भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 174

हुई । मनुष्योंसे करोड़ों गुने अधिक गिजाई, मच्छर, मकोड़े तथा जलजन्तु हैं । सर्पणशील जन्तु तो पक्षी हो गये, परन्तु जोड़वाले कीड़ा, भौरों, ततैया, मक्खी आदिके पंख किस तरह हो गये ? उड़नेवाली मछलियोंको पंख किस तरह पैदा हो गये ? इनसे पक्षियोंके शरीरकी तुलना कैसे होगी ? कृमियों, मछलियोंके साथ पक्षियोंका सम्बन्ध कैसे हुआ ? क्या कोई पक्षी इन पंखधारी कीड़ों एवं मछलियोंसे वंश चलायेगा ? क्या बन्दर और मनुष्यसे वंश स्थापित होगा ? यह तो हो सकता है कि पहले सादी रचनावाले प्राणी बने हों और बादमें क्लिष्ट रचनावाले प्राणी, किंतु सादी रचनावाले ही क्लिष्ट रचनावाले हो जाते हैं, यह कहना निष्प्रमाण है । वैसे तो कीटावस्थामें भी उड़नेवाले कीड़ों और मछलियोंकी पक्षियों-जैसी क्लिष्ट रचना देखी जाती है । कनखजूरे सरीखी क्लिष्ट रचना साँपकी नहीं होती, तितलियोंकी-सी कारीगरी कौओंमें नहीं पायी जाती; परन्तु विकासवादके अनुसार तितली और कनखजूरा कौवे तथा साँपसे पहले ही उत्पन्न हो गये । ऐसी स्थितिमें सादी और क्लिष्ट रचनाका कुछ भी मूल्य नहीं रहता । यदि विकासवाद तितलीकी रचनाको क्लिष्ट रचना न माने, केवल अस्थिवाले प्राणियोंकी ही रचनाको क्लिष्ट रचना कहे तो यह भी निराधार है । देखनेमें तो अस्थिवाले प्राणियोंसे वृक्षोंकी ही रचना अधिक क्लिष्ट है । विचित्र पत्रों, पुष्पों, स्तवकों, फलोंकी सुन्दरता, सरसता, मधुरता अस्थिवाले उष्ट्रमें कहाँ है ? मनुष्यका शरीर भी वृक्षोंकी शाखाओं, उपशाखाओं, पल्लवों, पुष्पों, फलोंकी विचित्रताके सामने नगण्य है । एक फूलके रंग, बनावट और सुगंधके सामने मनुष्य-रचनाका कोई महत्त्व नहीं, परन्तु पशुओं, पक्षियों-जैसी स्वतन्त्रता और मनुष्य-जैसा ज्ञान वृक्षोंमें नहीं है । इसीलिये वे सादी रचनावाले समझे जा सकते हैं । कर्मानुसार प्राणी ही भोग्य और भोक्ता होता है । सादी रचनावाले भोग्य और क्लिष्ट रचनावाले भोक्ता होते हैं । वनस्पति यदि भागनेमें स्वतन्त्र हों तो पशु कैसे जी सकते हैं ? घोड़ा यदि मनुष्यसे अधिक बुद्धिमान् हो तो वह सवारीके काम कैसे आ सकता है ? इस व्यवस्थाके अनुसार पहले वनस्पति फिर पशु उत्पन्न होते हैं । पशुओंमें ही हाथीसे लेकर कृमिपर्यन्त आ जाते हैं, अन्तमें मनुष्यकी उत्पत्ति हुई । यह सिद्धान्त अति प्राचीन है और वेदों, उपनिषदों आदिद्वारा स्वीकृत है—भगवान्ने अपनी अजा-मायाशक्तिके द्वारा विविध प्रकारके वृक्ष, सरीसृप, पशु, खग, दंश, मत्स्य आदि शरीररूपी पुरोंको बनाया तो भी उनसे संतुष्ट न हुए । फिर ब्रह्मज्ञान-सम्पादनयोग्य मनुष्यको बनाकर संतुष्ट हुए । सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयाऽऽत्मशक्त्या वृक्षान् सरीसृपपशून् खगदंशमत्स्यान् भा० ११।९। २१—