मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३९१ जा सकता है। पूर्वोक्त ढंगमे अन्यायोपार्जित बडी-बडी पूँजीको ग्रहणकर बेरोजगारों- को रोजगार दिया जा सकता है । कर्तव्य-विमुखोंका भी धन लेकर बेकारी दूर की जा सकती है । वैध, अतिरिक्त आयके भी पाँच हिस्सेमे चार हिस्सा राष्ट्रीय काममें लगाया जा सकता है। दान एव सहायताकी परम्परा उद्बोधित कर बेकारी एव असंतुलन मिटाया जा सकता है । विपत्तिकालमे जैसे राज्य-कोषसे राष्ट्रकी सहायता की जाती है, वैसे ही विशेष विपत्-कालमे संग्राम या अन्य उपयोगी कामके लिये व्यक्तिगत कोष या पूँजी, भूमि अन्य साधनोका भी राष्ट्रहितके लिये उपयोग किया जा सकता है । जैसा कि अन भी संग्रामके समय सभी राष्ट्रोके शासकोको विशेषाधिकार होता है कि वे किसी भी नागरिकके मकान, मोटर, रुपया आदि सरकारी कामके लिये ले सकते हैं । साथ ही जबतक महायन्त्रोपर नियन्त्रण नहीं होता, तबतक पूँजी, श्रम एव लाभ तथा राष्ट्रहितको ध्यानमें रखकर व्यवसायियो, समाज तथा राज्य- सचालकोद्वारा उचित श्रम-मूल्य निर्धारण किया जायगा । जैसे-जैसे उत्तमोत्तम यन्त्रोका विकास होगा, कम-से-कम लोगोके द्वारा अधिक-से-अधिक माल पैदा होने लगेगा, वैसे-वैसे कामके घटोमें कमी की जायगी, मजदूरोकी सख्या बढायी जायगी । इस पक्षमें यह भी हो सकेगा कि मासभरमे प्रत्येक मजदूरको एक घंटा ही काम करना पडेगा और उतने ही काम करनेके बदले उसे उच्चस्तरीय जीवन-निर्वाह योग्य धन मिल जायगा ओर उसकी क्रय-शक्ति बनी रहेगी तथा मालकी खपत न घटेगी । राष्ट्रहित तथा अपना घाटा रोकनेके लिये व्यवसायी भी उतना ही माल बनायेगे जितने कि खपत होगी । अपना शेष धन और मजदूर अन्य उपयोगी वस्तु बनानेमें लगायेगे । यदि जडवादी, ईश्वर-धर्म-विमुख देहात्मवादी कम्युनिष्टोमें ईमानदारी हो सकती है, पक्षपातशून्य होकर सबका हित सोचकर ईमानदारीसे उत्पादन और वितरणका काम ठीक चला सकते हं तो गैरकम्युनिष्ट धर्मनियन्त्रित, ईश्वर- आत्मा, लोक-परलोक तथा धर्म-अधर्म, स्वर्ग-नरक माननेवाले रामराज्यवादी सुतरा ईमानदार हो तो ही सकते हैं। इस पक्षमे नौकरशाही रुकेगी। यन्त्रवत् अन्य प्रेरित प्रवृत्ति मिटेगी, उत्साह रहेगा, दान, पुण्य, यज्ञ, तप, परोपकारकी भावनासे राष्ट्र एव समाजका हिताचरण अधिक सम्भव होगा । नरकका डर, स्वर्गका लोभ भी बुरे कर्मोंका निवर्तक एव अच्छे कर्मोंका प्रवर्तक होगा । आस्तिकका भविष्य विशाल है। अन्तमे वैकुण्ठ या परम उपवर्ग उसका ध्येय रहता है, जिसके लिये सर्वस्वत्याग भी सम्भव होता है । इसके विपरीत जड कम्युनिज्ममे यह सब असम्भव ही है। मान भी लिया जाय कि कम्युनिष्टोका स्वप्न पूरा हुआ और पूर्णरूपसे यान्त्रिक विकास सम्पन्न हुआ और सबके लिये ही मोटर, वायुयान, भोजन, वस्त्रादि मिलने लगा। पर यदि महीनाभर या वर्षभरमे एक दिन एक घंटा काम करना पडा, तो भी शारीरिक श्रमका प्रतिदिन काम न मिलनेपर सबके शरीर अनेक प्रकारके रोगोंके शिकार हो जायँगे । कोई विरोधी या दुश्मन होता है, तभी शास्त्रास्त्रका अभ्यास,