भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 262

महाकेतुर्महाधातुर्नैकसानुचरश्चलः । आवेदनीय आदेशः सर्वगन्धसुखावहः ॥ ११८ ॥ ७२७ महाकेतुः—धर्मरूप महान् ध्वजावाले, ७२८ महाधातुः—सुवर्णस्वरूप, ७२९ नैकसानुचरः—मेरुगिरिके अनेक शिखरोंपर विचरण करनेवाले, ७३० चलः—किसीकी पकड़में नहीं आनेवाले, ७३१ आवेदनीयः—प्रार्थना करनेयोग्य, ७३२ आदेशः—आज्ञा प्रदान करनेवाले, ७३३ सर्वगन्धसुखावहः—सम्पूर्ण गन्धादि विषयोंके सुखकी प्राप्ति करानेवाले ॥

तोरणस्तारणो वातः परिधी पतिकेचरः । संयोगो वर्धनो वृद्धो अतिवृद्धो गुणाधिकः ॥ ११९ ॥ ७३४ तोरणः—मुक्तिद्वारस्वरूप, ७३५ तारणः—तारनेवाले, ७३६ वातः—वायुरूप, ७३७ परिधीः—ब्रह्माण्डका घेरारूप, ७३८ पतिकेचरः—आकाशचारीका स्वामी, ७३९ वर्धनः संयोगः—वृद्धिका हेतुभूत स्त्री-पुरुषका संयोग, ७४० वृद्धः—गुणोंमें बढ़ा-चढ़ा, ७४१ अतिवृद्धः—सबसे पुरातन होनेके कारण अतिवृद्ध, ७४२ गुणाधिकः—ज्ञान-ऐश्वर्य आदि गुणोंके द्वारा सबसे अधिकतर ॥ ११९ ॥

नित्य आत्मसहायश्च देवासुरपतिः पतिः । युक्तश्च युक्तबाहुश्च देवो दिविसुपर्वणः ॥ १२० ॥ ७४३ नित्य आत्मसहायः—आत्माकी सदा सहायता करनेवाले, ७४४ देवासुरपतिः—देवताओं और असुरोंके स्वामी, ७४५ पतिः—सबके स्वामी, ७४६ युक्तः—भक्तोंके उद्धारके लिये सदा उद्यत रहनेवाले, ७४७ युक्तबाहुः—सबकी रक्षाके लिये उपयुक्त भुजाओंवाले, ७४८ देवो दिविसुपर्वणः—स्वर्गमें जो महान् देवता इन्द्र हैं, उनके भी आराध्यदेव ॥

आषाढश्च सुषाढश्च ध्रुवोऽथ हरिणो हरः । वपुरावर्तमानेभ्यो वसुश्रेष्ठो महापथः ॥ १२१ ॥ ७४९ आषाढः—भक्तोंको सब कुछ सहन करनेकी शक्ति देनेवाले, ७५० सुषाढः—उत्तम सहनशील, ७५१ ध्रुवः—अविचलस्वरूप, ७५२ हरिणः—शुद्धस्वरूप, ७५३ हरः—पापहारी, ७५४ आवर्तमानेभ्यो वपुः—स्वर्गलोकसे लौटनेवालेको नूतन शरीर देनेवाले, ७५५ वसुश्रेष्ठः—श्रेष्ठ धनस्वरूप अर्थात् मुक्तिस्वरूप, ७५६ महापथः—सर्वोत्तम मार्गस्वरूप ॥ १२१ ॥

शिरोहारी विमर्शश्च सर्वलक्षणलक्षितः । अक्षश्च रथयोगी च सर्वयोगी महाबलः ॥ १२२ ॥ ७५७ विमर्शः शिरोहारी—विवेकपूर्वक दुष्टोंका शिरश्छेद करनेवाले, ७५८ सर्वलक्षणलक्षितः—समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, ७५९ अक्षः रथयोगी—रथसे सम्बन्ध