महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 804, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महाद्युते । दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८३ ॥ **यातुधानीने कहा—**तेजस्वी महर्षे! आपने जिस प्रकार अपने नामका तात्पर्य बताया है, उसका मेरी समझमें आना कठिन है। अच्छा, अब आप जाइये और तालाबमें उतरिये ॥ ८३ ॥
वसिष्ठ उवाच वसिष्ठोऽस्मि वरिष्ठोऽस्मि वसे वासगृहेष्वपि । वसिष्ठत्वाच्च वासाच्च वसिष्ठ इति विद्धि माम् ॥ ८४ ॥ **वसिष्ठ बोले—**मेरा नाम वसिष्ठ है, सबसे श्रेष्ठ होनेके कारण लोग मुझे वरिष्ठ भी कहते हैं। मैं गृहस्थ-आश्रममें वास करता हूँ; अतः वसिष्ठता (ऐश्वर्य-सम्पत्ति) और वासके कारण तुम मुझे वसिष्ठ समझो ॥
यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते दुःख्याभाषिताक्षरम् । नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८५ ॥ **यातुधानी बोली—**मुने! आपने जो अपने नामकी व्याख्या की है उसके तो अक्षरोंका भी उच्चारण करना कठिन है। मैं इस नामको नहीं याद रख सकती। आप जाइये तालाबमें प्रवेश कीजिये ॥ ८५ ॥
कश्यप उवाच कुलं कुलं च कुवमः कुवमः कश्यपो द्विजः । काश्यः काशनिकाशत्वादेतन्मे नाम धारय ॥ ८६ ॥ **कश्यपने कहा—**यातुधानी! कश्य नाम है शरीरका, जो उसका पालन करता है उसे कश्यप कहते हैं। मैं प्रत्येक कुल (शरीर) में अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश करके उसकी रक्षा करता हूँ, इसीलिये कश्यप हूँ। कु अर्थात् पृथ्वीपर वम यानी वर्षा करनेवाला सूर्य भी मेरा ही स्वरूप है, इसलिये मुझे 'कुवम' भी कहते हैं। मेरे देहका रंग काशके फूलकी भाँति उज्ज्वल है, अतः मैं काश्य नामसे भी प्रसिद्ध हूँ। यही मेरा नाम है। इसे तुम धारण करो ॥ ८६ ॥
यातुधान्युवाच यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महाद्युते । दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८७ ॥ **यातुधानी बोली—**महर्षे! आपके नामका तात्पर्य समझना मेरे लिये बहुत कठिन है। आप भी कमलोंसे भरी हुई बावड़ीमें जाइये ॥ ८७ ॥