भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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रहती है । ऐसे प्रमाणोंको देखकर विकासवादी कहते हैं कि 'सब प्रकारके जीवित प्राणी एक ही जातिके आद्यवंशजोंसे उत्पन्न हुए हैं। इनके भिन्न-भिन्न रूप परिस्थितियोंके अनुरूप बनते हैं।' परंतु उपर्युक्त बातें विकासवादके लिये भयंकर हैं। जब प्रकृति हर जगह मौजूद है, हर जगहके लिये जलवायु अनुकूल है, तब वहाँ अमीबा पैदा होकर कोई नयी जाति क्यों नहीं बना डालता ? क्यों पुरानी ही सृष्टिके प्राणियोंमें विकासवादकी स्वच्छन्द प्रकृति मत्था मार रही है ? भिन्न देशोंके प्राणियोंकी समता सबके एक ही वंशके होनेकी सूचना देती है । परंतु यदि भिन्न देशोंके प्राणियोंकी समता इस तरह की जाय कि बिल्ली और कुत्ता स्तनधारी एवं मांसभक्षी हैं, अतः एक देशकी बिल्ली और दूसरे देशके कुत्तेको देखकर कह दिया जाय कि दोनों ही प्राणी एक ही पिताकी संतान हैं, तो क्या ठीक होगा ? किंतु यदि बुलडॉग, ताजी आदि कुत्तोंको देखकर कहा जाय कि 'एक ही पिताके पुत्र हैं', तो सत्य होगा । अतः केवल रचना देखकर ही एक होनेका अनुमान नहीं किया जाना चाहिये । प्रत्युत समान प्रसव, समान भोग एवं समान आयुका मेल मिलनेसे ही दोनोंके एक पिताके संतान होनेका निर्णय किया जा सकता है। कहा जाता है कि डार्विनको टेरोडेल्फिगोमें जब खर्वाकार मनुष्य दिखलायी पड़े, तब वह विश्वास ही न कर सका कि ये भी मनुष्य ही हैं । जब उसने गोरिल्ला और चिंपेंजी आदि वनमानुषोंको देखा, तब चिल्ला उठा कि 'ये भी एक प्रकारके मनुष्य ही हैं।' डार्विनके इस भ्रमका कारण यही था कि उसने केवल आकृतिसाम्यपर ही विश्वास किया, किंतु उस सृष्टि-नियममें समान-प्रसव- का नियम आवश्यक है । तदनुसार खर्वाकार-दीर्घाकार मनुष्योंके संयोगसे संतति होती है, परंतु मनुष्यो और वनमानुषोंके योगसे संतति नहीं होती । अतः पहले दोनों एक जातिके हैं और दूसरे भिन्न जातिके। इसीलिये यद्यपि घोड़े और गधेमें मनुष्यो और वनमानुषोंकी अपेक्षा अधिक समानता है, फिर भी खच्चरकी वंश-परम्परा नहीं चलती । अतः घोड़े-गधे एक जातिके नहीं हैं । यह तो एक आस्तिकको स्वीकृत हो सकता है कि एक ही जगह सृष्टि हुई और वहाँसे सब जगह जा- जाकर प्राणी आबाद हुए; परंतु 'सब अमीबाका ही विकास है' यह सिद्धान्त सर्वथा असंगत है । जैसे विभिन्न वनस्पतियोंके बीज पृथक्-पृथक् होते हैं, वैसे ही सब प्राणियोंके बीज भी पृथक् ही थे । समानताका कारण दूरता एवं निकटता नहीं, किंतु वंश और परिस्थिति ही कारण है । परिस्थितिके कारण ही बुलडॉग, ताजी आदि कुत्तोंमें भेद होता है । परंतु

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