महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 808, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंशुनःसख उवाच
सकृदुक्तं मया नाम न गृहीतं त्वया यदि ।
तस्मात् त्रिदण्डाभिहता गच्छ भस्मेति मा चिरम् ॥ १०४ ॥
**शुनःसखने कहा—**मैंने एक बार अपना नाम बता दिया फिर भी यदि तूने उसे ग्रहण नहीं किया तो इस प्रमादके कारण मेरे इस त्रिदण्डकी मार खाकर अभी भस्म हो जा—इसमें विलम्ब न हो ॥ १०४ ॥
सा ब्रह्मदण्डकल्पेन तेन मूर्ध्नि हता तदा ।
कृत्या पपात मेदिन्यां भस्म सा च जगाम ह ॥ १०५ ॥
यह कहकर उस संन्यासीने ब्रह्मदण्डके समान अपने त्रिदण्डसे उसके मस्तकपर ऐसा हाथ जमाया कि वह यातुधानी पृथ्वीपर गिर पड़ी और तुरंत भस्म हो गयी ॥
शुनःसखा च हत्वा तां यातुधानीं महाबलाम् ।
भुवि त्रिदण्डं विष्टभ्य शाद्वले समुपाविशत् ॥ १०६ ॥
इस प्रकार शुनःसखने उस महाबलवती राक्षसीका वध करके त्रिदण्डको पृथ्वीपर रख दिया और स्वयं भी वे वहीं घाससे ढँकी हुई भूमिपर बैठ गये ॥ १०६ ॥
ततस्ते मुनयः सर्वे पुष्कराणि बिसानि च ।
यथाकाममुपादाय समुत्तस्थुर्मुदान्विताः ॥ १०७ ॥
तदनन्तर वे सभी महर्षि इच्छानुसार कमलके फूल और मृणाल लेकर प्रसन्नतापूर्वक सरोवरसे बाहर निकले ॥ १०७ ॥
श्रमेण महता कृत्वा ते बिसानि कलापशः ।
तीरे निक्षिप्य पद्मिन्यास्तर्पणं चक्रुरम्भसा ॥ १०८ ॥
फिर बहुत परिश्रम करके उन्होंने अलग-अलग बोझे बाँधे। इसके बाद उन्हें किनारेपर ही रखकर वे सरोवरके जलसे तर्पण करने लगे ॥ १०८ ॥
अथोत्थाय जलात् तस्मात् सर्वे ते समुपागमन् ।
नापश्यंश्चापि ते तानि बिसानि पुरुषर्षभाः ॥ १०९ ॥
थोड़ी देर बाद जब वे पुरुषप्रवर पानीसे बाहर निकले तो उन्हें रखे हुए अपने वे मृणाल नहीं दिखायी पड़े ॥ १०९ ॥
ऋषय ऊचुः
केन क्षुधापरीतानामस्माकं पापकर्मणाम् ।
नृशंसेनापनीतानि बिसान्याहारकांक्षिणाम् ॥ ११० ॥
**तब वे ऋषि एक दूसरेसे कहने लगे—**अरे! हम सब लोग भूखसे व्याकुल थे और अब भोजन करना चाहते थे। ऐसे समयमें किस निर्दयीने हम पापियोंके मृणाल चुरा लिये ॥ ११० ॥