मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंविकासवाद १५५ जातिका है; किन्तु यह उड़नेवाला है । इनके पैरोंकी रचना भूमिचर जानवरोंके अगले पैरोंके तुल्य होती है । विकासवादका यह सबसे उत्तम प्रमाण समझा जाता है । स्तनधारियोंमें गाय, घोड़ा, हाथी, ऊँट, हरिण, गैड़ा, सूअर, दरियाई घोड़ा आदि हैं । इनके सूँड़ या खुर होते हैं । इनमें खुरका माश्चर्य है। हाथीकी पाँचों अँगुलियाँ, टापीरके चार, गैंडेके तीन, ऊँटकी दो और घोड़ेकी एक ही होती है । यहाँ अंगुलियोंके क्रमशः ह्राससे विकासका अच्छा प्रमाण मिलता है । आस्ट्रेलियाका केंगारू भी विकासका अच्छा प्रमाण है । इसकी माँदीके पेटमें एक थैली होती है । माता बच्चोंको पैदा करके इसी थैलेमें रख लेती है। इस थैलेमें स्तन होते हैं । बच्चे बड़े होनेपर थैलेसे बाहर निकलते हैं । इसी तरह अमेरिकाका 'ओपोसम' होता है । उसकी भी मादाके पेटमें थैली होती है। इनके सिवा डकबिल एव ईकड्ना दो स्तनधारी जन्तु और भी होते हैं । ये अण्डे देते हैं, परन्तु अण्डोंको पेटमें रखनेके लिये इनके भी पेटमें थैली होती है । इस तरह स्तनधारियोंमें देखा गया है कि कई पूर्ण जरायुज, कई केंगारूकी भाँति अर्ध-जरायुज और कई डकबिलकी भाँति अण्डज हैं । ये स्तनधारियों एव अण्डजोके मध्यवर्त्ती प्राणी हैं । 'इसी तरह पृष्ठवंशधारियोंकी दूसरी श्रेणीके पक्षी भी कई प्रकारके होते हैं । कोई दाना चुगते हैं, कोई मांस खाते हैं और कोई पानीमें तैरते हैं । परिस्थितिके अनुसार उनके चोंच, पैर और झिल्लीदार पंजोंकी बनावट होती है । आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, न्यूजीलैड और अमेरिकाका पेग्विन पक्षी भी विकासका एक श्रेष्ठ प्रमाण है। यह जहाँ रहता है, वहाँ दूसरा पक्षी नहीं रहता, इसीलिये इसकी उड़नेकी शक्ति नष्ट हो गयी । यह पानीमें तैरता है । इसके पैर नावके चप्पुओंकी तरह पानी काटनेवाले हो गये । शुतुरमुर्ग और मोरकी भी उड़नेकी शक्ति कम हो गयी, क्योकि इन्हें किसी पक्षीका डर नही । यह परिस्थितिमे प्राप्त विकासके उदाहरण हैं । 'पीठकी हड्डीवालोमे तीसरी जाति सर्पणशीलोकी है । इसमे गोह, साँप, अजगर, नाकू, मगरमच्छ एवं कछुआ आदि हैं । गोहकी अनेक जातियों हैं, एक जातिकी गोहमें आगेके पैर नहीं होते, दूसरी जातिमें आगे-पीछे चारों पैर नहीं होते । सर्प बिना पैरका होता ही है। ये भी विकासके प्रमाण हैं । पृष्ठ- वंशवालोकी चौथी जाति है मण्डूकोंकी, यह पैदाइशसे लेकर युवावस्थातक अपनी जीवनीसे सिद्ध कर देता है कि मछलियोसे उसकी उत्पत्ति हुई है। मछलियोंकी तरह पहले वह गलफडोसे श्वास लेता है, फिर मुखसे । पहले उसके (मछलीकी तरह) पूँछ होती है, फिर वह लुप्त हो जाती है । पाँचवीं श्रेणी मछलियोंकी है । वे हजारो प्रकारकी होती हैं, जिससे विकासके अनुमानकी अधिक सम्भावना