भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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१५८ मार्क्सवाद और रामराज्य ग्रन्थोंसे मालूम होता है कि 'दो स्त्रियोंके परस्पर मैथुन करनेसे यदि किसीके गर्भमें बीज चला गया, तो उस गर्भसे अस्थिविहीन शिशु उत्पन्न होता है।' इसी तरह 'कोई ऋतुस्नाता स्त्री यदि स्वप्नमे मैथुन करे तो वायुद्वारा आर्तव खिंचकर गर्भमें धारित होता है। वही अस्थिहीन मांस-पिण्डके रूपमे उत्पन्न होता है। केश-श्मश्रु, लोम, नख-दन्त, शिर-धमनी, स्नायु, शुक्र—ये सब पितृज गुण होते है। इसी कारण स्त्रीको दाढ़ी-मूंछ, मयूरीको पूंछ, मुर्गीको कलँगी और हथिनीके दाँत नहीं होते। पुरुषमें क्यो ये कठिन पदार्थ होते हैं और स्त्रीमें क्यो नही होते ? अमीवामें कौन स्त्री है एवं कौन पुरुष, किस प्रकार उसका वंश चला, फिर नर-मादा-भेद कैसे हुआ, अस्थिहीन और अस्थियुक्त यह भेद कैसे हुआ ? इनका विकासवादमें कोई भी यथार्थ उत्तर नहीं। अतः शरीर-तुलनाकी दृष्टिसे अस्थिहीनोंका अस्थिवालोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं। कहा जाता है कि 'एक कोष्ठवाला अमीवा दो कोष्ठवाला हैड्रा बन गया, क्योकि विकास- सिद्धान्तानुसार कोष्ठ हमेशा दुगुने परिणाममें बढता है अर्थात् एकके दो, दोके चार, चारके आठ और आठके सोलह हो जाते हैं।' इसके अनुसार प्रत्येक उत्तरोत्तर योनियाँ आकार और वजनमें पूर्वकी अपेक्षा दूनी, चौगुनी, अठगुनी होनी चाहिये। पर ऐसा देखनेमें नही आता । स्थिति तो यह है कि अमीवा हर जगहसे अपने अंदर छेद कर लेता है। इससे वह एक कोष्ठका भी नही प्रतीत होता। यदि एक कोष्ठ हर जगहसे फटता है तो उसका चेतन-रस— प्रोटोप्लाज्म—वह जाना चाहिये, किंतु ऐसा नहीं होता। इस तरह अमीवासे लेकर जोडवालोंतक और जोडवालोंसे लेकर अस्थिवालोंतक कोई भी तुलना नही। स्तनोंका विज्ञान क्या है, यह भी विचारणीय है। ये स्तन नरोंमें क्यो नही होते, इसका कोई उत्तर नहीं। अमीवाके भी आकार-प्रकारका ज्ञान वैज्ञानिकोको नहीं। वह एक कोष्ठवाला है या अनेक कोष्ठवाला और कोष्ठका क्या विज्ञान है, उसमें नर-मादेका क्या विज्ञान है, इन कोष्ठोंसे उत्तर योनियोका किस प्रकार विकास होता है, यह भी विकासवादी सिद्ध नहीं कर पाते । जोडवालो और अस्थिवालोंके बीचमें भी कोई प्राणी है या नही, इसे भी वे नहीं जानते । अस्थिकी उत्पत्ति विकासद्वारा असम्भव है, यह बतलाया जा चुका है। घोड़ेमें स्तनोंका अभाव क्यो, यह भी विचारणीय ही है । इस तरह शरीर-तुलना-शास्त्रसे विकास सिद्ध नहीं होता। परिस्थितिवश प्राणियोंके अङ्गोंका ह्रास-विकास कहा जाता है। 'ओपोसम, डकब्रिल, पेग्विन, मोर, ह्वेल, शुतुरमुर्गके शरीरोंमे ऐसे चिह्न पाये जाते है, जिनसे परिस्थितिवश शरीरोंमे ह्रास-विकास सिद्ध होता है।' परन्तु 'उक्त प्राणियोंके अङ्गोंमें ह्रास-विकास हुआ' यह विकासवादी किस प्रमाणसे कहते हैं ? यह