भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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१५६ मार्क्सवाद और रामराज्य रहती है । इसी तरह अस्थिरहित प्राणियोंके भी शरीरोंसे विकासका अनुमान होता है । ये जोड़ोंसे बने होते है । कनखजूरा, बिच्छू, मकड़ी, भौंरा, ततैया आदि इसी विभागके हैं । इनमे भिन्नता होते हुए भी सबके शरीर छोटे-छोटे जोड़ोसे बने होते हैं । इनसे भी मालूम होता है कि सब एक ही मूल प्राणीसे बने हैं' । इनके आगे अत्यन्त सूक्ष्म हैड्रा, अमीबा आदि प्राणी है । इनके भी पोषण, श्वासोच्छ्वास आदि आठो संस्थान हैं । इस तरह सब प्राणियोंमें वैधर्म्य होते हुए भी वे साधर्म्यसे रहित नही हैं । क्रमसे रखनेपर पहले अमीबा, हैड्रा, कनखजूरे आदि जोड़वाले कीड़े, फिर हड्डीवाली मछलियाँ, फिर मण्डूक, फिर सर्प, फिर पक्षी और अन्तमे स्तनधारियोंका स्थान ठहरता है । विकाससे इनकी आकृतिमें भिन्नता है । जैसे नये यन्त्रके बन जानेपर पुराने यन्त्र अलग हो जाते हैं, वैसे ही योग्य प्राणियोंके उत्पन्न हो जानेपर अयोग्य जातियाँ पीछे रह जाती हैं । पिछली जातियोंके अवशिष्ट अवयव इस बातकी साक्षी दे रहे हैं । मनुष्य भी स्तनधारी जन्तुओंकी श्रेणीमें है । वनमानुष, बंदर, लीमर आदि जातियाँ इसी श्रेणीकी हैं, अतः इनकी उत्पत्ति विकासवादके अनुसार ही है ।' यद्यपि आन्तर-रचनाका मिलान ठीक है, फिर भी इनकी श्रेणियाँ बाह्य रूप- से ही निर्धारित की गयी हैं । स्तनोंको देखकर स्तनधारियोंकी श्रेणीका निर्णय किया है । मांस खाना, जीभसे पानी पीना, मैथुनके समय बँध जाना, पसीना न आना, अँधेरेमे भी देखना आदि सब बाहरी लक्षण हैं । इसी तरह दाँत देखकर तीक्ष्ण- दन्तवालोकी श्रेणी बनी । इस तरह सभी विभाग प्रायः बाह्य भेदपर ही निर्भर ह, अतः आन्तरिक रचनापर वर्ग-विभागका अहंकार व्यर्थ है । ह्वेल, चमगादड़ और गायके स्तनोंको देखकर ही सबको एक श्रेणीमें रक्खा गया है । जहाँ इनकी बाह्य आकृतिसे काम नहीं लिया, वही भूल हुई । भालू और गिनी फाउल- को एक मानना भूल है । उस भूलको अब रुधिर-शास्त्र सुधार रहा है, अतः केवल आन्तर रचनापर उपर्युक्त विभागकी बात असङ्गत है । शरीरके अंदर हड्डियाँ, नस-नाड़ियाँ, यकृत्-प्लीहा, गर्भाशय आदि अनेक यन्त्र हे । पर ये क्या अस्थिहीन कीडोंमें भी ह ? कुत्ते और गायके पानी पीनेके ढगमे भेद है । कुत्ता जीभसे और गाय घूँटसे पानी पीती है, फिर भी दोनो स्तनधारी हैं । अतः आन्तर-रचना जटिल है, उसके आधारपर वर्गभेद नही बन सकता । अमीबासे स्तनधारियोंतककी रचनामे साम्यका पक्ष भी गलत है । यत्किंचित् साम्य तो पाञ्चभौतिक होनेसे सबमें ही है । अस्थियुक्त और अस्थिहीन प्राणियोंकी कुछ भी समानता नहीं है । यकृत्, प्लीहा, गर्भाशयादि एकमें हैं, दूसरेमें नहीं । अस्थिहीनोंमें अस्थियाँ कैसे हुईं, इसपर भी विकासवादी चकरा जाते हैं ।