भारतकोश
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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

२५८ मनुस्मृति । स्त्रियाप्यसम्भवे कार्यं बालेन स्थविरेण वा । शिष्येण वन्धुना वापि दासेन भृतकेन वा ॥ ७० ॥ स्त्रियों की गवाही स्त्रियां, द्विजों की गवाही समान वर्ण के द्विज, शूद्रों की गवाही शूद्र और भङ्गी आदि की गवाही भङ्गी देवें । घर के भीतर, वन में ओर शरीरान्त (खून) में, कोई भी जानने वाला पुरुष गवाह हो सकता है । कोई योग्य गवाह न मिले तो स्त्री, बालक, बूढ़े, शिष्य, सम्बन्धी, दास और नौकर चाकर भी गवाह हो सकते हैं ॥ ६८-७० ॥ बालवृद्धातुराणां च साक्ष्येपु वदतां मृषा । जानीयादस्थिरां वाचमुत्सिक्तमनसां तथा ॥ ७१ ॥ साहसेषु च सर्वेषु स्तेयसंग्रहणेषु च । वाग्दण्डयोश्च पारुष्ये न परीक्षेत साक्षिणः ॥ ७२ ॥ बहुत्वं परिगृह्णीयात्साक्षिद्वैधे नराधिपः । समेषु तु गुणोत्कृष्टान् गुणिद्वैधे द्विजोत्तमान् ॥ ७३ ॥ समक्षदर्शनात्साक्ष्यं श्रवणाच्चैव सिध्यति । तत्र सत्यं ब्रुवन् साक्षी धर्मार्थाभ्यां न हीयते ॥ ७४॥ साक्षी दृष्टश्रुतादन्यद्विब्रुवन्नार्यसंसदि । अवाङ्नरकमभ्येति प्रेत्य स्वर्गाच्च हीयते ॥ ७५ ॥ यत्रानिबद्धोऽपीक्षेत शृणुयाद्वापि किंचन । पृष्टस्तत्रापि तद्ब्रूयाद्यथादृष्टं यथाश्रुतम् ॥ ७६ ॥ एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्याद्बह्वयः शुच्योऽपि न स्त्रियः । स्त्रीबुद्धेरस्थिरत्वाच्च दोषैश्चान्येऽपि ये वृताः ॥ ७७ ॥

आठवां अध्याय । २५६

आठवां अध्याय । २५६ स्वभावेनैव यद्ब्रूयुस्तद्ग्राह्यं व्यावहारिकम् । अतो यदन्यद्विब्रूयुर्धर्मार्थं तदपार्थकम् ॥ ७८ ॥ बालक, बूढ़े और रोगियों के झूठ बोलने का संभव रहता है, इसलिए उनके कहने पर भरोसा न रखे और चंचल चित्त मनुष्य को भी विश्वासी न जाने । संपूर्ण साहस के काम खून, डाका आग लगादेना और चोरी, व्यभिचार, गाली और मारपीट में सा- क्षियों की अधिक परीक्षा-जांच न करे। दोनों तरफ के गवाहों में यदि एक दूसरे के विपरीत कहे तो जिसको अधिक लोग कहें वही बात मानी जाय । और जहां दोनों विपरीत कहनेवाले समान हों वहां जिधर के गवाह गुणवान् हों उधर की बात सही माने और दोनों ही तरफ गुणी हों तो धर्मात्मा द्विजों की गवाही ठीक करे । जिसने आँखों से देखा हो या, जिसने खुद कानों से सुना हो, उसकी गवाही मानी जाती है । उसमें सच बोलने वाला साक्षी धर्म, अर्थ से नहीं हारता । जो पुरुष आर्यसभा में देखे सुने के विरुद्ध गवाही देता है, वह उलटे शिर नरक में पड़ता है । स्वर्ग से रहित होजाता है । जिस मामले में गवाह न भी हों तो भी पूंछने पर जैसा देखा, सुना हो वही बयान करे । निर्लोभ एक भी पुरुष गवाह काफ़ी होता है, पर बहुतसी पवित्र स्त्रियां भी गवाह नहीं होसकतीं । क्योंकि-स्त्रीकी बुद्धि स्थिर नहीं होती । निर्णय के समय, गवाह स्वाभाविक रीति से जो कहे, उसको प्रमाण माने । और भय-लोभ आदि से जो विरुद्ध बात कहें, वह बिलकुल व्यर्थ है ॥ ७१-७८ ॥ सभान्तः साक्षिणः प्राप्तानर्थिप्रत्यर्थिसन्निधौ । प्राड्विवाकोऽनुयुञ्जीत विधिनानेन सान्त्वयन् ॥ ७९ ॥ यद्द्वयोरनयोर्वेत्थ कार्येऽस्मिन् चेष्टितं मिथः । तद्ब्रूत सर्वं सत्येन युष्माकं ह्यत्र साक्षिता ॥ ८० ॥

