भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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कहना कहीं अधिक प्रामाणिक है कि उन-उन प्राणियोंके कर्मानुसार सुख-दुःख भोगार्थ परमेश्वरने ही उन्हें वैसे-वैसे अङ्ग दिये। व्हेलके पैर कमजोर हो गये, मोर, शुतुरमुर्गके पख कमजोर हो गये, परंतु यदि इससे पहले कभी वे जोरदार पैरवाले और पखवाले देखे गये होते तो कुछ कल्पना भी हो सकती थी। जब पानीमें तैरनेका काम देते हैं, तब इस कल्पनामें क्या प्रमाण है कि 'पहले वह स्थलचारी था, अब पानीमें रहनेसे पैर कमजोर हो गये ?' इसी तरह मोर, शुतुरमुर्ग हैं। वे डील-डौलमें बड़े हैं, इनको पक्षियोंसे डर नहीं। फिर भी स्थलचारियोंसे बचनेके लिये उनके पख हैं अतः 'परिस्थितिके कारण पैर कमजोर हैं।' यह भी कहना व्यर्थ है। आज भी कुत्ता मोरको नोच डालता है, फिर यह कैसे समझ लिया कि 'उसका कोई शत्रु नहीं है, उड़नेका काम न पड़नेसे पख कमजोर हो गये ?' 'पक्षियोंसे स्तनधारी बने' यह कल्पना भी व्यर्थ है। जब उड़नेकी अधूरी विमान-विद्यासे भी मनुष्य प्रसन्न है, तब पख पाकर भी पक्षी उड़न-विद्याको क्यों छोड़ेंगे ? 'पक्षियोंका कोई शत्रु नहीं' क्या ऐसा कोई समझदार व्यक्ति कह सकता है ? यदि आज भी पक्षियोंके शत्रु हैं ही, तो वे अपने पखोंको बर्बाद कर पशु क्यों बन गये ? परिस्थितिसे न अङ्ग लुप्त होते हैं और न तो नये उत्पन्न होते हैं। यदि परिस्थिति ही सब कुछ थी तो हथिनोको दाँत क्यों नहीं हुए ? हथिनी और हाथी दोनों समान स्थितिमें थे ही। वस्तुतः प्राणियोंके जाति, आयु और भोग उनके कर्मानुसार ईश्वरद्वारा ही प्राप्त होते हैं। 'भिन्न जातियोंके मिश्रणसे वंश चलता है' यह पक्ष भी गलत है। अनेकों जातियोंका परस्पर मैथुन व्यर्थ होता है। कुछसे संताने उत्पन्न होती हैं, पर वंश नहीं चलता। जिनमें वंश चलता है, वे अत्यन्त भिन्न जातिके नहीं, अपितु समान जातिके ही होते हैं। सिंह-व्याघ्र एवं कुत्ते-भेड़ियेके मेलसे संतानोंत्पत्ति यद्यपि होती है तो भी उनका आगे वंश नहीं चलता। देखते हैं कि घोड़े-गदहेसे खच्चर उत्पन्न होते हैं, परंतु उनसे वंश नहीं चलता। यही स्थिति कलमी आम, पेवंदी बेरकी भी है। यदि कलमी आमसे वृक्ष पैदा हुए या सिंह-व्याघ्रके मेलसे वंश चला तो भी आगे चलकर वे मूलजातिके रूपमें ही हो जाते हैं, धीरे-धीरे या तो व्याघ्र या सिंहकी ही शकलमें हो जाते हैं। कलमी आम भी छोटा होते-होते तुखमी आमके ही आकारका हो जाता है। विकाससे अलग जाति उत्पन्न हो सकती है, परंतु वंश नहीं चलता। बच्चा तो दो स्त्रियोंके अन्योन्य मैथुनसे भी उत्पन्न होता है, परंतु उसमें हड्डी नहीं होती, वंश नहीं चलता। अमेरिकामे विद्वान् लूथर बंकने बहुतसे वृक्षोंकी कलमोंसे अनेक प्रकारके फल-फूल उत्पन्न किये हैं। यहाँ भी सजातीय मिश्रणमें ही संततिका सिद्धान्त स्थिर है। समान जाति और समान