्तारूप, ६९८ अमोघः—कभी असफल न होनेवाले, ६९९ संयतः—संयमशील, ७०० अश्वः—उच्चैःश्रवा आदि उत्तम अश्वरूप, ७०१ भोजनः—अन्नदाता, ७०२ प्राणधारणः—सबके प्राणोंकी रक्षा करनेवाले ।। ११४ ।।

धृतिमान् मतिमान् दक्षः सत्कृतश्च युगाधिपः । गोपालिर्गोपतिर्ग्रामो गोचर्मवसनो हरिः ।। ११५ ।।

७०३ धृतिमान्—धैर्यशाली, ७०४ मतिमान्—बुद्धिमान्, ७०५ दक्षः—चतुर, ७०६ सत्कृतः—सबके द्वारा सम्मानित, ७०७ युगाधिपः—युगके स्वामी, ७०८ गोपालिः—इन्द्रियोंके पालक, ७०९ गोपतिः—गौओंके स्वामी, ७१० ग्रामः—समूहरूप, ७११ गोचर्मवसनः—गोचर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले, ७१२ हरिः—भक्तोंका दुःख हर लेनेवाले ।। ११५ ।।

हिरण्यबाहुश्च तथा गुहापालः प्रवेशिनाम् । प्रकृष्टारिर्महाहर्षो जितकामो जितेन्द्रियः ।। ११६ ।।

७१३ हिरण्यबाहुः—सुनहरी कान्तिवाली सुन्दर भुजाओंसे सुशोभित, ७१४ गुहापालः प्रवेशिनाम्—गुफाके भीतर प्रवेश करनेवाले योगियोंकी गुफाके रक्षक, ७१५ प्रकृष्टारिः—काम, क्रोध आदि शत्रुओंको क्षीण कर देनेवाले, ७१६ महाहर्षः—परमानन्दस्वरूप, ७१७ जितकामः—कामविजयी, ७१८ जितेन्द्रियः—इन्द्रियविजयी ।। ११६ ।।

गान्धारश्च सुवासश्च तपःसक्तो रतिर्नरः । महागीतो महानृत्यो ह्यप्सरोगणसेवितः ।। ११७ ।।

७१९ गान्धारः—गान्धार नामक स्वररूप, ७२० सुवासः—कैलास नामक सुन्दर स्थानमें वास करनेवाले, ७२१ तपःसक्तः—तपस्यामें संलग्न, ७२२ रतिः—प्रीतिरूप, ७२३ नरः—विराट् पुरुष, ७२४ महागीतः—जिनके माहात्म्यका वेद-शास्त्रोंद्वारा गान किया गया है ऐसे महान् देव, ७२५ महानृत्यः—प्रकाण्ड ताण्डव करनेवाले, ७२६ अप्सरोगणसेवितः—अप्सराओंके समुदायसे सेवित ।। ११७ ।।