भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 803, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 803

संरक्षण करनेवाली हूँ॥ ७८ ॥

ऋषय ऊचुः

सर्व एव क्षुधार्ताः स्म न चान्यत् किंचिदस्ति नः। भवत्याः सम्मते सर्वे गृह्णीयाम बिसान्युत ॥ ७९ ॥ **ऋषि बोले—**भद्रे! इस समय हमलोग भूखसे व्याकुल हैं और हमारे पास खानेके लिये दूसरी कोई वस्तु नहीं है। अतः यदि तुम अनुमति दो तो हम सब लोग इस सरोवरसे कुछ मृणाल ले लें॥ ७९ ॥

यातुधान्युवाच

समयेन बिसानीतो गृह्णीध्वं कामकारतः। एकैको नाम मे प्रोक्त्वा ततो गृह्णीत माचिरम्॥ ८० ॥ **यातुधानीने कहा—**ऋषियो! एक शर्तपर तुम इस सरोवरसे इच्छानुसार मृणाल ले सकते हो। एक-एक करके आओ और मुझे अपना नाम और तात्पर्य बताकर मृणाल ले लो। इसमें विलम्ब करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ ८० ॥

भीष्म उवाच

विज्ञाय यातुधानीं तां कृत्यामृषिवधैषिणीम्। अत्रिः क्षुधापरीतात्मा ततो वचनमब्रवीत् ॥ ८१ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! उसकी यह बात सुनकर महर्षि अत्रि यह समझ गये कि 'यह राक्षसी कृत्या है और हम सब ऋषियोंका वध करनेकी इच्छासे यहाँ आयी हुई है।' तथापि भूखसे व्याकुल होनेके कारण उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया॥ ८१ ॥

अत्रिरुवाच

अरात्रिरत्रिः सा रात्रिर्या नाधीते त्रिद्य वै। अरात्रिरत्रिरित्येव नाम मे विद्धि शोभने॥ ८२ ॥ **अत्रि बोले—**कल्याणी! काम आदि शत्रुओंसे त्राण करनेवालेको अरात्रि कहते हैं और अत् (मृत्यु) से बचानेवाला अत्रि कहलाता है। इस प्रकार मैं ही अरात्रि होनेके कारण अत्रि हूँ। जबतक जीवको एकमात्र परमात्माका ज्ञान नहीं होता, तबतककी अवस्था रात्रि कहलाती है। उस अज्ञानावस्थासे रहित होनेके कारण भी मैं अरात्रि एवं अत्रि कहलाता हूँ। सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अज्ञात होनेके कारण जो रात्रिके समान है, उस परमात्मतत्त्वमें मैं सदा जाग्रत् रहता हूँ; अतः वह मेरे लिये अरात्रिके समान है, इस व्युत्पत्तिका अनुसार भी मैं अरात्रि और अत्रि (ज्ञानी) नाम धारण करता हूँ। यही मेरे नामका तात्पर्य समझो॥

यातुधान्युवाच