२६० मनुस्मृति । सत्यं साक्ष्ये ब्रुवन् साक्षी लोकानाप्नोति पुष्कलान् । इह चानुत्तमां कीर्त्तिं वागेषा ब्रह्मपूजिता ॥ ८१ ॥ साक्ष्येऽनृतं वदन् पाशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम् । विवशः शतमाजातीस्तस्मात्साक्ष्यं वदेदृृतम् ॥ ८२ ॥ सत्येन पूयते साक्षी धर्मः सत्येन वर्धते । तस्मात्सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णेषु साक्षिभिः ॥ ८३ ॥ आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी गतिरात्मा तथात्मनः । मावमंस्थाः स्वमात्मानं नॄणां साक्षिणमुत्तमम् ॥८४॥ सभा में गवाह आ जाने पर न्यायकर्त्ता वादी, प्रतिवादी के सामने इसप्रकार कार्यारम्भ करे—इस मामला में आपस में जो कुछ हुआ है वह जो तुम जानते हो सत्य कहो क्योंकि—इस में तुम्हारी गवाही है । गवाह गवाही में सत्य बोलकर, उत्तम गति को पाता है और यहां कीर्त्ति पाता है, सत्यवाणी की वेद में प्रशंसा की है । गवाही में झूठबोलने वाला सौ जन्मतक वरुण के पाशों से बांधा जाता है । इसलिए साक्षी सत्य देनी चाहिए । साक्षी सत्य से पवित्र होता है । सत्य से धर्म बढ़ता है, इसकारण सब जाति के गवाहों को सत्य बोलना चाहिए । अपना आत्माही अपना साक्षी है, आत्माही अपने को सद्गति देता है । इस लिए मनुष्यों के उत्तम साक्षी अपने आत्मा का झूठ साक्षी से अपमान न करे ॥ ७६-८४ ॥ मन्यन्ते वै पापकृतो न कश्चित्पश्यतीति नः । तांस्तु देवाः प्रपश्यन्ति स्वस्यैवान्तरपूरुषः ॥ ८५ ॥ द्यौर्भूमिरापो हृदयं चन्द्राकार्काग्नियमानिलाः । रात्रिः सन्ध्ये च धर्मश्च वृत्तज्ञाः सर्वदेहिनाम् ॥ ८६ ॥

आठवां अध्याय । २६१

आठवां अध्याय । २६१ पापी लोग जानते हैं कि—पाप करते हमको कोई देखता नहीं, परन्तु उनको देवता और अन्तरात्मा देखता है । आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, रात्रि, सन्ध्या और धर्म इन सब के अधिष्ठात्री देवता सब प्राणियों के भले बुरे आचरणों को देखते हैं ॥ ८५-८६ ॥ देवब्राह्मणसान्निध्ये साक्ष्यं पृच्छेद्द्रुतं द्विजान् । उदङ्मुखान्प्राङ्मुखान्वा पूर्वाह्णे वै शुचिः शुचीन् ॥८७॥ ब्रूहीति ब्राह्मणं पृच्छेत्सत्यं ब्रूहीति पार्थिवम् । गोबीजकाञ्चनैर्वैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु पातकैः ॥ ८८ ॥ ब्रह्मघ्नो ये स्मृता लोका ये च स्त्रीबालघातिनः । मित्रद्रुहः कृतघ्नस्य ते ते स्युर्ब्रुवतो मृषा ॥ ८६ ॥ जन्मप्रभृति यत्किञ्चित्पुण्यं भद्र त्वया कृतम् । तत्ते सर्वं शुनो गच्छेद्यदि ब्रूयास्त्वमन्यथा ॥ ६० ॥ एकोऽहमस्मीत्यात्मानं यत्त्वं कल्याण मन्यसे । नित्यं स्थितस्ते हृद्येष पुण्यपापेक्षिता मुनिः ॥ ६१ ॥ यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैष हृदि स्थितः । तेन चेदविवादस्ते मा गङ्गां मा कुरून् गमः ॥ ६२ ॥ नग्नो मुण्डः कपालेन भिक्षार्थी क्षुत्पिपासितः । अन्धः शत्रुकुलं गच्छेद्यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ॥ ६३ ॥ अवाक्शिरास्तमस्यन्धे किल्बिषी नरकं व्रजेत् । यः प्रश्नं वितथं ब्रूयात्पृष्टः सन् धर्मनिश्चयैः ॥६४॥ न्यायाधीश स्नानादि से पवित्र होकर, देवता और ब्राह्मण के समीप में पवित्र द्विजातियों को पूर्व या उत्तरमुख कराकर

२६२ मनुस्मृति । प्रातःकाल सच सच वृत्तान्त पूछे । ब्राह्मण से 'कहो' ऐसा पूछे । क्षत्रिय से 'सच बोलो' इस भांति पूछे । और 'गौ, बीज, सोना चुराने का पातक तुमको होगा' ऐसा कहकर वैश्यों से पूछे । 'सब पाप तुमको लगेगा' यों कहकर शूद्र से साक्षी लेवे । ब्राह्मण, स्त्री, बालक को मारनेवाले को और मित्रद्रोही, कृतघ्न को जो जो लोक मिलते हैं वेही लोक झूठ बोलनेवाले को मिलते हैं। हे भद्र पुरुष ! जन्म से लेकर तूने जो कुछ पुण्य किया है, वह सब झूठी गवाही देगा तो, कुत्ते को पहुँचेगा । हे भद्र ! तू यह जो मानता है कि, मैं अकेला जीवात्मा हूं सो न मान । क्योंकि-पुण्य, पाप को देखनेवाला अन्तर्यामी नित्य हृदय में ही स्थित है। यमरूप वैवस्वत देव हृदय में स्थित हैं, उसमें विश्वास रखने से गङ्गा और कुरुक्षेत्र जाने की ज़रूरत नहीं है । जो झूठी गवाही देता है-उसको नङ्गा, शिर मुड़ाकर, भूखा, प्यासा और अंधा होकर, हाथ में ठीकरा लेकर शत्रु के घर भीख मांगने जाना पड़ता है। जो झूठ साक्षी पूंछने पर देता है। वह पापी नीचे शिर होकर, अँधरे नरक में पड़ता है ॥ ८७-६४ ॥ अन्धो मत्स्यानिवाश्नाति स नरः कण्टकैः सह । यो भाषतेऽर्थवैकल्यमप्रत्यक्षं सभां गतः ॥ ६५ ॥ यस्य विद्वान् हि वदतः क्षेत्रज्ञो नाभिशङ्कते । तस्मान्न देवाः श्रेयांसं लोकेऽन्यं पुरुषं विदुः ॥ ६६ ॥ यावतो बान्धवान् यस्मिन् हन्ति साक्ष्येऽनृतं वदन् । तावतः संख्यया तस्मिन् शृणु सौम्य़ानुपूर्वशः ॥ ६७ ॥ पञ्च पश्वनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते । शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं पुरुषानृते ॥ ६८ ॥ हन्ति जातानजातांश्च हिरण्यार्थेऽनृतं वदन् । सर्वं भूम्यनृते हन्ति मास्म, भूम्यनृतं वदीः ॥ ६६ ॥

