महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयातुधान्युवाच नामनैरूक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम्। नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम्॥ ९३॥ यातुधानी बोली— महर्षे! आपके नामकी व्याख्याके एक अक्षरका भी उच्चारण करना मेरे लिये कठिन है। इसे याद रखना मेरे लिये असम्भव है। अतः जाइये, सरोवरमें प्रवेश कीजिये॥ ९३॥
जमदग्निरुवाच जाजमद्यजजानेऽहं जिजाहीह जिजायिषि। जमदग्निरिति ख्यातस्ततो मां विद्धि शोभने॥ ९४॥ जमदग्निने कहा— कल्याणी! मैं जगत् अर्थात् देवताओंके आहवनीय अग्निसे उत्पन्न हुआ हूँ, इसलिये तुम मुझे जमदग्नि नामसे विख्यात समझो॥ ९४॥
यातुधान्युवाच यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महामुने। नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम्॥ ९५॥ यातुधानी बोली— महामुने! आपने जिस प्रकार अपने नामका तात्पर्य बतलाया है, उसको समझना मेरे लिये बहुत कठिन है। अब आप सरोवरमें प्रवेश कीजिये॥ ९५॥
अरुन्धत्युवाच धरान् धरित्रीं वसुधां भर्तुस्तिष्ठाम्यनन्तरम्। मनोऽनुरुन्धती भर्तुरिति मां विद्ध्यारुन्धतीम्॥ ९६॥ अरुन्धतीने कहा— यातुधानी! मैं अरु अर्थात् पर्वत, पृथ्वी और द्युलोकको अपनी शक्तिसे धारण करती हूँ। अपने स्वामीसे कभी दूर नहीं रहती और उनके मनके अनुसार चलती हूँ, इसलिये मेरा नाम अरुन्धती है॥ ९६॥
यातुधान्युवाच नामनैरूक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम्। नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम्॥ ९७॥ यातुधानी बोली— देवि! आपने जो अपने नामकी व्याख्या की है, उसके एक अक्षरका भी उच्चारण मेरे लिये कठिन है, अतः इसे भी मैं नहीं याद रख सकती। आप तालाबमें प्रवेश कीजिये॥ ९७॥
गण्डोवाच वक्त्रैकदेशे गण्डेति धातुमेतं प्रचक्षते।