महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 810, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनृशंसस्त्यक्तधर्मास्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च । ब्राह्मणं चापि जयतां बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११८ ॥ भरद्वाज बोले— जिसने मृणाल चुराया हो उस निर्दयीको धर्मके परित्यागका दोष लगे। वह स्त्रियों, कुटुम्बीजनों तथा गौओंके साथ पापपूर्ण बर्ताव करनेका दोषी हो और ब्राह्मणको वाद-विवादमें पराजित करनेका पाप लगे ॥ ११८ ॥
उपाध्यायमधः कृत्वा ऋचोऽध्येतु अजूंषि च । जुहोतु च स कक्षाग्नौ बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११९ ॥ जो मृणालकी चोरी करता हो, उसे उपाध्याय (अध्यापक या गुरु) को नीचे बैठाकर उनसे ऋग्वेद और यजुर्वेदका अध्ययन करने और घास-फूसकी आगमें आहुति डालनेका पाप लगे ॥ ११९ ॥
जमदग्निरुवाच
पुरीषमुत्सृजत्वप्सु हन्तु गां चैव द्रुह्यतु । अनृतौ मैथुनं यातु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२० ॥ जमदग्नि बोले— जिसने मृणालोंका अपहरण किया हो, उसे पानीमें मलत्याग करनेका पाप लगे, गाय मारनेका अथवा उसके साथ द्रोह करनेका तथा ऋतुकाल आये बिना ही स्त्रीके साथ समागम करनेका पाप लगे ॥ १२० ॥
द्वेष्यो भार्योपजीवी स्याद् दूरबन्धुश्च वैरवान् । अन्योन्यस्यातिथिश्चास्तु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२१ ॥ जिसने मृणाल चुराये हों उसे सबके साथ द्वेष करनेका, स्त्रीकी कमाईपर जीविका चलानेका, भाई-बन्धुओंसे दूर रहनेका, सबसे वैर करनेका और एक-दूसरेके घर अतिथि होनेका पाप लगे ॥ १२१ ॥
गौतम उवाच
अधीत्य वेदांस्त्यजतु त्रीनग्नीनपविध्यतु । विक्रीणातु तथा सोमं बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२२ ॥ गौतम बोले— जिसने मृणाल चुराये हों उसे वेदोंको पढ़कर त्यागनेका, तीनों अग्नियोंका परित्याग करनेका और सोमरसका विक्रय करनेका पाप लगे ॥ १२२ ॥
उदपानप्लवे ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः । तस्य सालोक्यतां यातु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२३ ॥ जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसे वही लोक मिले, जो एक ही कूपमें पानी भरनेवाले, गाँवमें निवास करनेवाले और शूद्रकी पत्नीसे संसर्ग रखनेवाले ब्राह्मणको मिलता है ॥ १२३ ॥
विश्वामित्र उवाच