[आठवां अध्याय । २६३

[आठवां अध्याय । २६३ अप्सु भूमिवदित्याहुः स्त्रीणां भोगे च मैथुने । अब्जेषु चैव रत्नेषु सर्वेष्वश्ममयेषु च ॥ १०० ॥ जो सभा में बिना देखी बात बनाकर बोलता है वह अंधा होकर कांटों सहित मछली खाता है। साक्षी के समय जिसकी जीवात्मा असत्य की शङ्का नहीं करता, उससे अच्छा देवगण दूसरे को नहीं मानते। हे सौम्य ! जिस साक्षी में झूठ बोलनेवाला जितने बान्धवों के मारने का फल पाता है वह यों है--पशु के बारे में झूठ बोलने से पांच बान्धवों की हत्या का पातक होता है। गौके विषय में दश, घोड़ा के सौ और पुरुष के लिए हज़ार की हत्या का पातक लगता है। सुवर्ण के लिए बोलने से पैदा हुए या होनेवालों की हत्या को पाता है और भूमि के लिए कहने से संपूर्ण प्राणियों के वध को करता है। इसलिए भूमि के बारे में कभी झूठी साक्षी न दे। सरोवर के जल, स्त्रीसंभोग, जल से पैदा मोती और नीलम आदि रत्नों के लिए झूठी गवाही देने से भूमि का सा दोष होता है ॥ ९५-१०० ॥ एतान् दोषानवेक्ष्य त्वं सर्वाननृतभाषणे । यथाश्रुतं यदादृष्टं सर्वमेवाञ्जसा वद ॥ १०१ ॥ गोरक्षकान् वाणिजिकांस्तथा कारुकुशीलवान् । प्रेष्यान् वार्धुषिकांश्चैव विप्रान् शूद्रवदाचरेत् ॥१०२॥ इन सब पातकों को समझकर, जैसा देखा या सुना है वही ठीक ठीक कहो। गोपालक, बनियां, बढ़ई, लोहार, गानेबजाने का काम करनेवाले, नौकरी पेशा और व्याजखोर ब्राह्मणों से गवाही लेते समय शूद्र के समान प्रश्न-सवाल करे ॥ १०१-१०२ ॥ तद्वदन् धर्मतोऽर्थेषु जानन्नप्यन्यथा नरः । न स्वर्गाच्च्यवते लोकाद्दैवीं वाचं वदन्ति ताम् ॥ १०३॥ शूद्रविट्क्षत्रविप्राणां यत्रार्तोक्तौ भवेद्वधः ।

२६४ मनुस्मृति । तत्र वक्तव्यमनृतं तद्धि सत्याद्विशिष्यते ॥ १०४ ॥ वाग्दैवत्यैश्च चरुभिर्यजेरंस्ते सरस्वतीम् । अनृतस्यैनसस्तस्य कुर्वाणा निष्कृतिं पराम् ॥ १०५ ॥ कूष्माण्डैर्वापि जुहुयाद्घृतमग्नौ यथाविधि । उदित्यूचा वा वारुण्या ऋचेनाब्दैवतेन वा ॥ १०६ ॥ त्रिपक्षादब्रुवन् साक्ष्यमृणादिषु नरोऽगदः । तदृणं प्राप्नुयात्सर्वं दशबन्धं च सर्वतः ॥ १०७ ॥ यस्य दृश्येत सप्ताहादुक्तवाक्यस्य साक्षिणः । रोगोऽग्निर्ज्ञातिमरणमृणं दाप्यो दमं च सः ॥ १०८ ॥ असाक्षिकेेषु त्वर्थेषु मिथो विवदमानयोः । अविन्दंस्तत्त्वतः सत्यं शपथेनापि लम्भयेत् ॥ १०९ ॥ महर्षिभिश्च देवैश्च कार्यार्थं शपथाः कृताः । वशिष्ठश्चापि शपथं शेपे पैजवने नृपे ॥ ११० ॥ जो मनुष्य जानता हुआ भी धर्मवश झूठ बोले तो वह स्वर्गलोकसे पतित नहीं होता क्योंकि उस असत्य को देववाणी कहते हैं। जिस मामला में शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मणों के प्राण जाते हों वहां साक्षी झूठ बोले-वह झूठ भी सत्य से श्रेष्ठ है । झूठे गवाहों को उस पाप से छुटकारा पानेके लिए वाणी देवता के लिए चरु बनाकर सरस्वतीदेवी का पूजन करना चाहिए । अथवा कूष्माण्ड मन्त्रों ( यद्देवा देवहेडनम् यजु० २० । १४ ) से हवन करे । या वरुण देवता के (उदुत्तमं वरुणपाशम्' यजु० १२। १२) मन्त्रसे अथवा जल देवता के मन्त्र ( आपो हिष्ठा यजु० ११ । ५० ) से हवन करे। कर्ज़ाके बारेमें साक्षी नीरोग होनेपर तीनदिनतक न आवे तो महा- जन अपना सब ऋण पावे और धन का दशांश गवाहपर दण्ड

