मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोगवालोके ही सम्बन्धसे संतान उत्पन्न होती है और वश चलता है । अतएव मास खानेवालो और घास खानेवालोके सम्बन्धसे भी वश नहीं चलता । प्रायः जाति, आयु, भोगके साथ ही प्रसवका सम्बन्ध रहता है। भोगोके सम्बन्धमे परिस्थितिवादी कह सकता है कि 'अमुक जातिको जब जीनेके लिये खुराक न मिली, तब वह मास खाने लगी।' परंतु प्रत्येक जातिकी नियत आयुका क्या कारण है, यह विकासवादी नही बतला सकता । मनुष्य, बंदर, गाय, बकरी, ऊँट, गधा और छोटे कीडोकी आयुका महान् अन्तर है । मनुष्य- के समान ही उससे भी बलवान् पशुओकी सौ वर्षकी आयु क्यो नही, इसका उत्तर भी विकासवादसे बाहर है । विकासवादके अनुसार पृष्ठवंशधारी प्राणियोमें कच्छप एव सर्प भी सर्पणशीलोकी श्रेणीमें है । आयुष् शास्त्रियोके मतानुसार कछुआ १५० वर्ष जीता है और सर्प १२० वर्ष जीता है। विकासवादके अनुसार सर्पणशील प्राणी ही पक्षी बने हैं, परंतु पक्षियोमें कबूतर ८ ही वर्ष जीता है। पक्षियोका विकास स्तनधारी प्राणी है, उनमें शशक ८ वर्ष, कुत्ता १४ वर्ष, घोड़ा ३२ वर्ष, बंदर २१ और मनुष्य १०० वर्ष जीता है। यहाँ स्पष्ट ही विकासमे आयुका ह्रास हो रहा है। दीर्घायु कच्छप एव सर्पको पराजित करनेवाला कबूतर ८ ही वर्ष जीता है । इससे भी योग्य प्राणी शशक, कुत्ता, घोड़ा भी क्रमशः ८, १४ और ३२ ही वर्ष जीते हैं। मनुष्योका जिसे पूर्वज कहा जाता है, उस बदरकी आयु २१ वर्ष ही है । मनुष्य भी तो कच्छप एव सर्पसे कम ही जीता है । विकासवादका कहना है कि 'जीवन सग्राममें योग्य ही रह जाता है, उसीसे नवीन जातियोका प्रादुर्भाव होता है, परंतु जीनेके लिये संग्राम करके विकसित होकर और योग्यता प्राप्त करके भी प्राणी उलटे मृत्युके अधिक निकट पहुँच गये। जो पहिलेके और सरलरचनाके हैं, वे अधिक जीते हैं तथा जो क्लिष्ट रचनाके हैं और बादके हैं, वे कम जीते हैं। यह क्या मशीनोका सुधार है कि जो पहली १२० या १५० वर्षकी थी, वही सुधरी हुई मशीन ८ ही वर्ष टिकने लगी । यह अच्छा यान्त्रिक विकास है । शतमायुर्मनुष्याणां गजानां परम स्मृतम् । चतुस्त्रिशत्तु वर्षाणामश्वस्यायुः परं स्मृतम् ॥ पञ्चविंशति वर्षाणि परमायुर्वृषोष्ट्रयोः । यह भी स्पष्ट है कि एक मिनटमें शशक ३८, कबूतर ३६, वानर ३२, कुत्ता २९, बकरी २४, बिल्ली २५, घोड़ा १९, मनुष्य १३, हाथी १२, सर्प ८ और कछुआ ५ बार श्वास लेता है । यह भी विचारणीय है कि 'अभिनवतम मशीन बन जानेपर पुरानी मशीनोका बनना बंद हो जाता है।' परंतु यहाँ तो मनुष्यके विकसित हो जानेपर भी पुराने कीडे-मकोडोके बननेमे किञ्चिन्मात्र भी कमी नहीं