महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 260, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें—कुरुक्षेत्रस्वरूप, ६५१ गुणौषधः—गुणोंको उत्पन्न करनेवाली ओषधिके समान ज्ञान, वैराग्य आदि गुणोंके उत्पादक ।। १०७ ।।
सर्वाशयो दर्भचारी सर्वेषां प्राणिनां पतिः ।
देवदेवः सुखासक्तः सदसत्सर्वरत्नवित् ।। १०८ ।।
६५२ सर्वाशयः—सबके आश्रय, ६५३ दर्भचारी—वेदीपर बिछे हुए—कुशोंपर रखे हुए हविष्यको भक्षण करनेवाले, ६५४ सर्वेषां प्राणिनां पतिः—समस्त प्राणियोंके स्वामी, ६५५ देवदेवः—देवताओंके भी देवता, ६५६ सुखासक्तः—अपने परमानन्दमय स्वरूपमें ही रत रहनेवाले, ६५७ सत्—सत्स्वरूप, ६५८ असत्—असत्स्वरूप, ६५९ सर्वरत्नवित्—सम्पूर्ण रत्नोंके ज्ञाता ।। १०८ ।।
कैलासगिरिवासी च हिमवद्गिरिसंश्रयः ।
कूलहारी कूलकर्ता बहुविद्यो बहुप्रदः ।। १०९ ।।
६६० कैलासगिरिवासी—कैलास पर्वतपर निवास करनेवाले, ६६१ हिमवद्गिरिसंश्रयः—हिमालयपर्वतके निवासी, ६६२ कूलहारी—प्रबल प्रवाहरूपसे नदियोंके तटोंका अपहरण करनेवाले, ६६३ कूलकर्ता—पुष्कर आदि बड़े-बड़े सरोवरोंका निर्माण करनेवाले, ६६४ बहुविद्यः—बहुत-सी विद्याओंके ज्ञाता, ६६५ बहुप्रदः—बहुत अधिक देनेवाले ।। १०९ ।।
वणिजो वर्धकी वृक्षो बकुलश्चन्दनश्छदः ।
सारग्रीवो महाजत्रुरलोलश्च महौषधः ।। ११० ।।
६६६ वणिजो—वैश्यरूप, ६६७ वर्धकी—संसाररूपी वृक्षको काटनेवाले बढ़ई, ६६८ वृक्षः—संसाररूप वृक्षस्वरूप, ६६९ बकुलः—मौलसिरी वृक्षस्वरूप, ६७० चन्दनः—चन्दन वृक्षस्वरूप, ६७१ छदः—छितवन वृक्षस्वरूप, ६७२ सारग्रीवः—सुदृढ़ कण्ठवाले, ६७३ महाजत्रुः—बहुत बड़ी हँसुलीवाले, ६७४ अलोलः—अचंचल, ६७५ महौषधः—महान् औषधस्वरूप ।। ११० ।।
सिद्धार्थकारी सिद्धार्थश्छन्दोव्याकरणोत्तरः ।
सिंहनादः सिंहदंष्ट्रः सिंहगः सिंहवाहनः ।। १११ ।।
६७६ सिद्धार्थकारी—आश्रितजनोंको सफलमनोरथ करनेवाले, ६७७ सिद्धार्थः—वेदकी व्याख्यासे निर्णीत उत्कृष्ट सिद्धान्तस्वरूप, ६७८ सिंहनादः—सिंहके समान गर्जना करनेवाले, ६७९ सिंहदंष्ट्रः—सिंहके समान दाढ़वाले, ६८० सिंहगः—सिंहपर आरूढ़ होकर चलनेवाले, ६८१ सिंहवाहनः—सिंहपर सवारी करनेवाले ।। १११ ।।
प्रभावात्मा जगत्कालस्थालो लोकहितस्तरुः ।
सारङ्गो नवचक्राङ्गः केतुमाली सभावनः ।। ११२ ।।
६८२ प्रभावात्मा—उत्कृष्ट सत्तास्वरूप, ६८३ जगत्कालस्थालः—प्रलयकालमें जगत्का संहार करनेवाले कालके स्थान, ६८४ लोकहितः—लोकहितैषी, ६८५ तरुः—