आठवां अध्याय । २६५

आठवां अध्याय । २६५ करे। गवाह को सात दिन के भीतर रोग, अग्नि, स्त्री पुत्रादि के मृत्यु की आपत्ति होजाय तो उसको दण्ड न करे। जिन वादी और प्रतिवादियों के गवाह न हों, उनका ठीक तत्त्व समझ में न आवे तो शपथ-क़सम से भी निर्णय करलेवे। महर्षि और देवताओं ने भी शपथ की थी। विश्वामित्रने वशिष्ठपर हत्या लगाई, थी तब उन्होंने राजा पैजवनके समीप शपथ कीथी ॥१०३-११०॥ न वृथा शपथं कुर्यात्स्वल्पेऽप्यर्थे नरो बुधः । वृथा हि शपथं कुर्वन् प्रेत्य चेह च नश्यति ॥ १११ ॥ कामिनीषु विवाहेषु गवां भक्ष्ये तथेन्धने । ब्राह्मणाभ्युपपत्तौ च शपथे नास्ति पातकम् ॥ ११२॥ सत्येन शापयेद्विप्रं क्षत्रियं वाहनायुधैः । गोबीजकाञ्चनैर्वैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु पातकैः ॥ ११३ ॥ अग्निं वाहारयेदेनमप्सु चैनं निमज्जयेत् । पुत्रदारस्य वाप्येनं शिरांसि स्पर्शयेत् पृथक् ॥ ११४॥ यमिद्धो न दहत्यग्निरापो नोन्मज्जयन्ति च । न चार्तिमृच्छति क्षिप्रं स ज्ञेयः शपथे शुचिः॥ ११५ ॥ बुद्धिमान् पुरुष थोड़ी बात के लिए शपथ न करे । वृथा शपथ से लोक-परलोक दोनों बिगड़ते हैं। स्त्रियों में, विवाह में, गौवों के कुछ नुक़सान करने में यज्ञार्थ काष्ठसंग्रह में और ब्राह्मण की आपत्ति में झूठा शपथ करने से पाप नहीं लगता । ब्राह्मण को सत्य की शपथ दे, क्षत्रिय को सवारी और शस्त्र की देय, वैश्य को गौ, अन्न और सुवर्ण की और शूद्र को सब पातक लगने की शपथ देय । अथवा शूद्र से शपथ में अग्नि उठवावे, जल में गोता लगवावे और उसके पुत्र या स्त्री के ऊपर हाथ रखवावे। जिसको ३४

२६६ मनुस्मृति ।

अग्नि न जळावे, जल में न डूबे और अचानक शिर पर आपत्ति न पड़जाय उसको शपथ में पवित्र जानना ॥ १११-११५ ॥

वत्सस्य ह्यभिशस्तस्य पुरा भ्रात्रा यवीयसा। नाग्निर्ददाह रोमापि सत्येन जगतः स्पृशः ॥ ११६ ॥ यस्मिन्यस्मिन् विवादे तु कौटसाक्ष्यं कृतं भवेत् । तत्तत्कार्यं निवर्त्तेत कृतं चाप्यकृतं भवेत् ॥ ११७ ॥ लोभान्मोहाद्भयान्मैत्रात्कामात्क्रोधात्तथैव च। अज्ञानाद्बालभावाच्च साक्ष्यं वितथमुच्यते ॥ ११८॥

पूर्व काल में वत्सऋषि के ऊपर उनके छोटे भाई ने कलङ्क लगाया था कि तू शूद्रा के गर्भ का है। तब वत्स ने अग्नि में प्रवेश किया था, पर सत्यवश अग्नि ने उनका एक रोम भी नहीं जलाया। जिन जिन मुक़द्मों में झूठी गवाही दी ऐसा नि- श्चय हो-उनको फिर से उलट कर परीक्षा करे। लोभ, मोह, भय, मित्रता, काम, क्रोध, अज्ञान और लड़कपन से गवाही झूठी कही जाती है ॥ ११६-११८ ॥

एषामन्यतमे स्थाने यः साक्ष्यमनृतं वदेत् । तस्य दण्डविशेषांस्तु प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥ ११९ ॥ लोभात्सहस्रं दण्ड्यस्तु मोहात्पूर्व तु साहसम् । भयाद्द्वौ मध्यमौ दण्डौ मैत्रात्पूर्व चतुर्गुणम् ॥ १२०॥ कामाद्दशगुणं पूर्वं क्रोधात्तु त्रिगुणं परम् । अज्ञानाद् द्वे शते पूर्णे बालिश्याच्छतमेव तु ॥ १२१ ॥ एतानाहुः कौटसाक्ष्ये प्रोक्तान्दण्डान्मनीषिभिः । धर्मस्याव्यभिचारार्थमधर्मानियमाय च ॥ १२२ ॥

आठवां अध्याय । २६७

आठवां अध्याय । २६७ कूटसाक्ष्यं तु कुर्वाणांस्त्रीन्वर्णान् धार्मिको नृपः । प्रवासयेद्दण्डयित्वा ब्राह्मणं तु विवासयेत् ॥ १२३ ॥ दश स्थानानि दण्डस्य मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् । त्रिषु वर्णेषु यानि स्युरक्षतो ब्राह्मणो व्रजेत् ॥ १२४ ॥ इनमें किसी एक कारण से जो झूठी गवाही दे उसके दण्डों का निर्धार क्रम से इस प्रकार है:—लोभ से झूठी गवाही देने पर हज़ार पण दण्ड, मोहसे कहनेवाले पर प्रथम साहस अर्थात् २५० पण, भय से देनेपर मध्यम साहस का दूना और मित्रता के कारण से प्रथम साहस का चौगुना—१००० पण दण्ड देय। काम से दशगुना पूर्व साहस, क्रोध से तिगुना मध्यम साहस, अज्ञान से पूरे २०० पण और मूर्खता से झूठ कहने पर १०० पण दण्ड-जु- र्माना करे। सत्य धर्म की रक्षा और अधर्म को रोकने के लिए ऋ- षियों ने इन दण्डों को कहा है। धार्मिक राजा झूठी गवाही देने वाले तीनों वर्णों को अपराध के अनुसार दण्ड देकर देश से निकालदे और ब्राह्मण को दण्ड न देकर देशनिकाला ही करे । स्वायम्भुमनु ने दण्ड देने के दश स्थान कहे हैं पर ब्राह्मण को देशनिकाले की ही सज़ा है ॥ ११६-१२४ ॥ उपस्थमुदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम् । चक्षुर्नासा च कर्णौ च धनं देहस्तथैव च ॥ १२५ ॥ अनुबन्धं परिज्ञाय देशकालौ च तत्त्वतः । सारापराधौ चालोक्य दण्डं दण्ड्येषु पातयेत् ॥१२६॥ लिङ्ग, पेट, जीभ, हाथ, पैर और आँख, नाक, कान, धन और शरीर ये दश दण्ड देने के स्थान हैं। अपराध और दण्ड सहनेकी शक्ति और देश, कालका विचार करके अपराधियों को दण्ड देवे ॥ १२५-१२६ ॥

