भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 807, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 807

तेनोन्नतेन गण्डेति विद्धि मानलसम्भवे ॥ ९८ ॥ **गण्डाने कहा—**अग्निसे उत्पन्न होनेवाली कृत्ये! गडि धातुसे गण्ड शब्दकी सिद्धि होती है, यह मुखके एक देश—कपोलका वाचक है। मेरा कपोल (गण्ड) ऊँचा है, इसलिये लोग मुझे गण्डा कहते हैं ॥ ९८ ॥

यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् । नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ९९ ॥ **यातुधानी बोली—**तुम्हारे नामकी व्याख्याका भी उच्चारण करना मेरे लिये कठिन है। अतः इसको याद रखना असम्भव है। जाओ, तुम भी बावड़ीमें उतरो ॥ ९९ ॥

पशुसख उवाच पशून् रञ्जामि दृष्ट्वाहं पशूनां च सदा सखा । गौणं पशुसखेत्येवं विद्धि मामग्निसम्भवे ॥ १०० ॥ **पशुसखने कहा—**आगसे पैदा हुई कृत्ये! मैं पशुओंको प्रसन्न रखता हूँ और उनका प्रिय सखा हूँ; इस गुणके अनुसार मेरा नाम पशुसख है ॥ १०० ॥

यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् । नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ १०१ ॥ **यातुधानी बोली—**तुमने जो अपने नामकी व्याख्या की है, उसके अक्षरोंका उच्चारण करना भी मेरे लिये कष्टप्रद है। अतः इसको याद नहीं रख सकती; अब तुम भी पोखरेमें जाओ ॥ १०१ ॥

शुनःसख उवाच एभिरुक्तं यथा नाम नाहं वक्तुमिहोत्सहे । शुनःसखसखायं मां यातुधान्युपधारय ॥ १०२ ॥ **शुनःसख (संन्यासी) ने कहा—**यातुधानी! इन ऋषियोंने जिस प्रकार अपना नाम बताया है; उस तरह मैं नहीं बता सकता। तू मेरा नाम शुनःसख समझ ॥

यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते वाक्यं संदिग्धया गिरा । तस्मात् पुनरिदानीं त्वं ब्रूहि यन्नाम ते द्विज ॥ १०३ ॥ **यातुधानी बोली—**विप्रवर! आपने संदिग्धवाणीमें अपना नाम बताया है। अतः अब फिर स्पष्टरूपसे अपने नामकी व्याख्या कीजिये ॥ १०३ ॥