महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 805, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरद्वाज उवाच
भरेऽसुतान् भरेऽशिष्यान् भरे देवान् भरे द्विजान् ।
भरे भार्यां भरे द्वाजं भरद्वाजोऽस्मि शोभने ॥ ८८ ॥
**भरद्वाजने कहा—**कल्याणी! जो मेरे पुत्र और शिष्य नहीं हैं, उनका भी मैं पालन करता हूँ, तथा देवता, ब्राह्मण, अपनी धर्मपत्नी तथा द्वाज (वर्णसंकर) मनुष्योंका भी भरण-पोषण करता हूँ, इसलिये भरद्वाज नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥ ८८ ॥
यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८९ ॥
**यातुधानी बोली—**मुनिवर! आपके नामाक्षरका उच्चारण करनेमें भी मुझे क्लेश जान पड़ता है, इसलिये मैं इसे धारण नहीं कर सकती। जाइये, आप भी इस सरोवरमें उतरिये ॥ ८९ ॥
गौतम उवाच
गोदमो दमतोऽधूमोऽदमस्ते समदर्शनात् ।
विद्धि मां गौतमं कृत्ये यातुधानि निबोध माम् ॥ ९० ॥
**गौतमने कहा—**कृत्ये! मैंने गो नामक इन्द्रियोंका संयम किया है, इसलिये 'गोदम' नाम धारण करता हूँ। मैं धूमरहित अग्निके समान तेजस्वी हूँ, सबमें समान दृष्टि रखनेके कारण तुम्हारे या और किसीके द्वारा मेरा दमन नहीं हो सकता। मेरे शरीरकी कान्ति (गो) अन्धकारको दूर भगानेवाली (अतम) है, अतः तुम मुझे गौतम समझो ॥ ९० ॥
यातुधान्युवाच
यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महामुने ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ९१ ॥
**यातुधानी बोली—**महामुने! आपके नामकी व्याख्या भी मैं नहीं समझ सकती। जाइये, पोखरेमें प्रवेश कीजिये ॥ ९१ ॥
विश्वामित्र उवाच
विश्वे देवाश्च मे मित्रं मित्रमस्मि गवां तथा ।
विश्वामित्रमिति ख्यातं यातुधानि निबोध माम् ॥ ९२ ॥
**विश्वामित्रने कहा—**यातुधानी! तू कान खोलकर सुन ले, विश्वेदेव मेरे मित्र हैं, तथा गौओं और सम्पूर्ण विश्वका मैं मित्र हूँ। इसलिये संसारमें विश्वामित्रके नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥ ९२ ॥