२६८ मनुस्मृति । अधर्मदण्डनं लोके यशोघ्नं कीर्तिनाशनम् । अस्वर्ग्यं च परत्रापि तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ १२७ ॥ अदण्ड्यान्दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन् । अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति ॥ १२८ ॥ वाग्दण्डं प्रथमं कुर्याद्धिग्दण्डं तदनन्तरम् । तृतीयं धनदण्डं तु वधदण्डमतः परम् ॥ १२६ ॥ वधेनापि यदा त्वेतान्निग्रहीतुं न शक्नुयात् । तदैषु सर्वमप्येतत्प्रयुञ्जीत चतुष्टयम् ॥ १३० ॥ अन्याय से दण्ड देना, इस लोक में यश और कीर्ति का नाशक है। परलोक का बाधक है। निरपराधियों को दण्ड और अपरा- धियों को दण्ड न देने से राजा की बड़ी अकीर्ति होती है। अयश मिलता है और नरक में पड़ता है। प्रथम अपराध में वाग्दण्ड-स- मझा देय, फिर अपराध करे तो धिक्कार-लानत दे। उसके बाद करे तो जुर्माना करे। फिर भी करे तो शरीर दण्ड देवे। जब देह दण्ड से भी अपराधियों को वश में न कर सके तो इन चारों दण्डों का प्रयोग करे ॥ १२७-१३०॥ लोकसंव्यवहारार्थं याः संज्ञाः प्रथिता भुवि । ताम्ररूप्यसुवर्णानां ताः प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १३१ ॥ जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः । प्रथमं तत्प्रमाणानां त्रसरेणुं प्रचक्षते ॥ १३२ ॥ लोक में व्यवहार के लिये सोना, चांदी आदि की जो संज्ञा माप-तौल प्रसिद्ध है वह यहां कही जाती है:—मकान के झरोखे से आनेवाली सूर्यकिरणों में जो छोटे छोटे धूल के कण दिखलाई देते हैं वह प्रथम मान है उसको त्रसरेणु कहते हैं ॥ १३१-१३२ ॥

आठवां अध्याय । २६६

आठवां अध्याय । २६६ त्रसरेणवोऽष्टौ विज्ञेया लिक्षैका परिमाणतः । ता राजसर्षपस्तिस्रस्ते त्रयो गौरसर्षपः ॥ १३३ ॥ सर्षपाः षड्यवो मध्यस्त्रियवं त्वेककृष्णलम् । पञ्चकृष्णलको माषस्ते सुवर्णस्तु षोडश ॥ १३४ ॥ पलं सुवर्णाश्चत्वारः पलानि धरणं दश । द्वे कृष्णले समधृते विज्ञेयो रौप्यमाषकः ॥ १३५ ॥ ते षोडश स्याद्धरणं पुराणश्चैव राजतः । कार्षापणस्तु विज्ञेयस्ताम्रिकः कार्षिकः पणः ॥ १३६ ॥ धरणानि दश ज्ञेयः शतमानस्तु राजतः । चतुःसौवर्णिको निष्को विज्ञेयस्तु प्रमाणतः ॥ १३७ ॥ पणानां द्वे शते सार्धे प्रथमः साहसः स्मृतः । मध्यमः पञ्च विज्ञेयः सहस्रं त्वेव चोत्तमः ॥ १३८ ॥ ८ त्रसरेणु = १ लिक्षा । ३ लिक्षा = १ राई । ३ राई = १ सफेद सरसों । ६ सरसों = १ मध्यमयव । ३ मध्यमयव = १ कृष्णल । ५ कृष्णल = १ माष । १६ माष = १ सुवर्ण । ४ सुवर्ण = १ पल । १० पल = १ धरण । २ कृष्णल = १ चांदी का माषा । १६ चांदी माषा = १ धरण, वा चांदी का पुराण । तांबा के कर्ष- भर के पण-पैसा को कार्षापण कहते हैं । १० धरण = १ चांदी का शतमान । ४ सुवर्ण = १ धरण । २५० पण = प्रथम साहस । ( साधारण दण्ड ) ५०० पण = मध्यम साहस । १००० पण = उत्तम साहस ॥ १३३-१३८ ॥ ऋणे देये प्रतिज्ञाते पञ्चकं शतमर्हति ।

२७० मनुस्मृति । अपह्नवे तद्द्विगुणं तन्मनोरनुशासनम् ॥ १३६ ॥ वशिष्ठविहितां वृद्धिं सृजेद्वित्तविवर्धिनीम् । अशीतिभागं गृह्णीयान्मासाद्वार्धुषिकः शते ॥ १४० ॥ द्विकं शतं वा गृह्णीयात्सतां धर्ममनुस्मरन् । द्विकं शतं हि गृह्णानो न भवत्यर्थकिल्बिषी ॥ १४१ ॥ द्विकं त्रिकं चतुष्कं च पञ्चकं च शतं समम् । मासस्य वृद्धिं गृह्णीयाद्वर्णानामनुपूर्वशः ॥ १४२ ॥ यदि ऋणी सभा में महाजन का रुपया देना क़बूल करे तो सैकड़े पांच दण्ड देने योग्य है। और इन्कार करे तो सैकड़े दश दण्ड देवे। वशिष्ठ के नियमानुसार सैकड़े का अस्सीवां भाग (सवा रुपया सैकड़ा) व्याज लेवे । अथवा दो रुपया सैकड़ा व्याज़ लेवे। दो रुपया सैकड़ा ब्याज लेने से दोष नहीं होता । ब्राह्मण आदि चारों वर्णों से क्रम से दो, तीन, चार और पांच रुपये सैकड़ा माहवारी ब्याज ग्रहण करे ॥ १३६-१४२ ॥ न त्वेवाधौ सोपकारे कौसीदीं वृद्धिमाप्नुयात् । न चाधेः कालसंरोधान्निसर्गोऽस्ति न विक्रयः ॥ १४३ ॥ न भोक्तव्यो बलादाधिर्भुञ्जानो वृद्धिमुत्सृजेत् । मूल्येन तोषयेच्चैनमाधिस्तेनोऽन्यथा भवेत् ॥ १४४ ॥ आधिश्चोपनिधिश्चोभौ न कालात्ययमहर्हतः । अवहार्यौ भवेतां तौ दीर्घकालमवस्थितौ ॥ १४५ ॥ संप्रीत्या भुज्यमानानि न नश्यन्ति कदाचन । धेनुरुष्ट्रो वहन्नश्वो यश्च दम्यः प्रयुज्यते ॥ १४६ ॥

