महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 809, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंते शंकमानास्त्वन्योन्यं पप्रच्छुर्द्विजसत्तमाः । त ऊचुः समयं सर्वे कुर्म इत्यरिकर्शन ॥ १११ ॥ शत्रुसूदन! वे श्रेष्ठ ब्राह्मण आपसमें ही एक-दूसरेपर संदेह करते हुए पूछ-ताछ करने लगे और अन्तमें बोले—'हम सब लोग मिलकर शपथ करें' ॥ १११ ॥ त उक्त्वा बाढमित्येवं सर्व एव तदा समम् । क्षुधार्ताः सुपरिश्रान्ताः शपथायोपचक्रमुः ॥ ११२ ॥ शपथकी बात सुनकर सब-के-सब बोल उठे—'बहुत अच्छा'। फिर वे भूखसे पीड़ित और परिश्रमसे थके-माँदे ब्राह्मण एक साथ ही शपथ खानेको तैयार हो गये ॥ ११२ ॥
अत्रिरुवाच
स गां स्पृशतु पादेन सूर्यं च प्रतिमेहतु । अनध्यायेष्वधीयीत बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११३ ॥ **अत्रि बोले—**जो मृणालकी चोरी करता हो उसे गायको लात मारने, सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करने और अनध्यायके समय अध्ययन करनेका पाप लगे ॥
वसिष्ठ उवाच
अनध्याये पठेल्लोके शुनः सः परिकर्षतु । परिव्राट् कामवृत्तस्तु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११४ ॥ शरणागतं हन्तु स वै स्वसुतां चोपजीवतु । अर्थान् कांक्षतु कीनाशाद् बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११५ ॥ **वसिष्ठ बोले—**जिसने मृणाल चुराये हों उसे निषिद्ध समयमें वेद पढ़ने, कुत्ते लेकर शिकार खेलने, संन्यासी होकर मनमाना बर्ताव करने, शरणागतको मारने, अपनी कन्या बेचकर जीविका चलाने तथा किसानके धन छीन लेनेका पाप लगे ॥ ११४-११५ ॥
कश्यप उवाच
सर्वत्र सर्वं लपतु न्यासलोपं करोतु च । कूटसाक्षित्वमभ्येतु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११६ ॥ **कश्यपने कहा—**जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसको सब जगह सब तरहकी बातें कहने, दूसरोंकी धरोहर हड़प लेने और झूठी गवाही देनेका पाप लगे ॥ वृथामांसाशनश्चास्तु वृथादानं करोतु च । यातु स्त्रियं दिवा चैव बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११७ ॥ जो मृणालोंकी चोरी करता हो उसे मांसाहारका पाप लगे। उसका दान व्यर्थ चला जाय तथा उसे दिनमें स्त्रीके साथ समागम करनेका पाप लगे ॥ ११७ ॥
भरद्वाज उवाच