भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 802, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 802

पशुसखके साथ वे सभी महर्षि मृणाल लेनेके लिये उस सरोवरके तटपर गये, जो उस कृत्याके द्वारा सुरक्षित था ।। ७५ ।।
ततस्ते यातुधानीं तां दृष्ट्वा विकृतदर्शनाम् ।
स्थितां कमलिनीतीरे कृत्यामूचुर्महर्षयः ।। ७६ ।।
सरोवरके तटपर खड़ी हुई उस यातुधानी कृत्याको जो बड़ी विकराल दिखायी देती थी, देखकर वे सब महर्षि बोले— ।। ७६ ।।

एका तिष्ठसि का च त्वं कस्यार्थे किं प्रयोजनम् ।
पद्मिनीतीरमाश्रित्य ब्रूहि त्वं किं चिकीर्षसि ।। ७७ ।।
'अरी! तू कौन है और किसलिये यहाँ अकेली खड़ी है? यहाँ तेरे आनेका क्या प्रयोजन है? इस सरोवरके तटपर रहकर तू कौन-सा कार्य सिद्ध करना चाहती है?' ।। ७७ ।।

यातुधान्युवाच
यास्मि सास्म्यनुयोगो मे न कर्तव्यः कथंचन ।
आरक्षिणीं मां पद्मिन्या वित्त सर्वे तपोधनाः ।। ७८ ।।
**यातुधानी बोली—**तपस्वियो! मैं जो कोई भी होऊँ, तुम्हें मेरे विषयमें पूछ-ताछ करनेका किसी प्रकार कोई अधिकार नहीं है। तुम इतना ही जान लो कि मैं इस सरोवरका