आठवां अध्याय । २७९

आठवां अध्याय । २७९ यत्किञ्चिद्दशवर्षाणि सन्निधौ प्रेक्षते धनी । भुज्यमानं परैस्तूष्णीं न स तल्लब्धुमर्हति ॥ १४७ ॥ भूमि, गौ, धन आदि भोग के पदार्थ यदि आधि-गिरवी महा- जन के रक्खे तो महाजन को व्याज न मिले और नियमित समय में ऋणी छुड़ा न सके तो उसको महाजन बेंच या किसीको दे नहीं सकता । आधि-गिरवी की वस्तु को ऋणी की आज्ञा बिना न वर्ते यदि काम में लावे तो व्याज छोड़ देवे और टूट फूटजाय तो ऋणीको उसका बदला धन आदि देकर खुशकरे नहीं तो चोर माना जाता है । आधि-गिरवी और उपनिधि-अमानत के पदार्थ बहुत दिन पड़े रहें तो भी अवधि नहीं बीत जाती । जब मालिक चाहे तभी ले सकता है । गौ, ऊँट, घोड़ा वगैरह किसीने प्रेम से वर्तने को दिए हों और वह वर्तता हो तो भी उसके मालिक का हक बना रहता है । यदि किसी वस्तु को दूसरे लोग दश वर्ष तक वर्तते रहें और उसका मालिक चुपचाप देखाकरे, तो फिर वह उसको नहीं पासकता ॥ १४३-१४७ ॥ अजडश्चेदपौगण्डो विषये चास्य भुज्यते । भग्नं तद्व्यवहारेण भोक्ता तद्द्रव्यमर्हति ॥ १४८ ॥ आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधिः स्त्रियः । राजस्वं श्रोत्रियस्वं च नं भोगेन प्रणश्यति ॥ १४६ ॥ यः स्वामिनाऽननुज्ञातमाधिं भुङ्क्ते विचक्षणः । तेनार्धवृद्धिर्मोक्तव्या तस्य भोगस्य निष्कृतिः ॥१५०॥ वस्तु का स्वामी पागल न हो और नादान न हो पर उसका वस्तु दूसरा भोगता रहे तो न्याय से उसका अधिकार नहीं रहता । भोगनेवाला पाजाता है । गिरवी वस्तु, सीमा, बालक का धन, धरोहर, प्रसन्नता से भोगार्थ दिया धन, स्त्री और राजा का धन,

२७२ मनुस्मृति ।

श्रोत्रिय का धन इनको दूसरा भोगे तो भी स्वामी का अधिकार नहीं जाता । जो चालाक मनुष्य आधि को बिना स्वामी के कहे भोगता है उसको आधा ब्याज छोड़ देना चाहिए क्योंकि उसका आधा भोग से पट गया ॥ १४८-१५० ॥ कुसीदवृद्धिद्वैगुण्यं नात्येति सकृदाहता । धान्ये सदे लवे वाह्ये नातिक्रामति पञ्चताम् ॥ १५१ ॥ कृतानुसारादधिका व्यतिरिक्ता न सिध्यति । कुसीदपथमाहुस्तं पञ्चकं शतमर्हति ॥ १५२ ॥ – नातिसांवत्सरीं वृद्धिं न चादृष्टां पुनर्हरेत् । चक्रवृद्धिः कालवृद्धिः कारिता कायिका च या ॥१५३॥ ऋणं दातुमशक्तो यः कर्त्तुमिच्छेत्पुनः क्रियाम् । स दत्त्वा निर्जितां वृद्धिं करणं परिवर्तयेत् ॥ १५४ ॥ अदर्शयित्वा तत्रैव हिरण्यं परिवर्तयेत् । यावती संभवेद्वृद्धिस्तावतीं दातुमर्हति ॥ १५५ ॥ कर्ज़ा के रुपयों का सूद एकबार लेने पर, ऋण का धन दूने से अधिक नहीं लिया जा सकता । और धान्य, वृक्ष के मूल, फल, ऊन और वाहन पांचगुने से अधिक नहीं लिये जाते हैं । जो सूद का ठहराव हो चुका है उससे अधिक शास्त्र के खिलाफ़ नहीं मिल सकता है । ब्याज का क़ायदा यही है कि-अधिक से अधिक पांच रुपये सैकड़ा लिया जा सकता है । एक वर्ष में ब्याज मिला- कर, मूल धन दूना हो जाय तो उतना ब्याज न लेय 'व्याज का ब्याज न लेय' नियतकाल बीतने पर दूना तिगुना आदि लेने का ठहराव न करे और उससे कोई काम धोखा देकर न करावे । जो कर्ज़दार पुराना कर्ज़ा अदा न करसके और नया व्यवहार चलाना चाहे तो पुराने काग़ज़ को बदलाकर नया करा लेवे । लेकिन

