मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमल्ल-युद्ध तथा व्यायामादिमें प्रवृत्ति होती है। यदि वर्गभेद समाप्त हो जाय तो विरोध एवं युद्धकी सम्भावना ही न रहेगी और फिर खाली मस्तिष्कमें शैतानका राज्य होगा। दुराचार, पापाचार, विलासिताकी वृद्धि होगी, जिससे स्वास्थ्य-नाशके साथ शान्ति-भङ्ग होकर भीषण क्रान्ति होगी । विलास एवं आधिपत्यकी उद्दाम कामनाकी पूर्ति कभी हो ही नहीं सकती। अध्यात्मभावना बिना अखण्ड भूमण्डलकी सुन्दरियाँ तथा सुन्दर भोग-साधन एक व्यक्तिको भी तृप्त करनेमें समर्थ हो नहीं सकते— यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः । सर्वं नैकस्य पर्याप्तमिति मत्वा शमं व्रजेत् ॥ अध्यात्मशास्त्रोंके अनुसार अध्यात्मविचार एवं शान्तिसे ही तृष्णाका अन्त होता है, अन्यथा नहीं। कम्युनिष्टके लिये कोई भी काम करनेके लिये न मिलनेसे अनाचार, पापाचारमे ही प्रवृत्त होना पड़ेगा, क्योंकि कोई भी बिना कुछ किये क्षणभर भी रह नहीं सकता— न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । (गीता ३।५) अध्यात्मवादमे पूर्ण यान्त्रिक विकास, अनन्त धन-धान्य एवं उपभोग- सामग्री मिलनेपर संयम, योगाभ्यास, उपासना तथा विविध कर्मकाण्ड करनेके लिये पूर्ण अवकाश रहेगा । आसन, प्राणायामादि तथा श्रौत-स्मार्त्त विविध कर्मकाण्डोंके करनेमें परिश्रम करनेका अवकाश रहेगा । व्याधिहीन शरीर स्वस्थ रहेगा । चित्त उपास्यब्रह्मकी उपासना एवं ब्रह्मज्ञानमे दीर्घकालके लिये स्थिर रह सकेगा । चञ्चलता, तृष्णा आदिकी प्रशान्ति होकर समाधि-सम्पत्ति हो सकेगी । अध्यात्म- वादीका भविष्य उज्ज्वल एवं उत्साहप्रद रहेगा । जडवादी कम्युनिष्टका भविष्य अन्धकारपूर्ण एवं नैराश्यव्याप्त होगा । जडवादीके मरते ही उसका सब कुछ समाप्त हो जायगा, परन्तु, अध्यात्मवादीको मरने अर्थात् देह-त्यागनेके अनन्तर इस लोकसे भी अधिक दिव्य ऐश्वर्य एव भोग-सामग्री मिलेगी । यदि दिव्य भक्ति एवं ज्ञानमे सम्पन्न होकर देह-त्याग किया गया तब तो सर्वसाधनानपेक्ष, अचिन्त्य, अनन्त, परमानन्दस्वरूपावस्थानलक्षण, मोक्ष या भगवत्प्राप्ति सिद्ध होगी । निरङ्कुश एवं अनन्त तृप्ति अनन्तरूपसे प्राप्त होगी। रामराज्यवादीकी दृष्टिमें ईश्वर एवं धर्मके विरोधी मार्क्सवादी तथा धर्मनियन्त्रणरहित पूँजीवादी दोनो समाज एवं विश्वके लिये हानिकारक हैं और उन्हींके आपसी सङ्घर्ष सार्वजनिक धर्म, सुख एवं शान्ति खतरेमे पड सकती है। ऐसे पूँजीवाद एव साम्यवाद दोनो ही हानिकारक हैं । इन दोनोंमें ही शोषण होती है। इनमें यदि साम्यवादीके यहाँ समष्टिके नामपर मुट्ठीभर तानाशाहोंकी तानाशाहीमे विश्वके नागरिकोका धन, धर्म, स्वतन्त्रता, शान्ति सङ्कटग्रस्त होती है तो धर्म-नियन्त्रणरहित शोषक पूँजीवादी तथा उच्छृङ्खल साम्राज्यवादी व्यष्टिके नामपर समष्टिका शोषण करके जनतामें त्राहि-त्राहिका आर्त्त- नाद फैला देते हैं । किंतु रामराज्यवादी अर्थात् धर्मनियन्त्रित शासन-तन्त्रवादी