भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 801, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 801

भीष्मजी कहते हैं— राजन्! कुत्तेसहित आये हुए संन्यासीने जब उन महर्षियोंको देखा, तब उनके पास आकर संन्यासकी मर्यादाके अनुसार उनका हाथसे स्पर्श किया ॥ ६८ ॥
परिचर्यां वने तां तु क्षुत्प्रतीघातकारिकाम् ।
अन्योन्येन निवेद्याथ प्रतिष्ठन्त सहैव ते ॥ ६९ ॥
तदनन्तर वे एक दूसरेको अपना कुशल-समाचार बताते हुए बोले—‘हमलोग अपनी भूख मिटानेके लिये इस वनमें भ्रमण कर रहे हैं’ ऐसा कहकर वे साथ-ही-साथ वहाँसे चल पड़े ॥ ६९ ॥
एकनिश्चयकार्याश्च व्यचरन्त वनानि ते ।
आददानाः समुद्धृत्य मूलानि च फलानि च ॥ ७० ॥
उन सबके निश्चय और कार्य एक-से थे। वे फल-मूलका संग्रह करके उन्हें साथ लिये उस वनमें विचर रहे थे ॥ ७० ॥
कदाचिद् विचरन्तस्ते वृक्षैरविरलैर्वृताम् ।
शुचिवारिप्रसन्नोदां ददृशुः पद्मिनीं शुभाम् ॥ ७१ ॥
एक दिन घूमते-फिरते हुए उन महर्षियोंको एक सुन्दर सरोवर दिखायी पड़ा; जिसका जल बड़ा ही स्वच्छ और पवित्र था। उसके चारों किनारोंपर सघन वृक्षोंकी पंक्ति शोभा पा रही थी ॥ ७१ ॥
बालादित्यवपुःप्रख्यैः पुष्करैरुपशोभिताम् ।
वैदूर्यवर्णसदृशैः पद्मपत्रैरथावृताम् ॥ ७२ ॥
प्रातःकालीन सूर्यके समान अरुण रंगके कमलपुष्प उस सरोवरकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा वैदूर्यमणिकी-सी कान्तिवाले कमलिनीके पत्ते उसमें चारों ओर छा रहे थे ॥ ७२ ॥
नानाविधैश्च विहगैर्जलप्रकरसेविभिः ।
एकद्वारामनादेयां सूपतीर्थामकर्दमाम् ॥ ७३ ॥
नाना प्रकारके विहंगम कलरव करते हुए उसकी जलराशिका सेवन करते थे। उसमें प्रवेश करनेके लिये एक ही द्वार था। उसकी कोई वस्तु ली नहीं जा सकती थी। उसमें उतरनेके लिये बहुत सुन्दर सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। वहाँ काई और कीचड़का तो नाम भी नहीं था ॥ ७३ ॥
वृषादर्भिप्रयुक्ता तु कृत्या विकृतदर्शना ।
यातुधानीति विख्याता पद्मिनीं तामरक्षत ॥ ७४ ॥
राजा वृषादर्भिकी भेजी हुई भयानक आकारवाली यातुधानी कृत्या उस तालाबकी रक्षा कर रही थी ॥ ७४ ॥
पशुसखसहायास्तु बिसार्थं ते महर्षयः ।
पद्मिनीमभिजग्मुस्ते सर्वे कृत्याभिरक्षिताम् ॥ ७५ ॥