आठवां अध्याय । २७३

आठवां अध्याय । २७३ ब्याज भी न देसके तो उसको मूलधन में जोड़ देय । जो रक़म हो उसका सूद दिया करे ॥ १५१-१५५ ॥ चक्रवृद्धिं समारूढो देशकालव्यवस्थितः । अतिक्रामन् देशकालौ न तत्फलमवाप्नुयात् ॥ १५६ ॥ समुद्रयानकुशला देशकालार्थदर्शिनः । स्थापयन्ति तु यां वृद्धिं सा तत्राधिगमं प्रति ॥१५७॥ यो यस्य प्रतिभूस्तिष्ठेद्दर्शनायेह मानवः । अदर्शयन् स तं तस्य प्रयच्छेत्स्वधनादृणम् ॥ १५८ ॥ चक्रवृद्धि का आश्रय करनेवाला महाजन देश-काल के नियम से ही ब्याज आदि पावे, मियाद गुज़रने पर पाने योग्य नहीं है। समुद्र आदि के रास्ते देश-विदेश में व्यापार चतुर महाजन जो आय-व्यय के अनुसार भाड़ा ब्याज आदि तै करे वही प्रमाण है। जो मनुष्य जिसको हाज़िर करने के लिए प्रतिभू— ज़ामिन हो वह उसे हाज़िर न कर सके तो अपने पास से उसका ऋण चुकावे ॥ १५६-१५८ ॥ प्रातिभाव्यं वृथादानमाक्षिकं सौरिकं च यत् । दण्डशुल्कावशेषं च न पुत्रो दातुमर्हति ॥ १५६ ॥ दर्शनप्रातिभाव्ये तु विधिः स्यात्पूर्वचोदितः । दानप्रतिभुवि प्रेते दायादानपि दापयेत् ॥ १६० ॥ अदातरि पुनर्दाता विज्ञातप्रकृतावृणम् । पश्चात्प्रतिभुवि प्रेते परीप्सेत्केन हेतुना ॥ १६१ ॥ निरादिष्टधनश्चेत्तु प्रतिभूः स्यादलंघनः । स्वधनादेव तद्दद्यान्निरादिष्ट इति स्थितिः ॥ १६२ ॥ ३५

२७४ : मनुस्मृति । मत्तोन्मत्तार्ताध्यधीनर्बालेन स्थविरेण वा । असंबंधकृतश्चैव व्यवहारो न सिध्यति ॥ १६३ ॥ सत्या न भाषा भवति यद्यपि स्यात्प्रतिष्ठिता । बहिश्चेद्भाष्यते धर्मान्नियताद्व्यावहारिकात्॥ १६४॥ ज़मानत का धन, फ़िजूल दान, जुये का रुपया, मद्य का रुपया और जुर्माना का रुपया पिता के मरने पर उसके बदले, पुनः नहीं दे सकता । सिर्फ़ हाज़िर करने की ज़मानत में पहली बात जाने । परन्तु ऋणी के बदले में क़र्ज़ अदा करने की ज़मानत वाला मर जाय तो उसके वारिसों से भी दिलावे । क़र्ज़दार क़र्ज़ न दे और ज़ामिन मरजाय तो महाजन कैसे अपना रुपया वसूल करे ? किसी से नहीं। यदि ज़ामिन को ऋणी रुपया सौंप गया हो और उसके पास भी खूब धन हो तो ज़मानती के मरने पर उसका पुत्र ऋण चुकावे—यह धर्मशास्त्र की मर्यादा है। नशाबाज़, पागल, दुःखी, पराधीन, बालक, बुड्ढा और सामर्थ्य के बाहर प्रतिज्ञा करनेवाले का व्यवहार ठीक नहीं माना जाता । आपस की लिखा- पढ़ी या ज़बानी ठहरी भी कोई बात यदि धर्म—क़ानून और रिवाज़ के खिलाफ़ हो तो सच्ची नहीं मानी जाती ॥ १५६-१६४ ॥ योगाधमनविक्रीतं योगदानप्रतिग्रहम् । यत्र वाप्युपधिं पश्येत्तत्सर्वं विनिवर्तयेत् ॥ १६५ ॥ ग्रहीता यदि नष्टः स्यात्कुटुम्बार्थे कृतो व्ययः । दातव्यं बान्धवैस्तत्स्यात्प्रविभक्तैरपि स्वतः ॥ १६६ ॥ कुटुम्बार्थेऽप्यधीनोऽपि व्यवहारं यमाचरेत् । स्वदेशे वा विदेशे वा तं ज्यायान्न विचालयेत् ॥ १६७॥ कपट से किया हुआ बन्धक ( गिरवी ) विक्रय, दान, प्रतिग्रह और निक्षेप—धरोहर कोभी लौटा देना चाहिए। यदि ऋणी मर

आठवां अध्याय । २७५

आठवां अध्याय । २७५ गया हो और ऋण का द्रव्य कुटुम्ब में लगाया हो तो उसके बान्धव मिले या जुदे हों पर अपने धन से ऋण देवें । कोई अधीन पुरुष भी स्वामी के कुटुम्ब के लिए देश या परदेश में लेन-देन करले तो स्वामी उसको कबूल करलेवे, इन्कार न करे ॥ १६५-१६७ ॥ बलाद्दत्तं बलाद्भुक्तं बलाद्यच्चापि लेखितम् । सर्व्वान् बलकृतानर्थानकृतान् मनुरब्रवीत् ॥ १६८ ॥ त्रयः परार्थे क्लिश्यन्ति साक्षिणः प्रतिभूः कुलम् । चत्वारस्तूपचीयन्ते विप्र आढ्यो वणिङ्नृपः ॥ १६६ ॥ अनादेयं नाददीत परिक्षीणोऽपि पार्थिवः । न चादेयं समृद्धोऽपि सूक्ष्ममप्यर्थमुत्सृजेत् ॥ १७०॥ अनादेयस्य चादानादादेयस्य च वर्जनात् । दौर्बल्यं ख्याप्यते राज्ञः स प्रेत्येह च नश्यति ॥ १७१ ॥ स्वादानाद्वर्णसंसर्गात्स्वबलानां च रक्षणात् । बलं संजायते राज्ञः स प्रेत्येह च वर्धते ॥ १७२ ॥ बलात्कार से दिया, बलात्कार से भोग किया, कुछ लिखाया या कुछ किसी से कराया न किये के समान मनुजी ने कहा है । तीन दूसरे के लिए दुःख पाते हैं—साक्षी, ज़ामिन और ऋणी के कुटुम्बी । और चार दूसरे के कारण बढ़ते हैं—ब्राह्मण, धनी, बनिया और राजा । राजा निर्धन होकर भी अनुचित धन आदि न लेवे और धनी होकर भी लेने योग्य धन थोड़ा भी न छोड़े । न लेने लायक़ वस्तु को लेने और लेने लायक़ को छोड़ने से राजा का ढीलापन ज़ाहिर होता है। और अपयश पाकर नष्ट होजाता है। उचित धन लेने से प्रजाओं को वर्णसंकर न होने देने से और दुर्बलों की रक्षा करने से राजा को बल प्राप्त होता है। और लोक-परलोक में सुख भोगता है ॥ १६८-१७२ ॥

२७६ मनुस्मृति । तस्माद्यम इव स्वामी स्वयं हित्वा प्रियाप्रिये । वर्तेत याम्यया वृत्त्या जितक्रोधो जितेन्द्रियः ॥ १७३ ॥ यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात्कुर्यान्नराधिपः । अचिरात्तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः ॥ १७४ ॥ कामक्रोधौ तु संयम्य योऽर्थान् धर्मेण पश्यति । प्रजास्तमनुवर्तन्ते समुद्रमिव सिन्धवः ॥ १७५ ॥ इसलिए राजा यमराज के समान अपना प्रिय और अप्रिय छोड़कर क्रोध और इन्द्रियों को वश में करके, समभाव प्रजापर रक्खे। जो राजा मूर्खता से अधर्म के कार्य करता है, उस दुष्ट को शत्रु शीघ्रही वश में कर लेते हैं। परन्तु जो काम, क्रोध को वश में करके, धर्म से कार्यों को देखता है, उसकी प्रजा समुद्र के नदियों की भांति अनुगामिनी होती हैं ॥ १७३-१७५ ॥ यः साधयन्तं छन्देन वेदयेद्धनिकं नृपे । स राज्ञा तच्चतुर्भागं दाप्यस्तस्य च तद्धनम् ॥ १७६ ॥ कर्मणापि समं कुर्याद्धनिकायाधमर्णिकः । समोऽवकृष्टजातिस्तु दद्याच्छ्रेयांस्तु तच्छनैः ॥ १७७ ॥ अनेन विधिना राजा मिथो विवदतां नृणाम् । साक्षिप्रत्ययसिद्धानि कार्याणि समतां नयेत् ॥ १७८ ॥ यदि ऋणी (अपने को राजप्रिय मानकर) राजा से कहे कि धनी ज़बरदस्ती ऋण वसूल करता है तोभी राजा उसका धन दिलावे और ऋणीपर ऋण का चौथाई दण्ड करे। समानजाति वा हीनजाति कर्ज़दार, महाजन का धन उसके यहां काम करके चुका दे और महाजन से ऊंची जाति का ऋणी धीरे धीरे अदा करदेवे। इसभांति राजा आपस में झगड़ा करनेवालों का निर्णय साक्षी, लेख आदि के आधार से करे ॥ १७६-१७८ ॥

आठवां अध्याय। २७७

आठवां अध्याय। २७७ कुलजे वृत्तसंपन्ने धर्मज्ञे सत्यवादिनि । महापक्षे धनिन्यार्ये निक्षेपं निक्षिपेद्बुधः ॥ १७६ ॥ यो यथा निक्षिपेद्धस्ते यमर्थं यस्य मानवः । स तथैव ग्रहीतव्यो यथा दायस्तथा ग्रहः ॥ १८० ॥ यो निक्षेपं याच्यमानो निक्षेतुर्न प्रयच्छति । स याच्यः प्राङ्‌विवाकेन तन्निक्षेपुरसन्निधौ ॥ १८१ ॥ साक्ष्यरूपे प्रणिधिभिर्वयोरूपसमन्वितैः । अपदेशैश्च संन्यस्य हिरण्यं तस्य तत्त्वतः ॥ १८२ ॥ स यदि प्रतिपद्येत यथान्यस्तं यथाकृतम् । न तत्र विद्यते किंचिद्यत्परैरभियुज्यते ॥ १८३ ॥ निक्षेप-धरोहर-अमानत रखना । कुलीन, सदाचार, धर्मज्ञ, सत्यवादी, कुटुम्बी, धनी और प्रति- ष्ठित पुरुष के पास निक्षेप-धरोहर रखना चाहिए। जो मनुष्य जिसके यहां जो द्रव्य जिसप्रकार रक्खे, उसको उसीप्रकार लेना उचित है। क्योंकि-जैसा देना, वैसा लेना। जो धरोहर रखनेवाले की वस्तु मांगने पर नहीं देता, उससे न्यायकर्त्ता राज- पुरुष रखनेवाले के पीछे मांगे। धरोहर के समय साक्षी न हो, तो राजा किसी वृद्ध-प्रामाणिक कर्मचारी से कुछ वस्तु किसी बहाने से उसके यहां रखवावे और थोड़ेही दिनों में मँगवाले। यदि वह राजकर्मचारी अपनी रक्खी वस्तु ठीक ठीक मांगने पर पा जावे तो जो धरोहर न पाने की नालिश करे उसको झूठा समझे ॥ १७६-१८३ ॥ तेषां न दद्याद्यदि तु तद्धिरण्यं यथाविधि । उभौ निगृह्य दाप्यःस्यादिति धर्मस्य धारणा ॥ १८४ ॥